Suttanipata Pali: History, Teachings, Structure and Importance in Buddhism
बौद्ध धर्म को परम्परा में यह सुत्तनिपातपालि ग्रन्थ उतना ही लोकप्रिय एवं महत्त्वपूर्ण माना गया है जितना धम्मपदपालि; क्यों कि मौलिक बौद्ध धर्म एवं बौद्ध साहित्य की दृष्टि से इस ग्रन्थरत का बुद्धकाल से ही उच्चतम स्थान माना जाता है।
यही कारण है कि आज से प्रायः सवा दो हजार वर्ष पूर्व सम्राट् अशोक ने अपने भाबूशिला लेख (बैराठ, जयपुर, राजस्थान) में बुद्धोपदिष्ट जिन महत्त्वशाली सात सूत्रों का भिक्षुओं के लिये अनिवार्य रूप से प्रतिदिन स्वाध्याय घोषित किया है उन में से तीन प्रमुख सूत्र इस सुत्तनिपात ग्रन्थ से हो लिये गये हैं। वे हैं- १. उपतिसपसिने (सारिपुत्र-सूत्र), २. मुनिगाथा एवं ३. मोनेय्य सुत्त (नालकसुत्त)।
इस सुत्तनिपात के विशेष महत्त्व की पुष्टि इस बात से भी होती है कि इस ग्रन्थ के दो वर्गों-अटुकवग्ग एवं पारायनवग्ग की निद्देस नाम की अट्ठकथा को सभी सङ्गीतियों में त्रिपिटक के अन्तर्गत ही माना गया है।
सुत्तनिपात का महत्त्व इस बात से भी होता है कि इस ग्रन्थ की भाषा प्राचीन वैदिक भाषा के बहुत समीप है। विद्वानों ने वैदिक भाषा की विविधरूपता और उसके अनेक प्रकार के व्यत्यय पालि और बौद्धिक भाषा की तुलना में विस्तार से परिगणित किये हैं। वैदिक भाषा के जिन प्रयोगों को, आगे चल कर, संस्कृत भाषा ने छोड़ दिया, उनका प्रयोग भी सुत्तनिपात में यथायथ (ज्यों का त्यों) मिलता है। संस्कृत एवं पालि-दोनों भाषाओं का विकास समकालिक है। परन्तु क्यों कि पालिभाषा विशेषतः जनभाषा थी, उसने ऋग्वेद की भाषा के उन अनेक प्रादेशिक प्रयोगों की पूर्ववत् ग्रहण किये रखा। अतः सुत्तनिपात की भाषा में पर्याप्त प्राचीनता है।
अत एव फासबोल जैसे विद्वान् इस ग्रन्थ की भाषा, भाव एवं शैली का विशेष अध्ययन कर ग्रन्थ की प्राचीनता प्रमाणित करते हैं। वे कहते हैं-
"सुत्तनिपात की भाषा पर विशेष रूप से वैदिक भाषा का प्रभाव भी दिखायी पड़ता है। उदाहरण के रूप में देखिये-
प्रयोग
अवीततण्हासे
अस्रमान
आतुमानं
पृष्ठ
१५७
४६
१५३, १६९, १७४
कुप्पटिच्च सन्तिं
चरामसे
१५३
८
तद ('तदा' के स्थान पर)
१३२
पच्वयासे
५
भवामसे
८
यथ ('यथा' के स्थान पर)
४५
समूहतासे
५
सुवाना
३८
सुवामि
१२९, १६८
स्मसे
११७ इत्यादि
सुत्तनिपात की छन्दोरचना
सुत्तनिपात की गाथाओं के छन्द भी प्राचीन वेद एवं उपनिषदों के छन्दों के बहुत समीप हैं। गणविचार का नियम बन्धन भी इन में नहीं के बराबर है। इतना ही नहीं, वेदों की भाँति सुत्तनिपात में भी आठ अक्षरों वाले अनुष्टुभ् छन्द, ग्यारह (११) अक्षरों वाले त्रिष्टुभ् छन्द तथा बारह अक्षरों वाले जगती छन्द बहुलता से मिलते हैं।
इसमें अनुष्टुभ् छन्द की बहुत सी गाथाएँ ऐसी हैं जिन में साधारण चार पादों की अपेक्षा छह छह पाद मिलते हैं। (उदाहरण के लिये पृष्ठ २७, ६२, १०२, ११९, १४२ द्रष्टव्य हैं1)
इसी प्रकार, त्रिष्टुभ् छन्द की बहुत सी गाथाएँ साधारण चार पाद की अपेक्षा पाँच, छह, सात एवं आठ पाद वाली भी दिखायी देती हैं। उदाहरणस्वरूप-पाँच पाद की गाथाएँ ४३, ८६, १२८, १६७ तथा १९२ पृष्ठ में द्रष्टव्य हैं। छह पाद की गाथाएँ पृष्ठ १६२ तथा १९८ पर द्रष्टव्य हैं। और सात सात पाद की गाथाओं के लिये पृष्ठ ४०, १९८, १९९ द्रष्टव्य है। (यहाँ यह निदर्शनमात्र है, खोजने पर अनुसन्धाता को ऐसी अन्य बहुत गाथाएँ भी मिलेंगी।)
ऐसे उदाहरणों के आधार पर डॉ. बापट जैसे विद्वानों ने पालित्रिपिटक ग्रन्थों में सुत्तनिपात की प्राचीनता (तर-तम भेद से) सिद्ध को है। वेद के अतिरिक्त अन्य प्राचीन ग्रन्थों में छन्दों से सम्बद्ध ऐसी स्वतन्त्रता कहीं देखने को नहीं मिलती।
सुत्तनिपात के कुछ विशेष सूत्र
यों तो तथागत के सभी अमृतमय उपदेश सब प्रकार से मनुष्य को ऊँचे स्तर पर पहुँचाने वालो और परम शान्ति प्रदान करनेवाले हैं; परन्तु हम कुछ सूत्रों में अधिक विशेषताएँ भी पाते हैं। इनमें जहाँ एक और निर्वाणप्राति में तत्पर एकान्तवासी भिक्षु के लिये खग्गविसाण, धम्मचरिय, सम्मापरिब्बाजनिय, धम्मिक, सारिपुत्त जैसे सूत्रोपदेश हैं, वहाँ दूसरी ओर सांसारिक गृहस्थ के लिये पराभव, मङ्गल, हिरि, धम्पिक इत्यादि सूत्र भी उपदिष्ट हैं।
पब्वजा, पधान, नालक तथा अत्तदण्ड सूत्रों में जन्म से लेकर सम्बोधि की प्राति तक भगवान् के अनुपम जीवन की अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाओं पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ता है।
वसल तथा वासेड सूत्रों में जाति-भेद पर और सुन्दरिक भारद्वाज आदि सूत्रों में वैदिक याग-होम पर भगवान् के विचार स्पष्ट निर्दिष्ट हैं।
ब्राह्मणधम्पिकसूत्र में उस समय तथा उससे पहले के ब्राह्मणों के जीवन दो विभित्र चित्र मिलते हैं। इसमें यह दिखलाया गया है कि यज्ञ में पशु बलि का आरम्भ किस प्रकार हुआ था और पुराहितों ने उसके समर्थन में किस प्रकार मन्त्र रच डाले। इसमें पुरुषों के लिये अत्यन्तोपयोगी गौ पर भगवान् के वचन अतिशय महत्त्वपूर्ण हैं।
बहुत से सूत्रों में श्रमणों तथा ब्राह्मणों में विभक्त- आजीवक, परिव्राजक, जटिल, निगण्ठ इत्यादि उस समय के तीर्थकों (अन्य धार्मिक सम्प्रदायों) का उल्लेख आया है।
पारायणबग्ग में कोशल नरेश के पुरोहित बावरी ब्राह्मण द्वारा कोशल देश से दक्षिणापथ में जाकर गोदावरी नदी के तट पर आश्रम बनाकर रहने की बात आयी है।
भगवान् के दर्शनार्थ उसके शिष्य जिस मार्ग से राजगृह के पाषाणचैत्य आये थे उसका भी पूरा वर्णन मिलता है। उस समय का प्रसिद्ध व्यापारमार्ग भी वही रहा है। इससे भारत के उत्तरापथ तथा दक्षिणापथ के सम्बन्ध के विषय में अच्छी जानकारी हो जाती है।
धर्म, दर्शन एवं इतिहास
सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि सुत्तनिपात में हमें भगवान् बुद्ध के धर्म तथा दर्शन पर प्रचुर सामग्री मिलती है। दृष्टिवाद का प्रबल खण्डन भगवान् बुद्ध ने क्यों किया था? इसका उत्तर हमें अट्ठक तथा पारायणवग्ग में मिलता है। आगे जाकर शून्यवादियों ने और विशेष रूप से नागार्जुन ने दृष्टिवाद का जो खण्डन किया है उसके मूल बीज हमें यहाँ मिलते हैं। उस समय कोरे मत्वाद का बोलबाला था। पसूर सुत्त के शब्दों में राजभोजन से पुष्ट पहलवानों की तरह कुछ लोग दृष्टियों के खण्डन और मण्डन में तत्पर थे। इस प्रकार दृष्टिवाद के कोलाहल का जो दृश्य इन सूत्रों में अङ्कित है उससे हमें तत्कालीन दृष्टिवादियों (वितण्डावादियों) का स्मरण आता है। यही कारण है कि भगवान् ने मतवाद के भ्रमजाल (भूलभुलैये) में न पड़कर शील, समाधि तथा प्रज्ञा द्वारा शान्ति प्राप्त करने का मार्ग बताया है।
इस प्रकार धर्म, दर्शन तथा इतिहास की दृष्टि से भी सुत्तनिपात अत्यन्त महत्वपूर्ण
विचार के साक्ष्य से भी सुत्तनिपात की प्राचीनता सिद्ध है। वैदिक युग के देवयजनवाद का पूरा चित्र हमें यहाँ मिलता है। उसका वर्णन इतना सजीव है कि वह अनुभव के आधार पर हो लिखा हुआ ज्ञात होता है। भाषा और विचारों में सर्वत्र जगह एक नैसर्गिक स्वाभाविकता और सरलता मिलती है जो बौद्धधर्म के विकास के प्रथम स्तर का पर्याप्त रूप से परिचय देती है। उसकी प्रभावशीलता भी इसीलिये अत्यन्त उच्चकोटि की है।
बुद्धधर्म के नैतिक रूप का अतिशय सुन्दर चित्र भी सुत्तनिपात में मिलता है।
उरगसुत्त में निर्वाण प्राप्ति का मार्ग बताते हुए कहा गया है-
यो उप्पतितं विनेति कोर्ध, विसतं सप्पविसं व ओसधेहि।
सो भिक्खु जहाति ओरपारं, उरगो जिण्पणमिवत्तचं पुराणं ॥
[जो भिक्षु अपने क्रोध को, उसी तरह, शान्त कर देता है जैसे सर्पविष की औषध में शान्त कर दिया जाता है। वह इस पार (अपने प्रति आसक्ति) और उस पार (दूसरे के प्रति आसक्ति) को उसी प्रकार छोड़ देता है, जैसे साँप जैसे अपनी पुरानी केंचुली को छोड़ देता है। (५०-५. ३)]
राष्ट्र की विभूति का निदर्शन:
धनिय-सुत्त में गृहस्थ-सुख और भिक्षु के ध्यान-सुख की तुलना की गयी है. जिसके उद्धरण का मोह-संवरण नहीं किया जा सकता। वहाँ धनिय गोप एक सुखी गृहस्थ किसान है। पुत्र, स्त्री, धन, धान्यादि से समृद्ध है। वर्षाकाल में वह अपना हृदयोद्वार इस प्रकार प्रकट कर रहा है-
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पक्कोदनो दुद्धखीरोहमस्मि, अनुतीरे महिया समानवासो। छत्रा कुटि आहितो गिनि, अध चे पत्थयसी पवस्स देव ॥
[भात मेरा पक चुका। मैंने दूध दुह लिया। मैं मही (गंडक) नदी के तौर पर स्वजनों के साथ वास करता हूँ। मैंने कुटी छा ली है। आग सुलगा ली है। अब हे देव। तुम चाहो तो स्वेच्छया बरसो?
