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 “The journey of Bahadur Oraon in the Jharkhand movement.” .” 

मेरा सफर 1964 से शुरू होता है। 1964 से ही दिमाग में यह ख्याल आता था कि सबको अपना राज्य मिला तो हमें क्यों नहीं मिला। झारखण्ड के लिए एक भावना जागा था। उस समय बागुम सुम्बई जी नेता हुआ करते थे। उस वक्त हम उनका दिय भगाओं (बाहरियों को भगाओं) के नारे सुनते थे। दे दिक राज काबुआ झारखण्ड राज अबुआ (हमे गैर राज्य मंजूर नहीं, बल्कि आरखण्ड हमारा राज्य है) कहते थे। वे भागो बेटा, जाओ गगा पार के नारे देते थे। उन्हीं को सुन कर हम प्रेरित होते थे।



लेकिन इससे पहले, जब 7-8 में में पढ़ रहा था उस समय, स्कूल में आदान-प्रदान के कार्यक्रम में एक शिक्षक कुछ बोलने के लिए बोले। तो मैंने कहा में एक आदिवासी हूँ, तो आदिवासी के ऊपर ही बोलूंगा। मैंने शुरुवात किया यह कहते हुए कि आदि मतलब शुरू और वासी मतलब बसने वाला, यानि आदिवासी का मतलब है आदि काल से बसने वाला। शुरुवात से बसने वाला आदिवासी है। मैंने इतना ही कहा कि मास्टर जी बैठने के लिए बोले। तो यहीं से मेरा रूचि जागा। 1964 में रेल में जाने के बाद सूदखोरी और भूसखोरी के खिलाफ लड़ाई से शुरुवात किया और 1972 में गुरूजी का लड़ाई को देखकर पूरी तरह से आंदोलन में जुड़ गया।


जब गुरु जी (शिबू सोरेन) 1971-72 में झारखण्ड आदोलन शुरू किये तो मैं उसका सदस्य बन गया। 1978 में एक बड़ा सम्मलेन हुआ। उस सम्मलेन में ए के रॉय, विनोद बिहारी और शिबू सोरेन आए थे। उसने डॉ निर्मल निज और बड़े-बड़े विद्वानों को बुलाया गया था। उस मीटिंग में चर्चा किया गया कि हमें एक सतगुरु मिल गया था सीताराम शास्त्री के रूप में। उन्हीं के नेतृत्व में सम्मलेन हुआ था। आरखंड आदिवासियों का अस्तित्व का सवाल है. अतः झारखण्ड में उनका स्वयं का शासन होना चाहिए। इसी सवाल पर कार्यक्रम हुआ। साथ ही यह भी बात हुई कि जंगल हमारा मूलतत्वा है. इसलिए जंगल को बर्बाद नहीं होने देना चाहिए। जब तक जंगल रहेगा तब तक हम बचे रहेंगे। नहीं तो नदी निहीं काट कर खत्म कर देगा। अतः जंगल को कैसे बचाना है. यह सवाल भी उठाया गया। इसलिए जगल को हमें हर हाल में बचाना है। संकल्प लिया गया कि ना कोई जंगल काटेगा ना ही ठेकेदारों को काटने देगा। जंगल बचाओ आदोलन शुरू हुआ। रांची का बेथेसदा में यह सम्मलेन हुआ। उस वक्त एन ई होरो ने पूरा प्रबंध कर दिया था। वहां फैसला यही हुआ कि हमें झारखंड हर हालत में लेना है। उसी दिन आह्वान किया गया कि 15 अगस्त 1978 को हम काला दिवस मनाएंगे। हमने कहा हम आजाद नहीं है. हम गुलाम है। इसलिए काला दिवस मनाएंगे। अल्टीमेटम दिया गया कि 14 अगस्त को झारखंड मिल जाना चाहिए। मगर उस समय नहीं दिया गया। उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी। हमने भी 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया और काला बैज लगाकर जुलूस निकाला। फिर जुलूस को भी रोक दिया गया। उसके बाद बंद का आहवान हुआ।

