भारतीय संविधान की आलोचना के क्या-क्या कारण थे? Top 10 कारण upsc mains qustion notes - New hindi english facts important best articles news, biography history

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भारत का संविधान जिसे संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को पारित किया गया और  26 जनवरी 1950 से पूर्ण रूप से प्रभावी हुआ। यह दिन (26 नवम्बर) भारत के संविधान दिवस के रूप में घोषित किया गया है जबकि 26 जनवरी का दिन भारत में गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

डॉ.भीमराव आम्बेडकर को भारतीय संविधान का प्रधान वास्तुकार या निर्माता कहा जाता है।भारत का संविधान विश्व के किसी भी गणतांत्रिक देश का सबसे लंबा लिखित संविधान है।

इसके अनेकों विशेषताएं हैं परंतु कुछ आलोचनाएं भी है जिन्हें आप आगे की पंक्तियों में देखेंगे और उनका अनुसरण करके समझने का प्रयास करेंगे कि किस आधार पर भारतीय संविधान पर आलोचकों द्वारा प्रश्नचिन्ह लगाए जा सकते हैं।



भारतीय संविधान की आलोचना के क्या-क्या कारण थे? Top 10 कारण एवं मुख्य आलोचना upsc mains qustion.


1.बाहरी संविधान/ भारतीयता का कम मोल।:-

2. संविधान सभा में हिंदुओं का प्रभुत्व होना:-

3.गांधीवाद की छाया से दूर का संविधान:-

4.असामान्य समय अंतराल की बर्बादी:-

5.कुसिद(ऋणी) संविधान ।:-
6. कांग्रेस का प्रभुत्व और एकाधिकार-
7. भारतीय संविधान सभा एक प्रतिनिधि निकाय नहीं थी : -
8. वकीलों और राजनीतिज्ञों का प्रभुत्व और एकाधिकार :-
9. संप्रभुत्ता का विशेष अभाव:-
10. खर्चीला संविधान:-

1.बाहरी संविधान/ भारतीयता का कम मोल।:- आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान भारतीय या भारतीयता को नहीं दर्शाता है, क्योंकि यह भारत की राजनीतिक परंपराओं अथवा भावनाओं का प्रकट नहीं करता। उनका कहना है संविधान की प्रकृति विदेशी है, जिससे भारतीय परिस्थितियों के लिए अनुपयुक्त एवं अकारण है। 

संविधान सभा एक सदस्य हनुमंथैया इस संदर्भ में अपनी टिप्पणी देते हुए कहते हैं की हम वीणा या सितार का संगीत चाहते थे, लेकिन यहां हम एक इंग्लिश बैंड का संगीत सुन रहे हैं। ऐसा इसलिए की हमारी संविधान निर्माता उसी प्रकार से शिक्षित हुए। उसी प्रकार लोकनाथ मिश्रा एक अन्य संविधान सभा के सदस्य ने संविधान की आलोचना करते हुए इसे पश्चिम का दाशवत अनुकरण बल्कि पश्चिम का दासवत आत्मसमर्पण कहा। लक्ष्मी नारायण साहू एक अन्य संविधान सभा सदस्य का कहना था। जिन आदर्शों पर यह प्ररूप संविधान गढ़ा गया है, भारत की मूलभूत आवश्यकता  उनमें प्रकट नहीं होती।

2. संविधान सभा में हिंदुओं का प्रभुत्व होना :-कुछ आलोचकों के अनुसार , संविधान से पहले सभा में हिंदुओं का वर्चस्व था । लॉर्ड विसकाउंट ने इसे " हिंदुओं का निकाय ' कहा । इसी प्रकार विंस्टन चर्चिल ने टिप्पणी की कि , संविधान सभा ने भारत के केवल एक बड़े समुदाय ' का प्रतिनिधित्व किया । इससे एकात्मता बड़ी और सब का रुझान इस बात पर केंद्रित हो गया कि हिंदुओं ने चतुराई से संविधान सभा में अपनी संख्या को बढ़ाने का प्रयत्न किया।

3.गांधीवाद की छाया से दूर का संविधान
      -आलोचकों के अनुसार भारत के संविधान में गांधीवादी दर्शन और मूल्यों का गहरा अभाव हैं। जबकि गांधी जी हमारे राष्ट्रपिता है, उनका कहना था कि संविधान ग्राम पंचायत तथा जिला पंचायतों के आधार पर निर्मित होना चाहिए था। इस संदर्भ में वही सदस्य के हनुमंथैया ने कहा यह वही संविधान है जिसे महात्मा गांधी कभी नहीं चाहते, ना ही संविधान को उन्होंने विचार किया होगा। टी.प्रकाशम संविधान की इस कमी का कारण गांधीजी के आंदोलन में अंबेडकर की सहभागिता नहीं होना ।