अन्धकमकसा न विज्जरे, कच्छे रुळ्हतिणे चरन्ति गावो।
वुद्धिं पि सहेय्युमागतं, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव ॥
[मक्खी मच्छर यहाँ पर नहीं हैं। कछार में उगी घास की गौवें चरती हैं। वर्षा भी हो तो वे उसे सह लें। अतः हे देव! अब तुम चाहो तो स्वेच्छया बरसो ।]
गोपी मम अस्सवा अलोला, दीधरत्तं संवासिया मनापा।
तस्सा न सुणामि किञ्चि पापं, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव ॥
[मेरी पत्नी आज्ञाकारी और अचञ्चल है। वह मेरी चिरकाल की प्रियसंगिनी है। उसके विषय में कोई पाप भी नहीं सुनता। अतः हे देव। अब तुम चाहो तो स्वेच्छया बरसो !
अत्तवेतनभतोहचस्थि पुत्ता च में भानिया अरोगा। तेसं न सुणाचि किशि पापं अध से पत्चयची पवस्स देव ॥
[मैं स्वयं अपनी मजदूरी करता है। मेरी सन्तान भी अनुकूल और पीरोग है। उनके विषय में कोई पाप भी नहीं सुनता। अतः हे देव। अब तुम चाहो धि स्वेच्छया बरसों)।
अत्वि बसा अत्वि धेनुपा गोधरणियो पवेणियो पि अत्धि। उसभो पि गवस्पतीध अत्थि, अध चे पत्चयसी पवस्स देव
[मेरे तरुण बैल और बछड़े हैं। गाभिन पायें हैं और तरुण गायें भी, और सब के बीच वृषभराज भी हैं। अब हे देव। चाहो तो इच्छापूर्वक बरखें।]
खोला निखाता असम्यवेधी दामा मुझपया नवा सुसण्ठाना न हि सक्खिस्सन्ति धेनुपा पि छेत्तुं अथ चे पत्थयसी पबस्स देव ॥
[खुटे मजबूत गड़े हैं, मूँज के पगहे नये और अच्छी तरह बटे हैं, बैल भी उन्हें नहीं तोड़ सकते। अतः हे देव। अब तुम चाहो तो स्वेच्छया बरसग] (५०-५.६-७)
पाँचवीं छठी शताब्दी ईसवी पूर्व के मगध कीसलवासी किसान के सुखी जीवन का यह कैसा सुन्दर चित्रण है। उसकी आशा-आकांक्षाओं का कैसा सुन्दर निरूपण है। ग्रामीण जीवन का यह चित्र, उसके सुख का यह आदर्श आज भी उतना हो सत्य है जितना बुद्ध-काल में था!
"आ ब्रह्मन्ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् .... दोग्धी धेनुवर्वोडाऽनड्वानाशुः सप्तिः पुरन्धियोंष.... निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्ताम् योगक्षेमो नः कल्पताम् ।।" (यजुर्वेद २२/२२)
यजुर्वेद की इस प्रार्थना में भी राष्ट्र की विभूति का चित्र खींचा गया है; परन्तु उसके रंग अधिक गम्भीर नहीं हैं, उसकी रेखाएँ भी अतिशय स्पष्ट नहीं हैं, जितनी सुत्तनिपात के उक्त वर्णन की।
इतना होते हुए भी सुखी कृषक के जीवन का वर्णन इस सुत्तनिपात में केवल एक पृष्ठभूमि के रूप में है, वह स्वयं अपना लक्ष्य नहीं है। उसका वर्णन यहाँ उससे बड़े एक अन्य सुख (निर्वाण) की केवल अभिव्यक्ति के रूप में किया गया है। उस सुख का उपभोग भगवान् बुद्ध कर रहे हैं। उनके उड़ारों को कृषक के उदारों से पंक्तिशः मिलाइये-
मही नदी के तट पर खुले आकाश में बैठे हुए भगवान् उमड़ते हुए मेघों को देख कर अपने प्रसन्न हृदयोद्वार प्रकट कर रहे हैं-
अक्कोधनो विगतखिलोहमस्मि, अनुतीरे महियेकरत्तिवासो ।
विवटा कुटि निव्युतो गिनि, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव ॥
[मैं क्रोध और राग से रहित हूँ। एक रात के लिये मही नदी के तौर पर ठहरा हैं। मेरी कुटी खुली है। अग्नि (रागाग्रि द्वेषाग्रि, मोहानि) बुझ चुकी है। अब हे देव। तुम चाहो जैसे बरसो !]
बद्धा हि भसी सुसङ्ख्ता, तिण्णो पारगतो विनेय्य ओघं। अत्यो भिसिया न विजति, अथ चे पत्थयसी पवस्स देव ॥
[ मैंने एक अच्छी तरणी बनाती है। मुझे तरणों की आवश्यकता नहीं। अतः देवमाह जैसे कामों।
चित्तं मम असावं विमुत्तं दीधर परिभावितं सुदनं। पापं पन में न विजति अथ चेपधारी पवम् देव ॥
[मेरा मन संयत और विमुक्त है, चिरकालपरिऔर दाना है। मुझ में कोई पाप नहीं। अतः हे देव। अब तुम चाहो जैसे बर
नाई भतकोस्मि कस्यचि निषिद्धेन चरामि मध्यलोक। अत्यो भतिया न विजति अथ चे पत्ययमी पवस्मा देव ॥
[में किसी का नौकर नहीं, अतः सारे संसार में स्वच्चन्द्रविर करता हूँ। मुझे किसी की चाकरी से प्रयोजन नहीं। अतः हे देव तुमचाही जैसे
नत्धि वमा न धेनुपा गोधरणियो प्रवेणियो पिनधि। उसभी पि गवम्पतीध मत्थि, अथ चे पत्थायसी पवस्स देव ॥
[मेरे न तरुण बैल हैं और न बछड़ेन गाभिन गायें हैं और न हसण गायें और इन सब के बीच वृषभराज भी नहीं है। अतः हे देव। अब तुम चाहो तो खूब कामी
सांसारिक सुख और समाधि-सुख को आमने-सामने रख कर कितनी सुन्दर तुलन है। सांसारिक मनुष्य कहता है-
'उपधी हि नरस्स नन्दना न हि सो नन्दति यो निरुपधि ॥
[विषयभोग ही मनुष्य के आनन्द के कारण हैं। जिन्हें नहीं आनन्द
भी नहीं।]
पर राग-विमुक्त महात्मा कहता है-
"उपधी हि नरस्स सोचना न हि सो सोचति यो निरूपधि॥"
[विषयभोग ही मनुष्य की चिन्ता के कारण है। जो विरहित चिनित
भी नहीं है।]
दोनों आदशों का इससे अधिक सुन्दर निरूपण ऐसी नाटकीय गति और संवाद शैली के साथ, सम्भवतः सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में नहीं मिल सकता। बौद्ध धर्म के आचारतत्त्व के रूप को समझने के लिये भी यह प्रकरण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है
इसी प्रकार 'खग्गविसाण सुत्त' में एकान्तवास का सुन्दर उपदेश दिया गया है। 'एको घरे खग्गविसाणकप्पो' (गैंडे के सींग की तरह अकेला विचरे से की गयी इन
गाथाओं का सौन्दर्य भी अपना है। (५०-५०८ से १४)
कृषिभारद्वाजसुत्त में हम ५०० हल लेकर कृषि कार्य में नामक ब्राह्मण के साथ भगवान् के प्रसिद्ध काव्यात्मक संवाद को देखते हैं। भिक्षा के लिये मौन खड़े हुए भगवान् को देख कर कृषि भारद्वाज करता है-आई खोस कसाभि च वपामि चः कसित्या वपित्वा च भुञ्जामि। स्वं पि समण, कंसस्तु वस्तु च कसिल्याच वपित्वा च भुञ्जस्सु"
(अमण में जोतता हूँ, बोता हूँ। अनमण तुम भी जोतो, बोओ। जोताई-बोआई कर खाओ। भगवान् कहते हैं "अहम्पि खो, ब्राह्मण, कसामि च वपामि च कमित्वा च वपित्वा च भुञ्जामि (ब्राह्मण। मैं भी जोताई बोआई करता है, जोताई बोआई कर खाता है।) आगे भगवान ने अपने इस कथन की व्याख्या आध्यात्मिक दृष्टि के को है जो बहुत सुन्दर है। (५०-५० १५-१८)
चुन्द-सुत्त में भगवान ने मागजिन (मार्ग जिन) आदि चार प्रकार के श्रमणों की व्याख्या की है।
पराभव-सुत्त में पतन के कारणों को बतलाया गया है।
वसल सुत्त में हम अग्निभारद्वाज नामक ब्राह्मण को भगवान् के प्रति यह कहते सुनते हैं-"मुण्डक! वहीं तहर! श्रमण। वहीं ठहर। वृषल वहीं ठहर। (तत्रैव मुण्डक, तत्रेव समणक, तत्रेव वसलक, तिड्डाही ति)। भगवान् ने विना क्रोध किए उस ब्राह्मण को ऐसा हितकारी उपदेश किया कि वह ब्राह्मण भगवान् बुद्ध का जीवन पर्यन्त उपासक (गृहस्थ-शिष्य) बन गया।
हेमवत सुत्त में भगवान् बुद्ध के स्वभाव का वर्णन है। अन्य अनेक बातों के साथ कहा गया है कि उनका ध्यान कभी रिक्त नहीं होता बुद्धो झानं न रिञ्चति। इसी प्रकार भगवान् बुद्ध को प्रशस्ति को है। जैसे-
मनो चस्स सुपणिहितो. सब्बभूतेसु तादिनो।