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मछुआ गागराई ने एलान किया कि जब तक झारखंड नहीं बनता है तब तक बाजार शुल्क नहीं देंगे। साथ ही जंगल के अंदर सरकार ने जहां वृक्षारोपण किया है यह जमीन हमारा है। पत्थलगड़ी उसका प्रमाण है। फिर हमने वहां जंगल काटे। देवगाम और मांझी इसमें मुख्य भूमिका में थे। यह आंदोलन लंबा चला। उसी में झारखंड के नाम पर पहला गोलीकांड 6 नवंबर 1978 को इचाहतु में हुआ। उसके बाद लगातार लड़ाई चलती रही। इचाहातु गोइलकेरा और सोनुआ के इलाकों में लड़ाई चलती रही और 25 नवंबर 1978 को सेरेंगदा में दूसरी बार गोली चली। ऐसे ही गोलियां चलती रहीं। उस बीच कई अरेस्ट हुए और जेल चले गए, जबकि कई लोग मारे भी गए। मगर हमारे अंदर एक जुनून था। इसलिए हम रुके नहीं।


हमारे बीच में ही कुछ दलाल भी पैदा हुए। लोग बोलने लगे कि आदिवासी बिक्री होने वाले लोग है. जयपाल सिंह भी गया और जितना भी नेता आते हैं सब बिकते हैं। वे सवाल उठाने लगे कि ऐसे में झारखंड कैसे मिलेगा? हमने उस समय धैर्य से काम लिया और बोला, 'देखिए, आदिवासी नहीं होता है बिकने वाला। जयपाल सिंह बिका नहीं, बल्कि जयपाल सिंह को 1963 में धोखा दिया गया। उन्हें पार्टी में शामिल होने के बदले झारखण्ड देने की बात कही गयी थी। मगर पार्टी में शामिल होने के बाद झारखंड नहीं दिया गया। लोगों को हमने सतर्क किया कि ऐसा भी होता है। मैंने बोला, 'हम बाई-तीन करोड़ आदिवासी है, कितनों को खरीदोगे?" आंदोलन जोर पकड़ा और लड़ते-लड़ते 1978 से लेकर 1985 तक गोलियां चली। इस बीच बहुत से लोग गिरफ्तार हुए थे। 108 आदमी कोगिरफ्तार किया गया था। उसी का विरोध में सुला पूर्ति नामक हमारा एक साथी ने हमारे लोगों की रिहाई के लिए गुआ में थाना का घेराव करने का प्रस्ताव दिया। सबसे बड़ा गोलीकांड 8 सितम्बर 1960 को गुआ में हुआ। सोमवार का दिन था और दोपहर 2 बजे वहां गोली चली।


उस वक्त में रेल में काम करता था। रविवार को एक बैठक हुई जिसमें खास तौर से देवेंद्र मांझी, भुनेश्वर महतो और सुला पूर्ति थे। हमने यह निर्णय लिया कि हमारे 108 लोग जिन्हें गिरफ्तार किया गया है उन्हें छुड़ाने के लिए घेराव करना है। वहां जाना जरूरी था। मजदूरों और पुलिस के बीच संवाद के लिए मुनेश्वर महतो और मुझे नियुक्त किया गया। सोमवार को हम गाड़ी से गुआ गए। मेरे साथ भुनेश्वर महतो और सुला पूर्ति पहुंचे थे। हमारे पहुँचने तक लोग जुटने लगे थे और 12:00 बजे तक सभी आ चुके थे। उस वक्त देवेन्द्र मांझी हमारे विधायक थे। वे अन्य व्यस्तताओं के कारण बैठक में नहीं आ सके। हमने एक मांग पत्र बनाया और पुलिस को मांग पत्र दिया। उस मांग पत्र में हमने चार माँगे रखी थी। पहली मांग थी, जो 108 आदमी को पकड़ा है उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। दूसरी मांग थी, कि पुलिस द्वारा किया जा रहा जुल्म, जैसे घरों में घुस कर मुर्गी-बकरी ले जाना और बेहेन बेटियों को छेड़ना, बंद हो। तीसरी मांग थी, गुआ, जामदा, बांसपानी, किरीबुरू, इत्यादि में जितने खदान खोले गए हैं, वह हमारी जमीन पर हैं। इसलिए उनपर हमें मुआवजा मिलना चाहिए और जो खदाने वहां खुले हैं, वहां हमारे आदिवासियों का नौकरी को स्थायी किया जाए। और चौथी मांग थी. अगर सबको अपना राज्य मिला, प्रांत मिला और स्वतः का अधिकार मिला, तो हम आदिवासियों को क्यों नहीं मिलेगा? इस सवाल पर हमने मांग की कि हमें झारखंड राज्य चाहिए।