4.असामान्य समय अंतराल की बर्बादी :- आलोचकों के अनुसार , संविधान सभा ने इसके निर्माण में जरूरत से कहीं ज्यादा समय ले लिया ।उन्होंने कहा कि अमेरिका के संविधान निर्माताओं ने मात्र 4 माह में अपना काम पूरा कर लिया था । जबकि भारतीय संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन का समय लगा। निराजुद्दीन अहमद , स्वतंत्रता संविधान सभा के सदस्य , ने इसके लिए अपनी अवमानना दर्शाने के लिए प्रारूप समिति हेतु एक नया नाम गढ़ा । उन्होंने इसे अपवहन समिति ' कहा ।

5.कुसिद(ऋणी) संविधान ।
   आलोचको का कहना हैं कि भारतीय संविधान में नवीन और मौलिक कुछ भी नहीं है। वे मानते हैं भारतीय संविधान उधार की एक बोरी हैं। ऐसा इसलिए है कि संविधान बनाने वालों ने अन्य संविधान के आवश्यक संशोधन करके ही भारतीय परिस्थितियों में उनकी उपयुक्तता के आधार पर उनकी कमियों को नजरअंदाज करके स्वीकार किया।
आलोचना का उत्तर देते हुए डॉ बी आर अंबेडकर ने संविधान सभा में ही कह उठे , कोई पूछ सकता है की इस  घड़ी दुनिया के इतिहास में बनाए गए संविधान में नया कुछ हो सकता है। 100 साल से अधिक हो गए जबकि दुनिया का पहला लिखित संविधान बना इसका अनुसरण अनेक देशों ने किया और अपने देश के संविधान को लिखित बनाकर उसे छोटा बना दिया। किसी संविधान का विषय क्षेत्र क्या होना चाहिए यह पहले ही तय हो चुका है उसी प्रकार किसी संविधान के मूलभूत तत्वों की जानकारी और मान्यता आज पूरी दुनिया में है। इन मुख्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सभी संविधान में मुख्य प्रावधानों में समानता देख सकती है। केवल एक नई चीज यह हो सकती है, किसी संविधान में जिसका निर्माण इतने विलंब से हुआ है। कि उसमें गलतियों को दूर करने और देश की जरूरतों के मध्यनजर उन जरूरतों को डालने की विविधता उसमें मौजूद रहे।। डॉ बी आर अंबेडकर यह कहते हैं कि यह संविधान अन्य देशों के संविधान की हु ब हू  नकल है ऐसा कहना अमान्य हैं।

6.कांग्रेस का प्रभुत्व और एकाधिकार-
आलोचकों का आरोप है कि संविधान सभा में कांग्रेसियों का प्रभुत्व था । कांग्रेसी हर बात में हस्तक्षेप करते थे कांग्रेसी हुआ वाक़ पटुता के कारण संविधान के नीति निर्देशों में अपनी अहम भूमिका निभाने का प्रयत्न किया ब्रिटेन के संविधान विशेषज्ञ ग्रेनविले ऑस्टिन ने टिप्पणी की , “ संविधान सभा एक आलोचना दलीय देश का एक - दलीय निकाय है । सभा ही कांग्रेस है और कांग्रेस ही भारत है ।

7. भारतीय संविधान सभा एक प्रतिनिधि निकाय नहीं थी : -

आलोचकों ने दलीलें दी हैं कि संविधान सभा प्रतिनिधि सभा नहीं थी क्योंकि इसके सदस्यों का चुनाव भारत के लोगों द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ था । तथा भारत के प्रत्येक नागरिक को संविधान सभा के सदस्यों को चुनने का अधिकार नहीं मिला जिसके कारण कुछ लोगों का यह मत है कि अयोग्य राजनेता, प्रतिनिधि का चयन संविधान सभा के सदस्य के रूप में एक भूल है या किसी भी तरह से प्रतिनिधि निकाय नहीं हो सकती क्योंकि इसमें भारत के लोगों का संपूर्ण रूप से भागीदारी दर्ज नहीं थी।

 8. वकीलों और राजनीतिज्ञों का प्रभुत्व और एकाधिकार :-
ऐसा माना जाता है कि भारतीय संविधान सभा वकीलों और राजनेताओं के लिए स्वर्ग था, और यह भी कहा जाता है कि संविधान सभा में वकीलों और नेताओं का बोलबाला ताधिकार था । उन्होंने कहा कि समाज के अन्य वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला । उनके अनुसार , संविधान के आकार संविधान और उसकी जटिल भाषा के पीछे भी यही मुख्य कारण निर्माण था ।

9. संप्रभुत्ता का विशेष अभाव:-
 आलोचकों का कहना है कि संविधान सभा एक संप्रभु निकाय नहीं थी क्योंकि इसका निर्माण ब्रिटिश सरकार के प्रस्तावों के आधार पर हुआ । यह भी कहा जाता है कि संविधान सभा अपनी बैठकों से पहले ब्रिटिश सरकार से इजाज़त लेती थी ।

10. खर्चीला संविधान:-
आपको जानकर हैरानी होगी कि भारतीय संविधान बनने मे जो पैसे खर्च हुवा है वह 64लाख है या लगभग 6•4 करोड़ ( 6396729 रुपया ) । खर्च अधिक खर्चीला होने के कारण भी है भारतीय संविधान की आलोचना की जाती है।



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