अथो इट्ठे अनिट्ठे च सङ्कप्पास्स वसीकता ।।
[उनका चित्त समाधिस्थ है। सब प्राणियों के प्रति वे एक समान हैं। इष्ट और अनिष्ट विषयक संकल्प उनके वश में हैं।]
आळवकसुत्त में आळवक यक्ष के साथ भगवान् का संवाद है, जिसकी तुलना महाभारत में युधिष्ठिर और यक्ष के संवाद से की जा सकती है। यक्ष के किं सु हवे सादुत्तरं रसानं इस प्रश्न के उत्तर में कि सब रसों में कौन सा रस उत्तम है? भगवान् ने कहा है 'सच्चं हवे सादुतरं रसानं' (सत्य हो सब रसों में उत्तम है।) (द्र०- पृ० ३५)
अन्त में, ब्राह्मण बावरि के शिष्यों का भगवान् से संवाद (पारायणवर्ग) तो विश्व के दार्शनिक काव्य का सर्वोत्तम उदाहरण कहा जा सकता है। इसी प्रकार पब्बज्जा, पधान और नालक सुत्त भी अपनी आख्यानात्मक गीतात्मकता के साथ साथ दार्शनिक गम्भीरता में अपनी तुलना नहीं रखते।
यद्यपि यहाँ सुत्तनिपात की गाथाओं के अनेक अंश, जिनमें आख्यान भी कहीं कहीं कलात्मक सुन्दरता के साथ अनुविद्ध हैं, विस्तृत उद्धरणों की अपेक्षा रखते हैं, किन्तु विस्तार-भय से ऐसा नहीं किया जा सकता। वास्तव में सुत्तनिपात में सभी कुछ इतना महत्त्वपूर्ण और इतना आकर्षक है कि कुछ समझ में नहीं आता कि उसकी सुन्दरता का कौन सा आदर्श (नमूना) सामने रखा जाय ! वह समस्त (सब का सब) बौद्ध साहित्य में जो कुछ भी अत्यन्त सुन्दर और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, उसका प्रतिमान है। फिर भी पाँचवें वर्ग (पारायणवग्ग) में बुद्ध के समकालिक गोदावरी-तटवासी प्रसिद्ध वेदज्ञ ब्राह्मण बावरि के १६ शिष्यों के भगवान् बुद्ध के साथ जो उदात्त गम्भीर संलाप हुए उनको आप यथास्थान प्रन्य में देख सकते हैं। यहाँ आप देखेंगे कि वैदिक परम्परा के सच्चे साधकों ने भी बुद्ध को कितना शीघ्र पहचान लिया था और उन्हें कितना उच्च स्थान दिया था।
इस ग्रन्थ को ऐसा महत्त्वशाली मान कर ही आर्य शारिपुत्र ने भी इस ग्रन्थ के अन्तिम दो वर्गों पर निदेस नाम से एक व्याख्या लिखी जिसको प्रथम सङ्गीति में ही स्थविर सङ्गीतिकारों ने त्रिपिटक में परिगणित कर लिया।
सुत्तनिपात की विषयवस्तु
सुत्तनिपात की विषय-वस्तु पाँच वर्गों में विभक्त है-१. उरगवग्ग २. चूलवग्ग ३. महावग्ग, ४. अटुकवग्ग और ५. पारायणवग्ग।
प्रथम वर्ग में १२ सुत्त है, यथा-१. उरग, २. धनिय, ३. खग्गविसाण, ४. कसिभारद्वाज, ५. चुन्द, ६. पराभव, ७. वसल, ८. मेत्त, ९. हेमवत, १०. आळवक, ११ विजय और १२. मुनिः
द्वितीय वर्ग में १४ सुत्त हैं, यथा १. रतन, २. आमगन्ध, ३. हिरि, ४. महामंगल, ५. सूचिलोम, ६. धम्मचरिय, ७. ब्राह्मणधम्मिय, ८. नावा, ९. किंसोल, १०. उडान, ११. राहुल, १२. वंगीस, १३. सम्मापरिब्बाजनिय एवं १४. धम्मिक।
तीसरे वर्ग में १२ सुत्त हैं यथा-१. पब्बज्जा, २. पधान, ३. सुभाषित, ४. सुन्दरिकभारद्वाज, ५. माघ, ६. सभिय, ७. सेल, ८. साद, ९. वासेट्ट, १०. कोकालिक, ११. नालक एवं १२. द्वयतानुपस्सना।
चौथ वर्ग में १६ सुत्त हैं, यथा- १. काम, २. गुहट्ठक, ३. दुट्ठट्ठक, ४. सुद्धद्धक, ५. परमद्रुक, ६. जरा, ७. तिस्समेत्तेय्य, ८. पसूर, ९. मागन्दिय, १०. पुराभेद, ११. कलहविवाद, १२. चूळवियूह, १३. महावियूह, १४. तुवटक, १५. अत्तदण्ड एवं १६. सारिपुत्त।
पाँचवें वर्ग में १७ प्रकरण हैं-१. वत्थुगाथा, २. अजितमाणवपुच्छा, ३. तिस्स-मेत्तेयमाणवपुच्छा, ४. पुण्णकमाणवपुच्छा, ५. मैत्तगुमाणवपुच्छा, ६. धोतकमाणवपुच्छा, ७. उपसीवमाणवपुच्छा, ८. नन्दमाणवपुच्छा, ९. हेमकमाणवपुच्छा, १०. तोदेय्य-माणवपुच्छा, ११. कप्पमाणवपुच्छा, १२. जतुकण्णिमाणवपुच्छा, १३. भद्राबुध-माणवपुच्छा, १४. उदयमाणवपुच्छा, १५. पोसालमाणवपुच्छा, १६. मोघराजमाणवपुच्छा एवं १७. पिंगियमाणवपुच्छा।
सुत्तनिपातपालि का सार-संक्षेप
सङ्गीतिकारों ने इस सुत्तनिपातपालि का वर्ग, सूत्र एवं गाथा-इस प्रकार विधा विभाजन कर व्याख्यान किया है। इस में पाँच वर्ग ये हैं-१. उरगवर्ग, २. बूढवणं
३. महावर्ग, ४. अष्टकवर्ग एवं ५. परायणवर्ग। इन पाँच वर्गों में ७१ सूत्र हैं। जैसे उरगवर्ग में १२ सूत्र, चुकवर्ग में १४ सूत्र, महावर्ग में १२ सूत्र, अष्टकवर्ग में १६ सूत्र एवं पञ्चम परायणवर्ग में १७ सूत्र।
इन ७१ सूत्रों में क्रमशः सब मिला कर एक हजार एक सौ छप्पन गाथाएँ निबद्ध है।
प्रत्येक सूत्र की वस्तुकथा का संक्षेप यह है:
१. उरगवर्ग: (इस वर्ग में १२ सूत्र हैं)
१. उरगसूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने भिक्षुओं को उपदेश किया है कि जैसे सर्प अपनी पुरानी केंचुलों को विना किसी ममत्व के त्याग देता है वैसे ही भिक्षु को अपने क्रोध, राग, तृष्णा, मान, संसार में ममत्व, तर्क वितर्क आदि का त्याग कर संसार की तुच्छता का चिन्तन करते हुए अपने अकुशल कमाँ का नाश कर देना चाहिये ॥
२. धनियसूत्र : इस सूत्र में धनिय गोप के माध्यम से भगवान् ने कहा है कि भिक्षु को सांसारिक कृत्यों से निवृत्त हो कर आध्यात्मिक चिन्तन करते हुए सांसारिक सुख दुःय शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वों को सहन करते रहना चाहिये ॥
३. खड्गविषाणसूत्र : भिक्षु को चाहिये कि वह प्राणियों के प्रति सर्वविध हिंसा का
त्याग कर, उनके प्रति कोई भी सांसारिक संसर्ग न रखता हुआ, सर्वत्र आसक्तिरहित हो कर एकाकी रह कर साधना करे। मित्रों के साथ कोई भी वार्तालाप, क्रीड़ा आदि न करते हुए, परिवार में आसक्ति न दिखाते हुए, यथालाभ सन्तुष्ट रहते हुए, रूक्ष व्यवहार वाले अन्य भिक्षु एवं गृहस्थों से निरपेक्ष रहते हुए एकाकी ही धर्मसाधना में रत रहे। साधक भिक्षु गुणवान् सहायक न मिलने पर, नागवन के हाथी के समान, एकाकी ही साधनारत रहे। सांसारिक कामभोगों को विपत्ति, व्रण, उपद्रव एवं रोग समझते हुए, शीत उष्ण, भूख प्यास, सुख दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करते हुए एकाकी ही साधनारत रहे। वह जनसमूह को तथा पापी मित्र को त्याग कर, बहुश्रुत धर्मधर भिक्षुओं का सङ्ग करते हुए सत्य आचरण के साथ साधनारत रहे। और वह स्त्री पुत्र, धन धान्य एवं बन्धु बान्धवों में निरासक्त हो कर गैंडे के सींग के समान एकाकी रहता हुआ साधनारत रहे। अथ च, मैत्री करुणा मुदिता एवं उपेक्षा की भावना करते हुए सर्वत्र द्वेषरहित हो कर साधक को गैंडे के सींग के समान एकाकी रह कर साधना करनी चाहिये ॥ इस सूत्र की निद्देस में भी विस्तृत व्याख्या है।
४. कृषिभारद्वाजसूत्र : इस सूत्र में कृषिभारद्वाज ब्राह्मण के लौकिक कृषिकर्म से अपनी आध्यात्मिक साधना की तुलना करते हुए भगवान् ने साधक भिक्षु को बताया कि वह श्रद्धा, तप, प्रज्ञा, लज्जा एवं स्मृति के साथ निर्वाणप्राप्तिहेतु साधना में सतत व्याप्त रहे। प्रसङ्गवश, भगवान् ने इस सूत्र में भिक्षु के लिये धर्मोपदेश से प्राप्त भोजन के उपभोग का भी सर्वथा निषेध किया है ॥५. चुन्दसूत्र इस सूत्र में भगवान ने श्रमणों के चार भेद बताये हैं। जैसे-१.