फिर उन्होंने राष्ट्रीय एकता की बात कही। तो हमने भी कहा कि अगर ऐसा है तो बिहार, बंगाल को भी प्रोविंसियल स्टेट ही रहने देना था। फिर वे कुछ नहीं बोल सके और मांग पत्र ले लिए। मांग पत्र स्वीकार करने के बाद हमें डराने का कोशिश किया गया। उन्होंने सोचा होगा, मार पीट करने से दोबारा नहीं आएँगे। लेकिन हमने सोचा जो भी हो, हमारा काम तो हो गया, मांग पत्र जमा हो गया है। फिर उन्होंने हुकम दिया कि पांच मिनट के अंदर आप लोग मीटिंग खत्म कीजिए। हमें आत्मसमर्पण करने को कहा गया। हमने आत्मसमर्पण नहीं किया। दो लोगों ने आत्मसमर्पण नहीं किया, उसी में पुलिस वालों ने लाठी चलाना शुरू कर दिया। लाठी चलाने के तुरंत बाद गोलियां चला दी, जिसमे एक आदमी मारा गया। बागी देवगम गुआ के भीतर जोजोगुद् नामक एक गांव का रहने वाला था। बागी देवगम के बाद जीतू सोरेन भी वहीं पर मारा गया। हमारे पास और कोई रास्ता नहीं था। पहले हम जहाँ भी जाते थे तीर-धनुष ले कर चलते थे। तो जब कोई रास्ता नहीं बचा, लोगों ने तीर चलाना चालू कर दिया। उन लोगों के भी लोग गिरे और हमारे तो 4-5 गिर चुके थे। उसके बाद सब इधर-उधर भागने लगे।


दोनों ओर से संघर्ष के बीच 5-6 बन्दूक हमारे हाथ लग गए। मैं बोला, "यह तो सरकारी चीजें हैं, हमें हजम नहीं होगा। आप लोग इसको यहीं छोड़ दीजिये। कुछ साथी नहीं माने और दो-चार बंदूकें उठा कर ले गए। और जब थोड़ा शांत हुआ तो हम वहां से निकले। गुआ के नीचे नदी है उसके पीछे से होते हुए कोई इधर तो कोई उधर गाँवों में चले गए। मैं गुआ के भीतर एक गांव है जोजोगुद्र, वहां चला गया। अभी तो वहां पूल भी बन गया है। रात को मकई तोड़ कर पकाया और सुबह 5-6 बजे उठकर फिर से मकई पका कर उसे बांध कर साथ ले लिया। क्योंकि पैसे तो थे नहीं मेरे पास। बहुत ही विचित्र घड़ी था। इसको कभी नहीं भुला सकता।


यहां 5 हजार से अधिक लोग इकट्ठा हुए थे। सब तीर धनुष लिए थे। बीच में ही फायरिंग शुरू हो गया। आर पार फायरिंग होनी लगी। करीब सात-आठ लोग मारा गया अस्पताल में। अब कौन कहाँ फेंका गया उसका पता नहीं। लेकिन अस्पताल में जो रिकॉर्ड मिला उसमे ईश्वर सरदार भी थे। मरने को तो बहुत मरे। जिनको हिसाब देना था वो तो खुद दबाने वाली पार्टी में थे। सरकार तो खुद दबाने की कोशिश में थी। कितनों का क्या किया, कहाँ फेंका, किसी को पता नहीं। उसके बाद भी इधर उधर हत्याएँ हुई। उस वक्त रामेश्वर उरांव एसपी थे। कई लोगों को वे बचाए। और मजिस्ट्रेट थे फ्रांसिस। वे भी आदिवासी ही थे। फ्रांसिस तो समझदार आदमी थे, वे गोली चलाने के चक्कर में नहीं थे। उनका इरादा आराम से ही भीड को निकल देने का था। क्योंकि ऐसे बैठके तो होती ही रहती है। लेकिन बिहार पुलिस नहीं माने। उन्होंने गोली चला दिया। गोली जब चलना शुरू हुआ तो मजिस्ट्रेट सुअर गोड़ा (सुअर घर) में घुस के जान बचा रहे थे। जब पुलिस ने उन्हें देखा तो उनको निकाला और फायरिंग आर्डर पर साइन करवाया, क्योंकि फायरिंग आर्डर नहीं था। आखिर एक आदिवासी दूसरे आदिवासी के बारे में थोड़ा तो सोचेगा ही। वे तैयार नहीं थे आर्डर देने के लिए। मगर जबरदस्ती उन्हें आईदवाकराया गया। कितनी अजब कहानी है, सोचो जरा। सबसे बिचित्र तो इसलिए लगता है क्योंकि अस्पताल में निहचे लोगों के ऊपर गोली चल गया। रेड क्रॉस में गोली चलाया गया। इतना बड़ा नियम को नहीं माना. अंतराष्ट्रीय नियम को नहीं माना। आदिवासियों के ऊपर कितना बड़ा जुल्म हुआ, ये सोचो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि अगर हमारी आने वाला पीढ़ी को समझा नहीं पाए तो रेड इंडियन (अमरीका के आदिवासी जो अब बिलुप्त हो चुके हैं) की तरह यहाँ के आदिवासी भी बिलकुल साफ हो जायेंगे। इसीलिए लड़ाई चलती रही। उसके बाद भी 1985 तक यह चलती रही।


