हिमालय क्षेत्र के जनजातीय गांव
मेघालय की खासी जनजाति के लोग अपने गांवों से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं। एक खासी जनजाति का गांव पहाड़ी के शिखर से थोड़ा नीचे स्थित रहता है। प्रत्येक गांव में एक धार्मिक उपवन (Sacred grove) होता है। यह उपवन गांव में स्थित घरों के समूह से थोड़ा हटकर होता है। इस उपवन में गांव को सुरक्षा प्रदान करने वाले देवी-देवताओं का वास स्थान होता है। खासी जनजाति का घर पत्थर, लकड़ी, बांस, पुआल, खर इत्यादि से बना होता है। घर निर्माण में ये लोग लोहा की कांटी या किसी अन्य लौह सामग्री का प्रयोग नहीं करते हैं। घर का आकार अंडाकार होता है। घर के मुख्य तीन हिस्से होते हैं। डयोढ़ी, बीच का कमरा तथा विश्राम कक्ष। घर की कुरसी मिट्टी की बनी होती है। दीवार पत्थर के बने होते हैं। घर को बांस, लकड़ी, खर, पुआल, पत्ती इत्यादि से छाया जाता है। घर में जाने के लिए एक छोटा-सा द्वार होता है। घर के अंदर धुंआ निकलने का मार्ग नहीं होता है। घर की दीवारों में रोशनी के प्रवेश हेतु छोटे-छोटे छेद होते हैं। घर के अंदर अंधेरा रहता है। विश्राम कक्ष में तीन पत्थरों के सहयोग से चूल्हा बना होता है। धुंआ निकलने के पर्याप्त मार्ग नहीं होने के कारण, घर की दीवार एवं छत काले रंग के हो जाते हैं। मध्य कमरा का प्रयोग पूजा-पाठ के लिए किया जाता है। घर के स्थान का चुनाव करने के लिए अंडा फोड़ा जाता है। घर बन जाने के बाद घर का मालिक सबसे पहले घर की पूजा-पाठ करता है। पूजा एवं अनुष्ठान के बाद ही वह वहां रहना आरंभ करता है। आजकल संपन्न खासी लोग अच्छे मकान बनाकर रह रहे हैं।
भोट्स एवं लिंगंगम का घर बांस के बने ऊंचे प्लेटफार्म पर बने होते हैं। उनका गांव एक ही स्थान पर दो या तीन वर्ष से अधिक नहीं रहता है। व्यावहारिक दृष्टि से मिकिर दो प्रकार के होते हैं। समतल क्षेत्र में रहने वाले मिकिर तथा पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले मिकिर समतल क्षेत्र में पाए जाने वाले मिकिर तथा असमियों के घरों में कोई विशेष अंतर नहीं पाया जाता है। लेकिन पहाड़ी मिकिर का घर उनसे भिन्न होता है। उनका घर खंभा के सहारे बना होता है। फर्श की ऊँचाई जमीन से कई फुट होती है। घर का निर्माण बांस को काट तथा फाड़ करके किया जाता है। छत का निर्माण धूप-घास द्वारा किया जाता है। घर कई पृथक हिस्सों में बंटा होता है। एक लंबा विभाजन द्वारा घर दो हिस्सों में बंटा होता है। दक्षिण हिस्सा को कुट कहा जाता है। इसमें धान रखा जाता है तथा परिवार के लोग सोते भी हैं। इसमें एक चूल्हा भी होता है। दूसरे हिस्सा को काम कहा जाता है। इसमें अतिथि को रखा जाता है। कुट में केवल एक दरवाजा होता है, जबकि काम में दो दरवाजे होते हैं। काम के अंदर दो चूल्हे रहते हैं। इस घर में एक चबूतरा बना होता है जिसे टिबुंग कहा जाता है। यहां पर बांस की बनी पानी भरने वाली नली रखी जाती है। इसे चुंगा कहा जाता है। इसके सामने बरामदा होता है जिसे होंगकुप कहा जाता है। एक दूसरा बरामदा पीछे की ओर भी रहता है जिसे पैंग होंगकुप कहा जाता है। उसके आगे खुला फर्श होता है। कुट के दक्षिण