२७ मार्गजिन (निर्वाणाभिरत), २. मार्गदेशक (सन्मार्गोपदेष्टा), ३. मार्गजीवी (सन्मार्ग से जीवनयापन करने वाला), तथा ४. मार्गदषक (साधकवेषधारी परन्तु धूर्त, असंयत, धर्मविरुद्ध आचरण करने वाला भिक्षु ॥
६. पराभवसूत्र : भगवान् ने किसी देवता की जिज्ञासा पर लौकिक पराजय के ये
बारह कारण बताये: जैसे-१. धर्म से द्वेष, २. पापियों की सङ्गति, ३. बहुत अधिक शयन, आलस्य एवं क्रोध, ४. सामर्थ्य होने पर भी माता पिता की सेवा न करना, ५. समर्थ होते हुए भी किसी याचक को दान न दे कर मिथ्या आश्वासन देना, ६. सम्पन्न होते हुए भी अपने ऐश्वर्य का एकाकी ही उपभोग करना, ७. अपने कुल, गोत्र, धन आदि का अभिमान करते हुए स्वजातीय बान्धवों का अपमान करना, ८. अधिक स्त्रियों से सम्पर्क (वेश्यागामी होना): ९. अपनी धर्मपत्नी से असन्तोष तथा परस्त्रीगमन; १०. विनष्टयौवन पुरुष का नवयुवती से विवाह; ११. लोभी, लालची तथा सम्पत्ति को नष्ट करने वाली स्त्री या पुरुष को शासनाधिकार देना; तथा १२. अल्प सम्पत्ति वाले किसी क्षत्रियकुलोत्पन्न पुरुष की राज्यप्राप्ति की इच्छा ॥
७. वृषलसूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने अग्निकभारद्वाज ब्राह्मण को वृषल (शूद्रत्व-
) कारक धर्मों की पहचान बतायी है। जैसे- क्रोधी, पापी, ईष्यालु, मायावी, परायी सम्पत्ति को बलपूर्वक अपना बनाने वाला, ऋण लेकर पुनः न चुकाने वाला, डाकू, लुटेरा, मिथ्या साक्ष्य देने वाला, अपने पापकर्मों को छिपाने वाला पुरुष 'वृषल' कहलाता है।
८. मैत्रीसूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने समस्त साधकों को प्राणिमात्र के प्रति मैत्री भावना का उपदेश किया है। साथ ही उन को चेतावनी दी है कि वह काय वाक् एवं मन से व्यवहार में अतिशय सरल बने। सन्तोषी, अनासक्त तथा शान्तचित्त रहे। कोई भी मिध्यादृष्टि ग्रहण न कर आचारवान् रहे ॥
९. हैमवत सूत्र : इस सूत्र में सातगिर एवं हैमवत-इन दो यक्षों का तथागत-
विषयक संवाद वर्णित है ॥
१०. आळवक सूत्र : इस सूत्र में भगवान् द्वारा उद्दण्ड आळवक यक्ष का दमन एवं
उसके कुछ प्रश्नों का उत्तर वर्णित है ॥
११. विजयसूत्र : भगवान् का उपदेश है कि साधक अपना ईर्यापथ (शारीरिक चेष्टाएँ) शुद्ध रखे। शरीर के प्रति अशुभ भावना रखे ॥
१२. मुनिसूत्र : इस सूत्र में तथागत ने जिज्ञासुओं को संसर्ग एवं आसक्ति से रहित जीवन जीने का उपदेश किया। साथ ही 'मुनि' के लक्षण भी बताये; जैसे- प्रज्ञाबल से युक्त, शीलवान्, व्रती, समाधिनिष्ठ, ध्यानी, स्मृतिमान्, भवबन्धनमुकत एवं क्षीणचित्ताश्रव साधक को 'मुनि' कहते हैं। इत्यादि ॥ (१)
२. चूड़वर्ग : (इस वर्ग में १४ सूत्र हैं)
१. रत्नत्रय सूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने रत्नत्रय (बुद्ध, धर्म एवं सङ्घ) की श्रेष्ठता बताते हुए इन तीनों को हो संसार के लिये हितकर एवं है। सूत्र खुरकपाठपालि में भी अक्षरशः वर्णित है।
२. आमगन्धसूत्र: लोकव्यवहार में 'कच्चा मांस' के अर्थ में प्रयुक होता है, परन्तु इस सूत्र के उपदेश में इस बार चाल दिया गया है कि पुछली या मांस के वर्जन लिये सभी पापों का परित्याग भी अत्यावश्यक है। इस सम्बन्धमबुद्धने पूर्व बुद्ध भगवान् काश्यप द्वारा तिष्य तपस्वी को उपदिश वचन हो, यहाँ आधा करे, सुनाये हैं।
३. ह्रीसूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने तो बालों के लिये साधक को सचेत किया है-१. कैसे मित्र को सङ्गति करनी चाहिये ? २२. मनुष्य के जीवन का क्या उदेश्य होना चाहिये? तथा ३. सर्वोत्तम रस क्या है?
४. मङ्गलसूत्र : इस सूत्र में किसी देवता के पूछने पर भगवान् ने कुछ मङ्गलकार्यों की गणना की है। जैसे-मूखों का सङ्ग न करना, बुद्धिमानों का सङ्ग करना पूजनीयों की पूजा, अनुकूल स्थान में वास, अत्यधिक विद्वत्ता शिष्ट एवं शिक्षित होना, माता पिता को सेषा, पत्त्रो पुत्र आदि का संरक्षण, दान, धर्माचरण बन्धुबान्धवों का सत्कार, वृद्धों का सम्मान, चौरी व्यभिचार मदद्यपान आदि से दूर रहना, धर्मप्रवचन का श्रवण आदि कर्म माङ्गलिक ही बताये हैं। (यह सूत्र खुद्दकपाठपालि में भी आ चुका है।
५. सूचिलोमसूत्र : इस सूत्र में सूचिलोमयक्ष ने भगवान् के माध्यम से किसी भी सन्त पुरुष की पहचान (संज्ञान) के लक्षण बताये हैं॥
६. धर्मचर्यासूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने पाषण्डी भिक्षुओं का सङ्घ से निष्कासन तथा सद्भिक्षुओं को निर्वाणहेतु सतत प्रयत्नशील रहने का उद्बोधन किया है।
७. ब्राह्मणधार्मिकसूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने कुछ ब्राह्मणों की जिज्ञासा पर पुराण
ब्राह्मणों को शुद्ध जीवनचर्या एवं वर्तमान ब्राह्मणों के पाषण्डमय चरित्र का विशद वर्णन किया है। साथ ही हिंसामय यज्ञों का प्रबल विरोध किया है। अन्त में गोरक्षा का पूर्ण समर्थन करते हुए गोहत्या को कुत्सित एवं निन्दनीय बताया है। (बौद्ध मत को समझने के लिये यह महत्त्वपूर्ण सूत्र है।)
८. नौसूत्र : इस सूत्र में चतुर नाविक के दृष्टान्त से भगवान् ने सदुरु का माहात्म्य प्राञ्जल शब्दों में वर्णित किया है ॥
९. किंशीलसूत्र : इस सूत्र में यही बताया गया है कि कैसे शील, कैसे आचार, तथा कैसे कर्म करता हुआ साधक पुरुष धर्म में सुप्रतिष्ठित हो कर उत्तम अर्थ (निर्वाण) को प्राप्त कर सकता है।
१०. उत्थानसूत्र : उद्योग (प्रयत्न प्रदहन प्रधान) के आश्रयण से ही सर्वविध दुःखों का अन्त हो सकता है- यही इस सूत्र का वर्ण्य विषय है ॥११. राहुलसूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने आयुष्मान् राहुल को सांसारिक कामनाओं को दूर कर निर्वाणप्राप्तिहेतु सतत प्रयत्नशील रहने का उपदेश किया है ॥
१२. न्यग्रोधकल्पसूत्र : न्यग्रोधकल्प नामक भिक्षु का अग्रालव चैत्य में देहपात हो जाने के बाद, उस के शिष्य आयुष्मान् वङ्गीश द्वारा उस भिक्षु की सदृति के विषय में जिज्ञासा किये जाने पर भगवान् ने बताया कि इस न्यग्रोधकल्प भिक्षु की जन्ममरणपरम्परा समास हो चुकी है; क्यों कि इस के पापस्रोतों का समूल उच्छेद हो चुका था। (यह सूत्र थेरगाथापालि में भी वङ्गीसथेरगाथा शीर्षक से अक्षरशः वर्णित है।) ॥
१३. सम्यक्परिव्राजनीयसूत्र इस सूत्र में साधक भिक्षु के लिये अनुकरणीय आदर्श
मार्ग का विस्तृत विवेचन है ॥
१४. धार्मिकसूत्र: इस सूत्र में किसी देवता द्वारा पूछे जाने पर, भिक्षुओं के तथा सद्गृहस्थों के आचरणीय कर्त्तव्यों का पृथक् पृथक् विस्तृत विवेचन है। जहाँ भिक्षुओं को ग्राम में समय पर ही भिक्षा कर एकान्तवास में सतत धर्मसाधना आवश्यक बतायी गयी, वहीं गृहस्थ को भी हिंसा, चौरी, असत्य भाषण, व्यभिचार एवं मदद्यपान से सदा सर्वथा दूर रहना,
आवश्यक बताया है ॥ (२)
३. महावर्ग :
(इस वर्ग में १२ सूत्र हैं)
१. प्रव्रज्यासूत्र : इस सूत्र में आयुष्मान् आनन्द ने, राजा बिम्बिसार से हुए भगवान् के संवाद के माध्यम से, प्रव्रज्या से पूर्व भगवान् की मनःस्थिति का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है। साथ ही यह भी बताया है कि उस समय भगवान् एवं राजा में परस्पर इतने उच्चतम मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे कि वे दोनों एक दूसरे के लिये कोई भी लौकिक त्याग करने को सत्रद्ध थे॥
२. प्रधानसूत्र : इस सूत्र में बताया गया है कि भगवान् ने राजगृह से चल कर नेरञ्जरा नदी के रम्य तट पर बैठ कर की गयी दुष्कर साधना के समय मार द्वारा प्रदत्त प्रलोभनों को कथमपि ने स्वीकार नहीं किया।
३. सुभाषितसूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने सुभाषित वचन की प्रशंसा की है। वह सुभाषित भी ऐसा हो जो धर्मयुक्त, प्रियवचनयुक्त तथा सत्य से सम्पृक्त हो। आयुष्मान् वङ्गोश ने भी अपनी काव्यमयी वाणी में भगवान् के उन वचनों का विस्तार किया।
४. सुन्दरिकभारद्वाज सूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने सुन्दरिका नाँ तट के वासी