लडाई लगातार चलती रही और 1990 तक बहुत से मुकदमे दर्ज किये गए। हमने लाचार होकर तीर चलाया और उसके बाद सरकार ने हम लोगों के ऊपर ही केस किया। कइयों के घरों को तोड़ दिया गया। बहुत से लोग मारे गए। यह सब रातों-रात हुआ। हमारे ऊपर अनगिनत केस हुए। केस से हालत खराब कर दिया। मेरे नाम पर वारंट भी आ गया। मैं अंडर ग्राउंड रह रहा था। उसी चक्कर में मेरा घर को तोड़ दिया। अभी जिस घर में हम यह सब बातें कर रहे हैं, यह मेरा नहीं है। यह मेरी बड़ी बेटी का घर है। कभी-कभार इधर आ जाता हूँ। और जब आता हूँ तो खाकर सो भी जाता हूँ। मेरा घर यहां से थोड़ा अंदर है। एक कच्चा और खपरा का घर है. अभी भी उसी में रहता हूँ। तो उस समय मेरा घर तोड़ दिया गया। मेरी पत्नी ने उनसे गुजारिश भी की कि कम से कम बिस्तर को रहने दीजिए, बर्तन सब को रहने दीजिए। पर वे सुने नहीं, उल्टा बोलने लगे, तुम लोग जमीन में सो. जमीन में पकाओ और जमीन में खाओ। तुम लोग हम पुलिस वालों के ऊपर तीर चलाते हो। ये लोग सबकुछ ले गए।


मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे थे। एक का नाम था सखुआ उरांव और दूसरा का करम उरांव। घर तोड़ देने से दोनों बच्चे ठंड में सिकुड़ कर मर गए। उनका जन्म 19 दिसंबर 1980 में हुआ और 25 दिसंबर 1980 में दोनों चले गए। उसके बाद फिर बेटियों हुई। यह मेरा जीवन का सबसे दर्दनाक कहानी है। मगर मुझे यह बर्दाश्त करना पड़ा। मैंने निश्चित तौर पर अपना दो बेटा खोया है, मगर झारखण्ड में करोड़ो बेटे-बेटियाँ अच्छे से रह सकें इसी भरोसे के साथ आंदोलन जारी रखा। मैंने पूर्ण विश्वास के साथ लड़ा और आप सभी के सहयोग से झारखण्ड प्राप्त हुआ। लेकिन जो सपना हमने देखा था, जिस ख्वाब को हम बुन रहे थे, वह पूरा नहीं हुआ। झारखंड का असली फल तो हमें नहीं मिला। सिर्फ एक फॉर्मेट थमा दिया गया। झारखण्ड का तो बस नक्शा मिला। नक्शा छोड़ कर और क्या मिला हमें, बताओ। हमें तो उल्टा नुकसान ही हुआ है। जो स्थानीय नीति बना वो भी हमको ले डूबा। हमने सोचा था कि यहाँ का सत्ता, यहीं की नौकरी और जो भी है. सबकुछ अपने हाथों में होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उदाहरण के लिए देखिये, हटिया में एचइसी ने 7000 एकड़ जमीन लिया। उसमें इक्कीस हजार कर्मचारियों की भर्ती हुई। उसमे हमारे लोगों को मिला सिर्फ चार हजार पद और बाकी सत्रह हजार नौकरी प्रवासी लोग ले लिया। इतना अन्याय हुआ है।