भाग में फर्श के नीचे एक गड्डानुमा स्थान होता है जिसमें मुर्गा-मुर्गी एवं बकरी रखी जाती है। धान संचय के लिए एक उपकरण होता है जिसे दामटक कहा जाता है। घर के बीच में तथा चूल्हा के बगल में बड़े-बच्चों के सोने का स्थान होता है जिसे दामबक कहा जाता है। जलावन संचय के स्थान को ढंग पैराई कहा जाता है। बड़े घरों में संबंधियों एवं अतिथियों के रात्रि विश्राम हेतु कमरा होता है, जिसे होंग-फासला के नाम से जाना जाता है।
दिमासा कचारी दो प्रकार के होते हैं- समतल क्षेत्र में रहने वाले तथा पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले। समतल कचारी पूर्णरूपेण कचार मैदान के असमियों से घुल-मिल गए हैं। असम में कचार जिला का नामकरण ही कचारियों के आधार पर हुआ है। जो कचारी लोग कचार जिले के उत्तर में बस गए हैं उन्हें दिमासा के नाम से जाना जाता है। ये लोग शांति प्रिय होते हैं। पहाड़ी जनजाति समूह कुकी एवं मिकिर तथा जामी से इनका घर भिन्न होता है। इनका घर धरातल पर बना होता है। दीवारें आधार के समानांतर होती हैं। इनके गांव घाटी में स्थित होते हैं। प्रत्येक गांव में एक सबसे ऊँचा घर होता है जिसका प्रयोग गांव के किशोर एवं युवक क्लब के रूप में करते हैं। यहां महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध होता है। इसे स्थानीय भाषा में नोडरांग कहा जाता है।
मिजो लोग अपने घर स्थान के चुनाव पर विशेष ध्यान देते हैं। घर के लिए ये लोग पहाड़ी शिखर का चुनाव करते हैं तथा जलस्रोत को ध्यान में रखते हैं। इनके गांवों में विभिन्न परिवार के घर एक-दूसरे के समीप व्यवस्थित ढंग से पाए जाते हैं। घर दो कतारों में पाए जाते हैं लेकिन प्रत्येक आमने-सामने घर का दरवाजा भी आमने-सामने होता है। दोनों कतारों के बीच गांव की गली रहती है। पहाड़ी के दलान घर निर्माण में समस्या नहीं उत्पन्न करती है। एक घर का फर्श दूसरे घर की छत से भी ऊँचा होता है। घर की दीवार एवं फर्श लकड़ी के खंभे तथा बांस के सहारे बने होते हैं। छत का निर्माण बांस, कारा, पत्ती इत्यादि द्वारा किया जाता है। अब उनके बीच लकड़ी के फर्श का प्रचलन हो गया है। मिजो के घर का डिजाईन बिल्कुल सरल होता है। यह आयताकार होता है। घर का फर्श बहुत उठा होता है। उसके नीचे घरेलू जानवर रहते हैं। प्रत्येक घर में बरामदा अवश्य होता है जहां बांस के बने उपकरण में मुर्गा-मुर्गी को रखा जाता है। बरामदा में जलावन, खलर तथा अन्य सामान रखे होते हैं।
आओ नागा के गांव पहाड़ के शिखर या ढलान पर बने होते हैं। शिखर से गुजरने वाला रास्ता प्रत्येक गांव को स्पर्श करता है। प्रत्येक गांव मुख्य मार्ग से जुड़ा रहता है। लेकिन प्रवेश द्वार पर लकड़ी एवं बांस का दरवाजा लगा रहता है। मुख्य पथ एवं ग्राम को जोड़ने वाले पथ के दोनों किनारे पर भालेदार बलूत (Spear Oak) के वृक्ष लगे रहते हैं। प्रत्येक गांव को लकड़ी, झाड़ी तथा कांटे के सहारे घेराबंदी कर दी जाती है। इस घेराबंदी को प्रत्येक वर्ष ठीक किया जाता है। प्रवेश द्वार को काफी मजबूत बनाया जाता है। उसे घास-पत्ती से छा दिया जाता है। गेट को सुरक्षा प्रदान करने के लिए समीपस्थ पेड़ का प्रयोग