अग्निहोत्री सुन्दरिकभारद्वाज ब्राह्मण को अपना परिचय देते हुए बताया कि मैं न ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय, न वैश्य और न शूद्र। मैं तो सङ्घाटि एवं चीवर धारण करने वाला अपरिग्रही भिक्षु हूँ, मेरा शिर मुँडा हुआ है, तथा जनता मुझ को मेरे गौतम गोत्र से जानती है। ब्राह्मण। तुम मेरा गोत्र पूछ कर क्या करोगे ? हाँ। तुम यदि अपने को ब्राह्मण मानते हो तो तुम सावित्री छन्द का विस्तार बताओ ? सुन्दरिक भारद्वाज के असमर्थ होने पर भगवान् ने उस को उपदेश करते हुए समझाया कि किसी सन्त के मिलने पर उस से उसको जाति आदि न पूछ कर उस से केवल धर्मचर्चा करनी चाहिये। प्रसङ्गवश यह भी बताया कि आहुति से अवशिष्ट अन्न की प्राप्ति का अधिकारी कौन है। (तथागतो अरहति पूरळासं) ।
५. माघसूत्र : दानी माध माणवक द्वारा दक्षिणार्ह पुढलविषयक जिज्ञासा करने पर भगवान् ने उस को बताया कि दान का उचित अधिकारी केवल ज्ञानी, संसार के प्रति अनासक्त, वीततृष्ण, राग-द्वेष-मोह से रहित, भवबन्धनमुक्त, अपरिग्रही, समाधिनिष्ठ एवं स्मृतिमान् पुरुष ही होता है।
६. सभियसूत्र : इस सूत्र में भगवान् नै सभिय परिव्राजक के उन पाँच प्रत्रों का उत्तर दिया था, जिन का उत्तर उस को तत्कालीन पूरण काश्यप आदि शास्ता भी नहीं दे पाये थे ॥
७. शैल सूत्र : इस सूत्र में भगवान् की दिव्य तेजस्विता से प्रभावित हो कर शैल ब्राह्मण ने भगवान् से प्रवज्या ग्रहण की तथा केणिय जटिल ने भिक्षुसङ्घसहित भगवान् को उत्तम भोजन कराया तथा उनका उपासकत्व स्वीकार किया ॥
८. शल्यसूत्र : इस सूत्र में भगवान् ने साधारण मनुष्यों के जीवन को निरुदेश्य, अज्ञात, कठिन, स्वल्प एवं दुःखयुक्त बताते हुए मृत पुरुष के प्रति रुदन, शोक एवं विलाप का निषेध तथा धर्मसाधना द्वारा शान्त जीवन व्यतीत करने का उपदेश किया है॥
९. वाशिष्ठसूत्र : किन्हीं भारद्वाज एवं वशिष्ठ के दो शिष्यों में पुरुष की जातिगत उच्चता नीचता पर विवाद हो रहा था। वे उस पर निर्णय कराने के लिये भगवान् के सम्मुख आये। तब भगवान् ने अकाट्य तर्कों के साथ पुरुष की जन्मगत उच्चता नीचता का पूर्णतः खण्डन करते हुए कर्मणा जाति का समर्थन किया। वे कहते हैं- "न कोई जन्म से ब्राह्मण होता है, न कोई शूद्रः अपितु कर्मानुसार ही कोई ब्राह्मण होता है और कोई शूद्र ॥"
१०. कोकालिकसूत्र : कोकालिक भिक्षु भगवान् के विरोधी देवदत्त का अनुयायी था। वह भी, देवदत्त के समान ही, सारिपुत्र एवं मौद्रल्यायन का विरोधी था। उस ने कभी भगवान् के सम्मुख आ कर सारिपुत्र एवं मौदृल्यायन पर भिक्षुत्वविरोधी दोषारोपण किया। भगवान् द्वारा निषेध करने पर भी वह उन दोनों पर दोषारोपण करता ही रहा। अन्त में, वह ज्यों ही वहाँ से उठ कर चला, मार्ग में ही उस के समस्त शरीर में व्रण उद्धृत हुए। अन्त में, वे व्रण विल्वफल के समान आकार धारण कर फूट गये। उनकी भयङ्कर वेदना से उस का देहपात हो गया और वह सीधे नरक में जा गिरा। प्रसङ्गवश यहाँ सभी नरकों का नामग्रहणपूर्वक विस्तृत वर्णन है ॥
११. नालकसूत्र : असित ऋषि ने जब देवताओं से सुना कि मनुष्यलोक में बुद्ध
अवतरित हुए हैं तो वे तत्काल मानवलोक में आये और कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के राजप्रासाद में जा कर उन ने भगवान् के दर्शन किये। शिशु के विलक्षण एवं दिव्य शारीरिक चिह्नों को देख कर उन को विश्वास हो गया कि यह शिशु एक दिन बुद्ध हो कर लोक में धर्मचक्रप्रवर्तन करेगा। तब उन ने प्रमुदित हो कर अपने प्रिय भागिनेय नालक को सचेत किया कि जब यह शिशु धर्मसाधना पूर्ण कर बुद्ध बने तब इसके उपदेशानुसार ही तुम धर्मसाधना में दत्तचित्त हो जाना। नालक ने अपने मामा (ऋषि) का आदेश मान कर भगवान् के बुद्ध बनने के बाद उनकी शरण ग्रहण की तथा अपना भिक्षु बनने का सङ्कल्प उनके सम्मुख प्रकट किया। तब भगवान् ने उस को विस्तारपूर्वक भिक्षुचर्या का उपदेश किया ॥
(यह उपदेश इतना हृदयग्राही है कि सम्राट् अशोक ने शिलालेख उत्कीर्ण करा कर प्रायेक भिक्षु से इस पर आचरण करने का आग्रह किया है)॥
१२. द्वयतानुपश्यनासूत्र : आर्य सम्बोधि में प्रवर्तक धर्मों के प्रवण से यह सुविधा होती है कि दो धर्मों के यथार्थ ज्ञान का लाभ हो जाता है। वे दो धर्म हैं-१. अनागामिता एवं अर्हत्व। उक्त कल्याणकारक धर्म इस सूत्र में १६ गिनाये हैं। जैसे- १. आर्य-सत्यचतुष्टय, २. चित्तविकार, ३. अविदधा, ४. संस्कार, ५. विज्ञान, ६. स्पर्श, ७. वेदना, ८. तृष्णा, ९. उपादान, १०. आरम्भ (प्रयत्र), ११. आहार, १२. चञ्चलता (इञ्जित), १३. चपलता, १४. रूप १५. सत्य एवं १६. दुःख ॥ (३).
४. अष्टक वर्ग: (इस वर्ग में १६ सूत्र हैं।)
१. कामसूत्र: इस सूत्र में कामतृष्णा (लौकिक एवं दिव्य कामभोगों की इच्छा) के
अनेक दुष्परिणाम बताये हैं।
२. गुहाष्टकसूत्र : इस सूत्र में अनेक उदाहरणों द्वारा संसार की तुच्छता समझाते हुए निर्वाणप्राप्ति हेतु सतत प्रयत्नशील रहने का उपदेश किया है।
३. दुष्टाष्टक सूत्र: इस सूत्र में किसी मिथ्या धर्मोपदेष्टा की मिच्यादृष्टि (अनार्य धर्म) का आलम्बन न कर, यथार्थ धर्मोपदेष्टा के मत (आर्य धर्म) का आश्रयण कर स्वतन्त्र साधना हेतु प्रयत्नवान् होने का उपदेश किया है।
४. शुद्धाष्टकसूत्र : इस सूत्र में प्रज्ञा (परम ज्ञान) से उद्भुत अनासक्ति भाव से ही संसार से मुक्त होना सम्भव बताया गया है।
५. परमाष्टकसूत्र : यह सूत्र बताता है कि सत्य का साक्षात्कर्ता किसी दार्शनिक विवाद में नहीं उलझता। परन्तु जो अपनी दृष्टि (मत) के मोह में फैंस कर अन्य सब को अपनी अपेक्षा हीन समझता है, बुद्धिमान् लोग ऐसे पुरुष को ग्रन्थ (किसी मतवाद) में उलझा हुआ ही कहते हैं। अतः साधक किसी दृष्टि, श्रुति, विचार या शीलव्रत के जाल में न फैसे ॥
६. जरासूत्र : इस सूत्र में बताया गया है कि इस लघु जीवन में मनुष्य को तृष्णानाशक मुक्ति की गवेषणा ही एकमात्र श्रेष्ठ कर्म है। अतः बुद्धिमान् साधक तृष्णा की ओर न झुके। जो यहाँ कभी देखे सुने जाते हैं, उन के देहपातानन्तर, उन की चर्चामात्र रह जाती है। सर्वत्र अनासक्त (वीततृष्ण) मुनि न किसी से स्नेह करता है, न द्वेष। वह जल से वितृष्ण कमल पत्र के समान स्वयं पर न किसी के विलाप का और न मात्सर्य का हो प्रभाव पड़ने देता है।
७. तिष्यमैत्रेयसूत्र : इस सूत्र में यही बताया गया है कि मैथुन (स्त्रियों से व्यभिचार) से दूर रहने वाला अर्थात् ब्रह्मचर्यपूर्वक साधना करने वाला ही एकान्तवास की शिक्षा ग्रहण कर सकता है।
८. प्रचुर (पसूर) सूत्र: मुक्तिप्राप्त एवं सभी प्रकार के दृष्टिवादों (मतों) से दूर रहने वाले साधक ही कुशल श्रमण कहलाते हैं। क्यों कि वाद विवाद में मानातिमान का गर्व उसकीपराजयभूमि भी हो सकता है- इस बात को समझता हुआ श्रमण कभी वाद विवाद में न उलझे ॥
९. मागण्डियसूत्र: इस सूत्र में भगवान् ने मागण्डिय ब्राह्मण के दृष्टिवाद का खण्डन करते हुए कहा कि सभी धर्मों की परीक्षा के बाद मेरे जैसा मुसा पुरुष किसी भी मत को स्वीकार नहीं कर सकता। इन मतवादों का परिणाम देखने के बाद, उन में आसक्त न ही कर मैंने आध्यात्मिक शान्ति की गवेषणा की तथा उस को प्राप्त कर लिया ॥
१०. पुराभेदसूत्र : इस सूत्र में 'शान्तचित्त' एवं 'मुनि' तथा 'विगततृष्ण' आदि
शब्दों को व्याख्या की गयी है।
११. कलहविवादसूत्र : इस सूत्र में कलह, विवाद, विलाप आदि की उत्पत्ति बताते
हुए कहा गया है कि ये सभी दुर्गुण प्रिय वस्तुओं के कारण उद्भुत होते हैं। तथा इन प्रिय वस्तुओं के उद्भव का कारण होती है- इच्छा। इस इच्छा के कारण हो पामरजन संसार में इधर उधर भटकते रहते हैं। तृष्णा एवं पूर्ति का कारण भी यही इच्छा है। ये सब कारण मिल कर मनुष्य के पुनर्जन्म के कारण बनते हैं ।॥