इसी कारण मैंने राज्यपाल द्वारा दिया जाने वाला सम्मान ठुकरा दिया। 22 नवंबर 2015 को राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू बुलाई थीं। उन्होंने कहा कि आप बहुत अच्छा काम किये हैं इसलिए सम्मानित करना चाहती है। मगर मैंने नहीं लिया। मैंने कहा, पहले आप को मेरे कुछ सवालों का जवाब देना होगा। पहला तो यह कि झारखण्ड क्यों और किसके लिए बना। दूसरी बात मैंने पूछा कि 1908 में सीएनटी जो बना उसका क्या हो रहा है, उसका उल्लंघन क्यों हो रहा है। तीसरा सवाल मैने पूछा कि हमारे पढ़े लिखे नौजवानों का क्या हुआ। ये तीन चीजों का जवाब अगर दे दीजियेगा तो आपका सम्मान mai 


एक साथी था ईश्वर सरदार। उन्हें रोका गया, मगर वे नहीं माने और वहां जितने भी जख्‌मी पड़े थे उन सबको अस्पताल में लेकर भर्ती किया। उतने में गुआ और जामदा के तरफ जितने भी पुलिस जमा थे उनको उठा लाए और गोलियों की बौछार शुरू हो गई, वो भी अस्पताल में। अस्पताल के अंदर गोली चली। बहुत से लोग वहां पर मारे गए। हमने मींग रखी थी कि जब अंतराष्ट्रीय नियम है कि रेड क्रॉस में गोली नहीं चलना है, तो यह कैसे हुआ इसपर कमिश्नर फैसला करे। पर कोई जवाब नहीं दिया गया और नेता बोले कि अगर इसका जाँच बैठाया गया तो जवानों का मनोबल टूटेगा। उनके ऊपर कोई करवाई नहीं हुआ। सब पुलिस को बचा लिया गया। सिर्फ हम लोगों के ऊपर केस हुआ। हम कोर्ट दौड़ते रह गए। हमें अंडर ग्राउंड होना पड़ा। हमारे खिलाफ धारा 302, धारा 309 लगाया गया। शायद ही कोई धारा बचा हो हमारे ऊपर लादने के लिए। हमारे साथ बेईमानी किया गया।

स्वीकार करूँगा। नहीं तो ऐसे ही मेरे बेटे बेटियां चलते-फिरते मेरा बहुत सम्मान करते हैं। सम्मान में लोग मुझे काफी कुछ देते रहते हैं। तो वे कुछ बोलीं नहीं और मैंने सम्मान स्वीकार नहीं किया। बाद में, 3 जनवरी 2016 को, जयपाल सिंह के जन्मदिन के अवसर पर टाटा में जेबी तुबिद और उनके साथियों ने सम्मानित करना चाहा। मैंने उन्हें भी मना कर दिया।