किया जाता है। मुख्य मार्ग गांव के मध्य से गुजरती हैं। मुख्य मार्ग से गांव की गली एवं उपगली जुड़ी रहती है। घर गली एवं उपगली के दोनों ओर बने होते हैं। छोटे-छोटे पर सतह से एक मीटर ऊंचे खंभे के सहारे बने होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से भंडार गृह का निर्माण मुख्य आवास स्थल से थोड़ा हटकर होता है। यह ढलान के निचले सतह पर बना होता है। प्रत्येक गांव में दो या दो से अधिक टोले होते हैं। प्रत्येक टोला में कई घर पास-पास बने होते हैं। घर की संरचना में अंतर घर के मालिक की स्थिति एवं पद का परिचायक होता है। प्रत्येक गांव में कुंवारे किशोरों एवं किशोरियों के लिए एक-एक घर बने होते हैं।
हिमाचल प्रदेश के गद्दीज छोटे-छोटे गांवों में रहते हैं। इनके नदी तट या पहाड़ी पद के आस-पास बिखरे होते हैं। इनके गांव चंबा एवं कंगरा जिलों में स्थित होते हैं। एक गांव का आकार एक परिवार से एक सौ परिवार के बीच होता है। गांव की जनसंख्या एक दर्जन से लेकर 600 तक की होती है। ज्यादातर गांव 20 परिवार के आस-पास वाले होते हैं। ये लोग अपने भेड़ के झुंड के साथ 400 मीटर ऊँचाई तक पशुचारण के लिए जाते हैं। प्रत्येक पशु चारक परिवार के पास पहाड़ पर स्थित एक घर होता है। यह घर तीन तल्ले का बना होता है। घर के प्रत्येक तल्ला का निर्माण पत्थर एवं लकड़ी के सहारे किया जाता है। जाड़े के दिनों में प्रत्येक गांव में एक या दो लोग अपने भेड़ एवं जानवरों की देख-रेख हेतु रहते हैं। अन्य लोग पहाड़ के नीचे स्थित अपने जात भाई के गांवों में चले जाते हैं।
गुज्जर जनजाति के गांव भी गद्दीज के गांव के समान ही होते हैं।
हिमालय क्षेत्र के लाहुली एवं स्वांगला गांवों में कई वार्ड होते हैं। प्रत्येक जाति के अलग-अलग वार्ड होते हैं। उच्च जाति के लोगों के घर दो मंजिले होते हैं।
जौनसार बावर के खस जनजाति का गांव पहाड़ी के ढलान पर बना होता। गांव में लड़की के दो मंजिलें मकान दूर से ही दिखाई देते हैं। निचला तल्ला जानवरों के लिए तथा भंडारण हेतु प्रयोग में लाया जाता है। ऊपर वाला तल्ला का प्रयोग रहने के लिए किया जाता है। चूंकि खस जनजाति के लोग बहुपति प्रथा का पालन करते हैं, अतः घर में सभी वयस्क भाइयों के लिए अलग-अलग कमरा एवं चूल्हा रहता है। आजकल उनके बीच चलंत चूल्हा का प्रयोग होता है। पत्नी जब एक पति के पास से दूसरी पति के पास जाती है तब वह अपने साथ चूल्हा भी लेते जाती है।
उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र की थारु जनजाति के गांव पिलीभीत से चंपारण तक के तराई क्षेत्र में पाए जाते हैं। वे अपने घर को थारुआर कहते हैं। अब ये लोग स्थायी घर बनाने लगे हैं। पहले ये लोग स्थानांतरण कृषि करते थे। कृषि स्थल के साथ-साथ ये लोग घर भी बदलते रहते थे। एक संकोर्ण गलो थारु गांव के बीचों-बीच होकर गुजरती है। गली के दोनों ओर घर बने होते हैं। घर के बीचों-बीच एक खंभा होता है जिसके सटे हुए कमरे बने होते हैं। प्रत्येक घर के सामने बागवानी को जगह होती है। संपन्न थारु परिवार के पास पक्के बने मकान भी होते हैं।



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