१२. चूडब्यूहसूत्र: इस सूत्र में बताया गया है कि मत की भिन्नता से सत्य में भिव्रता आ जाती है। साधारण लोग स्व स्व मत में आग्रही हो कर विवादों में उलझते हुए स्वयं को नाना प्रकार से ज्ञानी समझते हैं तथा कहते हैं- 'जो इस मेरे मत को जानता मानता है वही जानी है. जो इस की निन्दा करता है वह ज्ञानी नहीं है। परन्तु वस्तुतः जो तौर्थिक स्वमत में आग्रही हो कर अन्य श्रमणों को 'मूर्ख' कहता है, वह अन्य के धर्म को अग्राह्य बताने वाला कलह को निमन्त्रण देता है। अतः निर्वाण को निर्विवाद भूमि समझने वाला साधक किसी प्रकार के बाद में न पड़े'॥
१३. महाव्यूहसूत्र: इस सूत्र में यही सिद्ध किया गया है कि दृष्टि (मत) वाद का
परित्यागी तथा सत्य का साक्षात्कर्ता ही निर्वाण प्राप्त कर सकता है ॥
१४. तुवटक (त्वरितक) सूत्र इस सूत्र में निर्वाणप्राप्तिहेतु भिक्षु के आवश्यक
कर्तव्य बताये गये हैं। जैसे- वह अहङ्कार को जगत्प्रपञ्च का आदि कारण समझ कर उस का सर्व प्रकार से अन्त कर दे। अपने आन्तरिक एवं बाह्य गुणों पर गर्व न करे। उन गुणों के कारण स्वयं को किसी से श्रेष्ठ, मध्यम या हीन न समझे। अपने आन्तरिक उद्वेग को शान्त रखे। स्वचित्त में किसी के प्रति तृष्णा का भाव न उत्पन्न होने दे। अन्नपान का संग्रह, व्यर्थ भ्रमण, अतिनिद्रा आदि का त्याग करता हुआ छल, प्रपञ्च, व्यर्थ परिहास, लौकिक क्रोडा एवं मैथुन आदि का सर्वधा परित्याग करे। स्वनिन्दा से विचलित न हो, प्रशंसा पर गर्व न करे। इत्यादि ॥
१५. आत्मदण्डसूत्र : इस सूत्र में तृष्णारहित रहने वाले साधक को निर्वाणप्राप्ति के
अनेक उपाय बताये गये हैं॥
१६. सारिपुत्रसूत्र : इस सूत्र में आयुष्मान् सारिपुत्र की जिज्ञासा का भगवान् ने भिक्षुजीवनचर्या के विषय में विस्तार से निर्देश किया है। धीर, स्मृतिमान् एवं संयत आचार वाला भिक्षु कामभोगों से, मक्खी मच्छर से, साँप विच्छु से तथा पापो मनुष्यों से भय न माने।भूख प्यास, सदो गर्मी, रोग आदि को सहन करे। चौरी, असत्य भाषणव्यभिचारधार करे। सब के प्रति मैत्रीभाव रखे। क्रोध तथा अभिमान न करे। एकान्तवाम में साधना करने के अरुचि न रखे। सांसारिक शोक सन्ताप एवं व्यर्थ तर्क से दूर रहे। आप सब आदि से यथालाभ सन्तुष्ट रहे। क्रोध पर नियन्त्रण रखे। कल्याणमित्रों को सङ्गति करे। रूपरसगन्ध शब्द एवं स्पृष्टव्य विषयों से जन्य आसक्ति पर नियन्त्रण रखे। तथा समय समय पर धर्मानुशीलन करता हुआ एकाग्रचित्त रह कर स्वकीय अज्ञानान्धकार के नाश हेतु प्रयत्नशील रहे।
(इस सूत्र को भी अशोक के शिलालेख में भिक्षुओं के लिये बताया है।) (४)
५. पारायणवर्ग : (इस में १७ सूत्र या पिपृच्छा वर्णित हैं)
वस्तुगाथा : मन्त्रपारङ्गत एवं अकिशनत्य की कामनाकोबावरी नामक ब्राह्मण श्रावस्ती से चल कर भारत के दक्षिण भाग में गोदावरी नदी के तट पर आकर उज्छवृत्ति या कन्द मूल फल आदि खा कर जीवन-निर्वाह करता हुआ साधना कर रहा था। कुछ समय बाद, जनता में प्रख्यात हो कर वह एक विशाल ग्राम का अधिपति हो गया। तब उसने एक वृहत् यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के अन्त में उसने अपना सब कुछ परिया याचकों को दान कर दिया। इस प्रकार रिक्तहस्त हो कर जब वह पुनः अपने आक्रम में प्रविष्ट हुआ, उसी समय उसके पास एक वृद्ध याचक ब्राह्मण आया और उसने उससे पाँच सौ कार्षापण माँगे। बावरी द्वारा सत्य घटना बता कर इतने कार्षापण देने में अपनी असमर्थता प्रकट करने पर उस वृद्ध ब्राह्मण ने क्रुद्ध हो कर उसक। शाप दे दिया कि यदि तुम मुझ को पाँच सी कार्षापण न दोगे तो आज से सातवें दिन तुम्हारा मूर्धा (शिर) सौ भागों में खण्डित हो जायगा। यह सुन कर बावरी ब्राह्मण बहुत दुःखी एव भयाक्रान्त हो गया। इस दुःख एवं भय के कारण उस का अन-पान सब कुछ छूट गया। तथा वह धर्मसाधना से भी उपरत हो गया। तभी उसके हितैषी देवता ने आ कर उस को समझाया कि वह श्रावस्ती जा कर पाषाण चैत्य में विराजमान भगवान् बुद्ध से उस शाप की निवृत्ति का उपाय पूछे। परन्तु बावरी, अतिशय वृद्ध होने के कारण, इतना दूर जाने में सर्वथा असमर्थ था। अन्त में, उसने अपने सोलह (१६) बुद्धिमान् एवं वेदपारङ्गत शिष्यों को, इस शापनिवृत्ति का उपाय पूछने के लिये, भगवान् बुद्ध को सेवा में भेजा और उन को भगवान् बुद्ध की बत्तीस महापुरुषों वाली पहचान बतायी। तब वे सोलह शिष्य गोदावरी से चल कर पाषाण चैत्य (राजगृह) में भगवान् के दर्शनहेतु पहुँचे। दर्शन करते ही ये सभी शिष्य भगवान् बुद्ध से प्रभावित हो गये। उधर भगवान् ने भी, उन के बिना पूछे हो, उन के गुरु बावरी की आयु, गोत्र, शरीर के तीन विशिष्ट लक्षण, तथा अध्ययन सब कुछ बता दिया। साथ ही 'मूर्धा' एवं 'मूर्धाधिपात' शब्दों का अर्थ भी बता दिया। यह सुन कर उन सोलह बावरी शिष्यों की भगवान् बुद्ध के प्रति धार्मिक श्रद्धा अतिशय वृद्धिङ्गत हो गयी, अतः उन सबने भगवान् के श्रीचरणों की वन्दना की। यह सुन कर भगवान् ने उन सब को अपनी धार्मिक जिज्ञासा प्रकट करने की अनुमति प्रदान की। भगवान् से अनुमति पा कर सर्वप्रथम अजित माणव ने अपनी धार्मिक जिज्ञासा प्रकट की।पराजयभूमि भी हो सकता है इस बात को समझता हुआश्रम कभी वादविवाद में उलझे ॥
करते हुए कहा कि सभी धर्मों की परीक्षा के बाद मेरे जैसा मुक्त पुरुष किसी भी मत ९. मागण्डिय इस सूत्र में भगवान माया के दुरिवादान स्वीकार नहीं कर सकता। इन मतवादों का परिणाम देखने के बाद उनमें आसन होकर मैंने आध्यात्मिक शान्ति की गवेषणा की तथा उस को प्राप्त कर लिया ॥
हित्य
१०. पुराभेदसूत्र इस सूत्र में शान्तचित्त' एवं 'मुनिता विगत दि शब्दों को व्याख्या की गयी है।
११. कलहविवादसूत्र : इस सूत्र में कलह, विवाद, विलाप आदि को उत्पति बताते हुए कहा गया है कि ये सभी दुर्गण प्रिय वस्तुओं के कारण उद्भुत होते हैं। तथा इन प्रिय वस्तुओं के उद्भव का कारण होती है-इच्छा। इस इच्छा के कारण ही पामरजन संसार में इथा उधर भटकते रहते हैं। तृष्णा एवं पूर्ति का कारण भी यही इच्छा है। ये सब कारण मिल का मनुष्य के पुनर्जन्म के कारण बनते हैं।
लो
३२
१२. चूडब्यूहसूत्र: इस सूत्र में बताया गया है कि मत की भित्रता से सत्य में भिारता आ जाती है। साधारण लोग स्व स्व मत में आग्रही हो कर विवादों में उलझते हुए स्वयं को नाना प्रकार से ज्ञानी समझते हैं तथा कहते हैं- 'जो इस मेरे मत को जानता मानता है वही ज्ञानी है, जो इस की निन्दा करता है वह ज्ञानी नहीं है। परन्तु वस्तुतः जो तीर्थिक स्वमत में आग्रही हो कर अन्य श्रमणों को 'मूर्ख' कहता है, वह अन्य के धर्म को अग्राह्य बताने वाला कलह को निमन्त्रण देता है। अतः निर्वाण को निर्विवाद भूमि समझने वाला साधक किसी प्रकार के बाद में न पड़े'॥
१३. महाब्यूहसूत्र : इस सूत्र में यही सिद्ध किया गया है कि दृष्टि (मत) वाद का परित्यागी तथा सत्य का साक्षात्कर्ता हो निर्वाण प्राप्त कर सकता है ॥
१४. तुवटक (त्वरितक) सूत्र इस सूत्र में निर्वाणप्राप्तिहेतु भिक्षु के आवश्यक कत्र्तव्य बताये गये हैं। जैसे- वह अहङ्कार को जगत्प्रपञ्च का आदि कारण समझ कर उस का सर्व प्रकार से अन्त कर दे। अपने आन्तरिक एवं बाहा गुणों पर गर्व न करे। उन गुणों के कारण स्वयं को किसी से श्रेष्ठ, मध्यम या हीन न समझे। अपने आन्तरिक उद्वेग को शान्त रखे। स्वचित्त में किसी के प्रति तृष्णा का भाव न उत्पन्न होने दे। अन्नपान का संग्रह, व्यर्थ भ्रमण अतिनिद्रा आदि का त्याग करता हुआ छल, प्रपश, व्यर्थ परिहास, लौकिक क्रोडा एवं मैथुन आदि का सर्वधा परित्याग करे। स्वनिन्दा से विचलित न हो, प्रशंसा पर गर्व नः करे। इत्यादि॥
१५. आत्मदण्डसूत्र : इस सूत्र में तृष्णारहित रहने वाले साधक को निर्वाणप्राप्ति के अनेक उपाय बताये गये हैं ॥