मेरे ऊपर जब केस हुआ तो मैं सोचने लगा कि नौकरी अब जाने वाली है। ऐसे तो मैं तैयार ही था। तो मैंने लिखित दिया और जो भी मिलने वाला पैसा था वो निकाल लिया। मैंने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद में ऐसे ही बैठा हुआ था। कुछ साथियों ने कहा जब आप यूँ ही बैठे हुए हैं' तो एक बार प्रयास कर लीजिये। मैंने कहा कोशिश तो कर लेंगे मगर क्या होगा जीतने से। कॉर्पोरेट (पूँजीबाद) तो पूरा झारखण्ड को निगल गया है. बचने तो देगा नहीं, हमारा बात भी सुनेगा नहीं। इसमें सीताराम शास्त्री ने मुझे समझाया कि आदिवासी का किताब नहीं है, मगर जन्म से ही वे साम्यवादी समाजवादी विचारधारा के हैं। उन्होंने कई उदाहरण भी दिए। बोले. 'देखो, आदिवासी जब मरता है तो स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े, सब अंतिम संस्कार में जाते हैं। जो खेती बारी में करता है यो तो है ही, जो नाव-गान करता है वो तो अलग है, लेकिन अंतिम संस्कार में बहुत कम ही समुदाय में सभी लोग शामिल होते हैं। यह उदाहरण दे कर समझाया कि आदिवासी ही सच्चे कम्युनिस्ट हैं। उसका किताब नहीं होने से क्या हुआ, उसके बराबर का कोई दूसरा कम्युनिस्ट नहीं है। और अगर आप को कोई नहीं सुनेगा तो क्या होगा, नहीं अगर करेगा तो क्या होगा, कम से कम आप कुछ सीख कर तो आइएगा। इसी बात पर मैं चुनाव लड़ा और जीता। पार्टी से मुझे पाँच हजार मिला। वीर भगत, सीताराम शास्त्री और उत्ती तरह के साम्यवादी विचारधारा के लोगों ने पाँच हजार रुपया का सहायता किया और काम भी वही लोग किये। तो दस हजार रुपया हुआ, जिसमे से आठ हजार खर्च हुआ और दो हजार बच गया।


अब लोग कहते हैं कि आपको जब विधायक का पेंशन मिलता है. फिर क्यों इतना परेशानी उठाते हो? अबाल करते हैं कि क्यों मैं हमेशा भागदौड़ करते रहता हूँ। उनको मेरा एक ही जवाब है. जिनके यन सवा में विधायक बना वे लोग शहीद हो गये। मैं अगर उनकी कुर्बानियों का फल बैठ कर खाऊंगा तो क्या यह उचित होगा? इसीलिए में बैठने वालों में से नहीं हैं। मैं नहीं बैठ पाउँगा। और बैठना मुझे क्यारा भी नहीं। अगर में ऐसा करता हूँ तो यह उचित नहीं होगा, बल्कि बेईमानी होगा। मेरे साथी शहीद हो गये, है में लड़ता रहेगा। मैंने मख्यमंत्री को लिखा है इस विषय में। रघुवर दस को भी दिया था कि आप झारखण्ड के शहीदों के खून के ऊपर बैठे हैं इसलिए जो शहीद हैं उनके परिवार को पहले नौकरी से सम्मानित कीजिए। उसने यह नहीं करके क्या किया जानते हो? शराब पीकर एक बार छत्तीस आदमी मर गए थे टाटा के एक छोटे से गांव में उनको नौकरी दिया पैसा दिया और सम्मानित इसलिए किया कि पीने-खाने वाले प्रोत्साहित हो और नहीं पीने वाला बहादुर राय जैसे लड़ने वालों को भटकना पड़े, घर-द्वार तोड़वाना पड़े बच्चा मरवाना पड़े। यही सोच कर नहीं दिया होगा।


अभी कॉर्पोरेट युग है। हमारे लड़के-लड़कियों को पढ़ा लिख और आगे बढाइए। यह सब को डॉक्यूमेंट कीजिए इनका फिल्म बनाइये और गांव-गांव में प्रदर्शित कीजिए। जब मेला लगता है पर्व लगता है तब यह सब को दिखाइए । नौजवान साथियों से मिलकर एक आशा पूर्ण विश्वास जागा है कि हमारे कुर्बानियों को याद करके हमारे मकसद को आगे बढ़ाएंगे। पहले तो हमारे पास कहानियां लिखने के लिए साहित्यकार नहीं थे. कोई लिखित इतिहास नहीं था। लेकिन फिर भी एक बात तो है. कि आदिवासियों की भाषा-संस्कृति का खूबी यही है कि किताब नहीं था फिर भी जीवित रहा। पालन करते हुए ही उसका भाषा-संस्कृति अभी भी जिंदा है। और अब तो झारखण्ड भी बन गया है। अब इस दिशा में अधिक काम करने की जरुरत है। लिखने पढ़ने वाले नौजवान साथियों को देख कर यह विश्वास जागा है।