१६. सारिपुत्रसूत्र : इस सूत्र में आयुष्मान् सारिपुत्र की जिज्ञासा का भगवान् ने भिक्षुजीवनचर्या के विषय में विस्तार से निर्देश किया है। धीर, स्मृतिमान् एवं संयत आचार वाला भिक्षु कामभोगों से, मक्खी मच्छर से, साँप विच्छु से तथा पापी मनुष्यों से भय न माने।भूख प्यास, सदी गर्मी रोग आदि को सहन करे। चौरी, असत्य भाषणव्यभिचारपान करे। सब के प्रति मैत्रीभाव रखें। क्रोध तथा अभिमान न करे। एकान्तवास में साधना करने में अरुचि न रखे। सांसारिक शोक सन्ताप एवं व्यर्थ तर्फे से दूर रहे। आज बस्त्र आदि से यथालाभ सन्तुष्ट रहे। क्रोध पर नियन्त्रण रखे। कल्याणमित्रों की सङ्गति करे। रूप, रस, गन्ध, शब्द एवं स्प्रष्टव्य विषयों से जन्य आसक्ति पर नियन्त्रण रखे। तथा समय समय पर धर्मानुशीलन करता हुआ एकाग्रचित्त रह कर स्वकीय अज्ञानान्धकार के नाश हेतु प्रयतशील रहे
(इस सूत्र को भी अशोक के शिलालेख में भिक्षुओं के लिये सतत अभ्यसनीय बताया है।) (४)
५. पारायणवर्ग: (इस में १७ सूत्र या पिपृच्छा वर्णित हैं)
वस्तुगाथा : मन्त्रपारङ्गत एवं अकिञ्चनत्व की कामना करता हुआ कोई बावरी
ने द
का
क का खे। नण धुन दि। के
न्ने नाचार माने।
नामक ब्राह्मण श्रावस्ती से चल कर भारत के दक्षिण भाग में गोदावरी नदी के तट पर आ कर उज्छवृत्ति या कन्द मूल फल आदि खा कर जीवन-निर्वाह करता हुआ साधना कर रहा था। कुछ समय बाद, जनता में प्रख्यात हो कर वह एक विशाल ग्राम का अधिपति हो गया। तब उसने एक वृहत् यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के अन्त में उसने अपना सब कुछ परिग्रह याचकों को दान कर दिया। इस प्रकार रिक्तहस्त हो कर जब वह पुनः अपने आश्रम में प्रविष्ट हुआ, उसी समय उसके पास एक वृद्ध याचक ब्राह्मण आया और उसने उससे पाँच सौ कार्षापण माँगे। बावरी द्वारा सत्य घटना बता कर इतने कार्षापण देने में अपनी असमर्थता प्रकट करने पर उस वृद्ध ब्राह्मण ने कुद्ध हो कर उसको शाप दे दिया कि यदि तुम मुझ को पाँच सौ कार्षापण न दोगे तो आज से सातवें दिन तुम्हारा मूर्धा (शिर) सौ भागों में खण्डित हो जायगा। यह सुन कर बावरी ब्राह्मण बहुत दुःखी एव भयाक्रान्त हो गया। इस दुःख एवं भय के कारण उस का अन्न-पान सब कुछ छूट गया। तथा वह धर्मसाधना से भी उपरत हो गया। तभी उसके हितैषी देवता ने आ कर उस को समझाया कि वह श्रावस्ती जा कर पाषाण चैत्य में विराजमान भगवान् बुद्ध से उस शाप की निवृत्ति का उपाय पूछे। परन्तु बावरी, अतिशय वृद्ध होने के कारण, इतना दूर जाने में सर्वथा असमर्थ था। अन्त में, उसने अपने सोलह (१६) बुद्धिमान् एवं वेदपारङ्गत शिष्यों को, इस शापनिवृत्ति का उपाय पूछने के लिये, भगवान् बुद्ध को सेवा में भेजा और उन को भगवान् बुद्ध की बत्तीस महापुरुषों वाली पहचान बतायी। तब वे सोलह शिष्य गोदावरी से चल कर पाषाण चैत्य (राजगृह) में भगवान् के दर्शनहेतु पहुँचे। दर्शन करते ही वे सभी शिष्य भगवान् बुद्ध से प्रभावित हो गये। उधर भगवान् ने भी, उन के बिना पूछे हो, उन के गुरु बावरी की आयु, गोत्र, शरीर के तीन विशिष्ट लक्षण, तथा अध्ययन सब कुछ बता दिया। साथ ही 'मूर्धा' एवं 'मूर्धाधिपात' शब्दों का अर्थ भी बता दिया। यह सुन कर उन सोलह बावरी शिष्यों की भगवान् बुद्ध के प्रति धार्मिक श्रद्धा अतिशय वृद्धिङ्गत हो गयो, अतः उन सबने भगवान् के श्रीचरणों की वन्दना की। यह सुन कर भगवान् ने उन सब को अपनी धार्मिक जिज्ञासा प्रकट करने की अनुमति प्रदान की। भगवान् से अनुमति पा कर सर्वप्रथम अजित माणव ने अपनी धार्मिक जिज्ञासा प्रकट की।१. अजितमाणवपृच्छा : "१. यह संसार किस से आच्छादित है ? २. किस कारण यह प्रकाशित नहीं होता ? ३. इस को किसका अभिलेपन (मल) कहा जाय? ४. तथा इसका महाभय क्या है ?
भगवान्: १. यह संसार अविद्या से आच्छादित है। २. लोभ एवं प्रमाद (आलस्य) के कारण यह प्रकाशित नहीं होता। ३. तृष्णा इसका अभिलेपन है। तथा ४. जन्म आदि दुःख इस के महाभय हैं।
अजित : १. चारों और तृष्णा के स्रोत बह रहे हैं, इन स्रोतों के निवारण का क्या उपाय है ? २. ये स्रोत कैसे रोके जा सकते हैं?
भगवान्: १. इस स्रोतों के निवारण का एकमात्र उपाय स्मृति ही है। २. इन को प्रज्ञा से संवृत किया (रोका) जा सकता है ।... इत्यादि ॥
२.
तिष्यमैत्रेयमाणवपृच्छा : १. इस संसार में सन्तुष्ट कौन है ? २. चञ्चलता-विहीन कौन है? ३. कौन ज्ञानी दोनों अन्तों को जान कर मध्य में लिप्त नहीं होता? ४. महापुरुष कौन होता है ? तथा यहाँ तृष्णा को कौन अतिक्रान्त कर सका है ?
भगवान्: १. जो यहाँ कामभोगों का त्याग कर तृष्णाविहीन हो कर साधनारत रहता है वह 'सन्तुष्ट' है। २. ज्ञान के कारण मुक्त भिक्षु 'चञ्चलताविहीन' है। ३. जो प्रज्ञा द्वारा दोनों अन्तों को जान लेता है वह मध्य में लिप्त नहीं होता। उसी को 'महापुरुष' कहते हैं। तथा ४. वह महापुरुष ही तृष्णा को सर्वथा अतिक्रान्त कर पाता है ॥
३. पूर्णकमाणवपृच्छा : १. यहाँ ऋषियों, मनुष्यों, क्षत्रियों तथा ब्राह्मणों ने देवताओं के निमित्त किस प्रयोजन से यज्ञ किये थे ? २. क्या वे उस समय अप्रमादी थे ?
भगवान् : पूर्णक ! यहाँ ऋषियों आदि ने देवताओं के निमित्त इसी लिये यज्ञ किये थे
कि वे (ऋषि आदि) जरामुक्त आयु प्राप्त करें अर्थात् वे अधिक से अधिक लम्बी आयु प्राप्त कर सुखमय जीवन व्यतीत करें। तथा पूर्णक! वे लोग अपने लाभ की आशा में देवताओं के गुण गाते थे, उनकी प्रशंसा करते थे; परन्तु उन की इच्छा यही रहती थी कि उन के कामभोगों को अधिकाधिक पूर्ति हो। अतः इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि ये (याज्ञिक) यज्ञ में आसक्त
होने के कारण जन्म एवं जरामरण को अतिक्रान्त नहीं कर पाये ।... इत्यादि ॥
४. मेत्तगुमाणवपृच्छा : १. संसार में ये अनेक प्रकार के दुःख कहाँ से उत्पन्न होते
हैं ? २. तथा बुद्धिमान् साधक जन्म, जरा, शोक, विलाप की बाढ़ को कैसे पार कर पाते हैं? भगवान् : १. संसार के ये अनेक प्रकार के दुःख परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होते
हैं। २. मेत्तगु ! जो साधक आगे पीछे, ऊपर नीचे, तिरछे या मध्य में देख रहा हो उन में तृष्णा एवं आसक्ति का त्याग कर तथा संस्कार एवं विज्ञान को हटा कर भव में न ठहरे वही इस बाढ को पार कर सकता है ... इत्यादि ॥
५. धौतकमाणवकपृच्छा : १. मनुष्य को अपनी शान्ति के लिये क्या कुछ सोखना
चाहिये ?
भगवान् : तुम यदि धर्मश्रवण में तत्पर रहो, स्मृतिमान् रहो, प्रज्ञावान् रहो तो अवश्य ही तुम को आत्मशान्ति प्राप्त हो सकती है।.... इत्यादि ॥६. उपशिवमाणवपृच्छा : १. हे शाक्य। मैं किसी सहायक के विना एकाकी रह
कर इस भवसागर को पार करने में असमर्थ हूँ, अतः मुझ को आप ऐसा आलम्बन बताइये कि जिस के आश्रयण से मैं इस भवप्रवाह को पार कर सकूँ ?
भगवान् : उपशिव । तुम आकिञ्चन्य (कुछ नहीं है) के ज्ञान का आलम्बन कर इस भवप्रवाह को पार करो। कामभोगों का त्याग कर, लौकिक संशयविपर्यय से दूर रहते हुए, दिन रात तृष्णाक्षय का अभ्यास करो।.... इत्यादि ॥
७. नन्दमाणवपृच्छा : 'मुनि' शब्द का क्या अभिप्राय है? क्या ज्ञान के कारण किसी को 'मुनि' कहते हैं? या चर्या के कारण किसी को 'मुनि' कहते हैं?
भगवान् : जो साधक लोभ एवं तृष्णा को विषतुल्य मान कर लोक में लोभ एवं तृष्णा से रहित हो कर विचरण करते हैं, मेरे मत में उन को ही 'मुनि' कहा जाना चाहिये ॥
नन्द माणव : विद्वान् लोग अनेक प्रकार की शुद्धि बताते हैं, क्या ये लोग जन्म एवं
जरा को पार कर पाते हैं ?
भगवान्: मैं ऐसे सभी श्रमण ब्राह्मणों को 'जन्म जरा से मुक्त' नहीं कहता; अपितु जो दृष्ट, श्रुत, स्मृत, शील, व्रत आदि सब कुछ त्याग कर, तथा समस्त रूपों का परित्याग कर वितृष्ण एवं क्षीणाश्रव हैं, उनको 'भवसागरपार' कहता हूँ ॥
८. हैमकमाणवपृच्छा : आप मुझ को ऐसा धर्मोपदेश करें जिससे साधक मनुष्य साधना करता हुआ अपनी समस्त तृष्णाओं का नाशकर लोक में निर्भीक हो कर विचरण कर सके ?
भगवान्: हैमक ! दृष्ट, श्रुत, स्मृत एवं विज्ञान रूपों के प्रति आसक्ति को दूर करना ही अच्युत (निर्वाण) पद कहलाता है। स्मृतिमान् पुरुष इस को जान कर इसी जन्म में यह निर्वाण पद पा लेने वाला साधक बन कर 'तृष्णाविहीन' माना जाता है ॥
९. तौदेय माणवपृच्छा : हे मुने! कामवासनाविहीन, तृष्णारहित तथा धर्मविषयों में निःशङ्क एवं असन्दिग्ध पुरुष की मुक्ति के क्या चिह्न हैं?
भगवान्: ऐसा साधक तृष्णाविहीन हो चुका है, वह तृष्णायुक्त नहीं रहता। वह प्रज्ञावान् ही है, प्रज्ञाभ्यासी नहीं। तौदेय। ऐसे साधक को तुम 'मुनि' हो समझो। तथा जो कामभव में निरासक्त है ऐसे मुनि को तुम 'अकिञ्चन' जानो ॥
१०. कल्पमाणवपृच्छा : हे भगवन् । अतिशय भयानक प्रवाह में फैसे हुए, जरा एवं मृत्यु के वशङ्गत प्राणियों के लिये कोई ऐसा शरणस्थल बताइये जहाँ दुःख की गति कथमपि सम्भव न हो ?
भगवान् : कल्प! ऐसा शरणस्थल अकिञ्चनत्व एवं अनासक्ति ही है, अन्य नहीं। जरा एवं मृत्यु का क्षय ही निर्वाण कहलाता है। यहाँ दुःख की गति कथमपि सम्भव नहीं है ॥
११. जतुकर्णिमाणवपृच्छा हे ज्ञानचक्षु। मुझ को ऐसा धर्मोपदेश कीजिये जिस के धर्माभ्यास से मैं अपने जन्म, जरा एवं मृत्यु को दूर करना जान सकूँ ?
भगवान् : जतुकर्णि । निष्कामता को कल्याणमय क्षेत्र समझते हुए, कामभोगोंतृष्णा (लालच) को दूर कर दो और शान्तचित्त हो कर साधना करो। ब्राह्मण। जो नाम-रूप में सर्वथा लोभरहित है उन के चित्तविकार क्षीण हो जाते हैं, अतः वह उनके कारण मृत्यु के अधीन नहीं होता ॥
१२. भद्रायुधमाणवपृच्छा : भगवान् ने भद्रायुध के निवेदन पर उस के माध्यम से
वहाँ उपस्थित सभी जिज्ञासुओं को यह धर्मोपदेश किया-" भद्रायुध। यहाँ ऊपर नीचे, तिर्यक् (टेढे) एवं मध्य में सर्वत्र आसक्तिरूप तृष्णा को शान्त करो, क्यों कि सांसारिक जन जिस जिस वस्तु को स्वीकार (परिग्रह) करते हैं उसी के कारण मार उन का पीछा करने लगता है। अतः तृष्णासक्त एवं मृत्युराज्य में लीन इस प्रजा को देखते हुए स्मृतिमान् भिक्षु को संसार में किसी के प्रति भी आसक्त नहीं होना चाहिये"॥
१३. उदद्यमाणवपृच्छा : हे भगवन् । कृपया आप मुझे प्रज्ञा द्वारा अविदया के नाश
एवं मुक्ति की प्राप्ति का उपाय बतावें?
भगवान् : उदय । मैं कामभोगों में राग तथा दौर्मनस्य के प्रहाण, स्त्यान (आलस्य) को दूर हटाना, कौकृत्य के निवारण, उपेक्षा, स्मृति एवं धार्मिक विचार से उत्पन्न ज्ञान द्वारा विमोक्ष की प्राप्ति तथा अविद्या का नाश बताता हूँ ।L... इत्यादि ॥
१४. पयःशालमाणवपृच्छा हे शाक्य रूपसंज्ञाओं तथा अरूपसंज्ञाओं से मुक्त तथा आन्तरिक एवं बाह्य अकिञ्चनत्व के साक्षात्कर्ता ज्ञानी कैसे निर्वाण की ओर बढ़ सकता
है?
भगवान् : आकिञ्चन्यजनक को उत्पादक 'अरूपराग नन्दीसंयोजन है' ऐसा जान कर तब वहाँ देखता है। उस चिर अभ्यसनशील ब्राह्मण (ज्ञानी) का यह ज्ञान सत्य (तथ्य) है।
१५. मोघराजमाणवपृच्छा हे शाक्य! इस संसार को किस रूप में देखने वाले साधक पर मृत्युराज का प्रभाव नहीं पड़ता ?
भगवान् : मोघराज ! सदा स्मृतिमान् रहते हुए तुम संसार को शून्यता के रूप में देखो। इस प्रकार, आत्मदृष्टि का नाश कर तुम मृत्युराज (मार) को अतिक्रान्त कर सकोगे; क्यों कि इस प्रकार (शून्यता के रूप में) संसार को देखने वाला मृत्यु के वश में कभी नहीं हो सकता ॥
१६. पैङ्गयमाणवपृच्छा : हे भगवन्। मैं वृद्धावस्था के कारण जीर्ण, दुर्बल एवं
विवर्ण हो चुका हूँ। मेरी नेत्रज्योति एवं श्रवणशक्ति भी दुर्बल हो गयी है। अतः कृपया मुझ को ऐसा धर्मोपदेश करें कि जिस का आश्रयण कर अपने जन्म, जरा एवं मरण का क्षय कर सकूँ ?
भगवान् : पैङ्गय । यदि तुम इस संसार में अपना पुनर्जन्म न चाहते हो तो सावधान रहते हुए अपने चित्त से इन रूपों की आसक्ति को पूर्णतः विनष्ट कर दो... इत्यादि ॥
विशेष : उपर्युक्त ये १६ उपदेश राजगृह के समीप पाषाणचैत्य में विराजमान रहते हुए भगवान् ने बावरी ब्राह्मण के १६ शिष्यों को किये थे ॥अट्ठकथा के अनुसार यह बावरी ब्राह्मण कोसलनरेश प्रसेनजित् के पिता का प्रधान पुरोहित था। (५)
*
सङ्गीतिकारों द्वारा वर्णित
सुत्तनिपातपालि का माहात्म्य
१. विशिष्ट अर्थों वाले शब्दों से सम्पृक्त, तथा स्थान स्थान पर संगृहीत विविध उपमाओं वाले एवं जिज्ञासुओं की समस्त धार्मिक जिज्ञासाओं के शामक इस सुत्तनिपातपालि की देशना भगवान् बुद्ध के मुखारविन्द से हुई थी।
२. उन पुरुषोत्तम भगवान् बुद्ध द्वारा उपदिष्ट यह सुत्तनिपात राग, द्वेष एवं मोह के नाश करने में पूर्ण समर्थ है; क्योंकि यह स्वयं अतिशय स्वच्छता की पराकाष्ठा तक पहुँचा हुआ है तथा धार्मिक जिज्ञासुओं की समस्त जिज्ञासाओं का भी पूर्णतः शामक है।
३. उन पुरुषोत्तम भगवान् बुद्ध द्वारा उपदिष्ट यह सुत्तनिपात साधक के समस्त क्लेशों एवं दुश्चरितों का नाशक है; क्यों कि वह स्वयं अतिशय स्वच्छ है तथा जिज्ञासुओं की समस्त धार्मिक जिज्ञासाओं का भी पूर्णतः शामक है।
४. उन नरश्रेष्ठ भगवान् बुद्ध द्वारा साधक के समस्त कोशमलों के नाशहेतु उपदिष्ट यह सुत्तनिपात आश्रवों (चित्तविकारों), बन्धनों, योगों, क्लेशों एवं नीवरणों तथा तीन मलों का सर्वथा नाश करने में भी समर्थ है।
५. यह सुत्तनिपात निर्मल है। एतदनुसार साधना करने पर यह सभी क्लेशमलों का नाशक है, यह सांसारिक आसक्तियों को दूर भगाने वाला, स्थिर एवं शोकरहित, शान्त, उत्तम एवं कठिनता से साक्षात्करणीय धर्मों का उपदेशक है।
६. उन पुरुषोत्तम भगवान् बुद्ध ने इस सुत्तनिपात का उपदेश साधक को, राग एवं द्वेष का नाश कर शान्त स्थिति तक पहुँचाने के लिये, चार योनियों पाँच गतियों एवं विज्ञानों के बोध के लिये, तृष्णा एवं रति (आसक्ति) के नाश के लिये किया था।
७. गम्भीर, दुर्दश, श्लक्ष्ण एवं पण्डितों द्वारा ही ज्ञेय अर्थ के बोधक तथा धार्मिक जिज्ञासुओं की समस्त जिज्ञासाओं के शामक इस सुत्तनिपात का उपदेश उन पुरुषोत्तम भगवान् ने किया था।
८. नये पुष्पों की माला तथा किसी नये कण्ठाभूषण के समान शोभास्पदः इन्द्रिय, ध्यान, विमोक्ष आदि के वर्णन से विभक्त; आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग का निर्देशक, सद्धर्म का प्रेरणास्त्रोत यह सुत्तनिपात भगवान् बुद्ध द्वारा उपदिष्ट हुआ था।
९. नरश्रेष्ठ उन भगवान् बुद्ध ने चन्द्रमा के समान स्वच्छ एवं निर्मल, समुद्र के समान विविध रनों (धर्मसिद्धान्तों) से पूर्ण, पुष्म के समान देखने समझने में सुन्दर तथा सूर्य के समान तेजस्वी इस सुत्तनिपात का उपदेश किया था।
१०. नरश्रेष्ठ उन भगवान् बुद्ध ने क्षेमङ्कर एवं मङ्गलप्रद, सुखप्रद, शीतल, शान्त, मृत्यु से स्थायी रक्षा के एक समर्थ उपायभूत इस सुत्तनिपात का उपदेश जिज्ञासु को निर्वाण के विषय में पूर्ण परिचय देने हेतु किया था। (पृ. २१२, २१३, २१४)
सुत्तनिपात के नागरी लिपि में पूर्व संस्करण
१. इस ग्रन्थ का प्रथम नागरीलिपि संस्करण पूना के डॉ. वापट द्वारा सम्पादित, सन् १९२४ में हुआ था।
२. म. पं. राहुल सांकृत्यायन, भ. आनन्द कौसल्यायन तथा भिक्षु जगदीश काश्यप द्वारा सम्पादित (खुद्दकनिकाय के अन्य १० ग्रन्थों के साथ), वाराणसी सन् १९३७ (खु. २४८१) में हुआ।
३. भिक्षु धर्मरत्न एम. ए. द्वारा हिन्दी अनुवाद सहित सन् १९५१ में हुआ।
४. नवनालन्दा महाविहार, नालन्दा से छट्टु सङ्गायन के आधार पर 'देवनगारी पालि ग्रन्थमाला' में सन् १९५९ (बु. २५०३) में प्रकाशित हुआ।
५. इनके अतिरिक्त वंगलिपि में भिक्षु शीलभद्र ने भी सुत्तनिपात का अनुवाद किया था। यह सन् १९४१ में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ था।
६. अब यह वर्तमान संस्करण हमने छट्ट सङ्गायन के आधार पर नालन्दा से प्रकाशित संस्करण के आश्रयण से प्रस्तुत किया है। इस में पालि एवं हिन्दी-दोनों भाषाओं में सुत्तनिपात का निबन्धन आधुनिक साज सज्जा के साथ हुआ है- यही हमारे इस संस्करण का वैशिष्ट्य है।



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