बहादुर उरांव ji का जीवन परिचय ||



बहादुर उरांव का जन्म चक्रधरपुर, कुम्बाटोली में हुआ था। वहीं उनकी शिक्षा दीक्षा भी हुई। बचपन में वे बैल बकरी चराया करते थे। मगर ईसाई समाज का एक प्रचारक, जिनका नाम हेरमस लकड़ा था. बहादुर को स्कूल भेजने के लिए उनके माता-पिता को सुझाव दिया। उन्होंने ही बहादुर को ले जा कर बांग्ला स्कूल में दाखिल कर दिया। बहादुर के अनुसार काफी बड़े उम्र में उनका शिक्षा आरम्भ हुआ। 10 साल के उम्र में वे स्कूल में दाखिल हुए। 'मेरा वास्तव में जन्म 1940 में हुआ था. लेकिन घटा कर उसे 1945 कर दिया गया। वे हँसते हुए बोले कि यह आम बात थी।


घर पर वे चार भाई और एक बहन थे। उनके पिता रेल में मजदूर थे और 1958 में काम करते-करते ही उनकी मौत हो गई। उस समय बहादुर आठवीं कक्षा में थे। पढ़ाई-लिखाई में उन्हें आर्थिक रूप से परेशानी होने लगी। मगर उनके साथी आगे आए और उन्हें हार नहीं मानते हुए पढ़ाई जारी रखने को कहा। वे 1961 में मेट्रिक परीक्षा दिए। मगर हिंदी में कमजोर होने के कारण फैल हो गए। दोबारा परीक्षा दिए और हिंदी में तो पास हुए, मगर इंग्लिश में फेल हो गए। मगर वे हिम्मत नहीं हारे और छह बार असफल होने के बावजूद सातवीं बार में उत्तीर्ण हुए। उस समय बिहार का मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर थे। उन्होंने बगैर इंग्लिश मेट्रिक लिखने का छूट दिया था। बहादुर विथाउट इंग्लिश पास (इंग्लिश दिए बगैर) हुए।


उस बीच, 1964 से, वे रेलवे ट्रैफिक में कार्य करने लगे थे। शुरू से ही बहादुर अन्याय बर्दाश्त नहीं करते थे। इसलिए वे हमेशा से ही लड़ने-भिड़ने के लिए पहचाने जाने लगे। रेल में जब उन्होंने देखा कि मूसखोरी और सूदखोरी अत्यधिक है तो वे उसके खिलाफ लड़ना शुरू किए। फोर्थ ग्रेड के कर्मचारियों के साथ मिल कर वे आंदोलन करने लगे और संगठित होकर संग्राम समिति बनाये। इस संग्राम समिति का अध्यक्ष बहादुर उरांव को बनाया गया। 1974 में रेल में एक बहुत बड़ा हड़ताल हुआ। उसमे भाग लेने के कारण उन्हें कुछ दिनों के लिए निलंबित किया गया। इसी तरह संघर्ष करते और निलंबित होते हुए उनका सफर जारी रहा।


1972 से ये शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखण्ड आंदोलन से पूर्ण रूप से जुड़ गए। इसी दौरान वे जंगल आंदोलन के हिस्सा रहे और कई आंदोलनों की अगुवाई भी की। ये सितम्बर 1980 को गुआ में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित थे। उन्होंने उस संघर्ष को अपनी आँखों से देखा, अपने कई साथियों को कुर्बान होते हुए देखा। उनके ऊपर कई मुकदमे चले और उनका घर तक को तोड़ दिया गया। उन्होंने झारखण्ड का सपना को पूरा करने के लिए अपने बेटों का बलिदान दे दिया। हालाँकि उन्हें आज भी अफसोस है कि जिस झारखण्ड का वे कल्पना किये थे, वह आज भी एक सपना ही रह गया है। इसके बावजूद आज भी वे जन-सेवा के लिए तत्पर रहते हैं।


बहादुर उरांव चक्रधरपुर से विधायक रह चुके हैं। मगर ये खुद को आज भी एक सेवक ही समझते हैं। वे मानते हैं कि विधायक होना सिर्फ उनकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि उन सभी लोगों का सम्मान को बनाए रखने की जिम्मेदारी है जिन्होंने संघर्ष की राहों में बलिदान दिए। इसीलिए वे सरकार द्वारा दिए गए सम्मानों को अस्वीकार करते हैं और तब तक करने की सोच रखते हैं जब तक उनके सपनों का झारखण्ड बनने की दिशा में कार्य होने न लगे।





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