विरल आख्यान मताई
(लेखिका डॉ. सुनीता घोगरा)
समीक्षक - डॉ. सावित्री कुमारी
सहायक प्राध्यापक, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, एसएस मेमोरियल college, Ranchi
Rare Narrative ‘Matai’: The Unique and Extraordinary Tale of an Indigenous Tribe | विरल आख्यान ‘मताई’: आदिवासी कबीलों की अनोखी और अद्भुत दास्तानAuthor: Dr. Sunita Ghogra Reviewer: Dr. Savitri Kumari, Assistant Professor, Postgraduate Department of Hindi, S.S. Memorial College, Ranchi.
राजस्थान की भील आदिवासी समुदाय की लेखिका डॉ सुनीता घोगरा का उपन्यास 'मताई' भील समुदाय की महागाथा है। 'मताई' आदिवासी कबीले का अदभुत रोमांचक आख्यान है। उपन्यासकार डॉ. सुनिता घोगरा का यह प्रथम उपन्यास है जिसे उन्होंने अपने पूर्वजों दादा-दादी, नाना-नानी को समर्पित किया है। उपन्यासकार ने 'मेरी बात' में स्वीकार किया है कि उपन्यास की सभी घटनायें वागड़ क्षेत्र के अलग-अलग स्थान और समय की है, जिन्हें मैंने एक की कथा के रूप में समेट लिया है। दरअसल यह उपन्यास उस दौर की कथा है। जब भील आदिवासी घने जंगलों में रहते थे, शिकार के द्वारा अपना भरण, पोषण करते थे और धरती प्रकृति के साथ उनका आत्मीय संबंध था। पहाड़ के ऊपर 'मताई' का वास मानते थे। धरती और प्रकृति की पूजा करते थे।
'मताई' उपन्यास में लेखिका ने फला और पाल को स्पष्ट किया है झोपड़ियाँ हिल-मिल कर रहना जानती हैं। सब आसपास सटी हुई हैं। एक छोटे से मैदान के चारों ओर बनी हुई झोपड़ियाँ मिलकर ही एक कबीला बनता है, जिसे फला भी कहा जाता है। डॉ. सुनीता घोगरा देवल पाल से है और घोगरा इनके फला (कबीला) का नाम है। आसपास कई फले हैं, ये पाल कहलाते हैं, एक कुनबा कहलाते हैं। इन फलों (कबीलों) में आपस में विवाह संबंध नहीं होते, तभी तो पाल की सारी कुवाईयाँ बहनें ही कहलाती हैं। 'मताई' की लेखिका
ने आभार में पेड़-पौधों और बागड़ में विचरण करने वाले जानवरों और पक्षियों का भी शुक्रिया अदा किया है। वे अपने अन्दर थोड़ा सा जंगल बचाकर रखना चाहती है।
इस उपन्यास को उपन्यासकार ने जिन खण्डों में बांटा है वह भी आदिवासी जीवन संस्कृति और जंगल के परिवेश से जुड़ा हुआ है मसलन - कायदे शिकार के... जंगल की भूलभुलैया, जय जोहार, भोपा और जड़ी बूटी, वानर दल, मेला, लाड़ी (दुल्हन), नागमणी, मताई, पारू, कांति, महुए, पेमा काका, झगड़ा, जमाई। कायदे शिकार के... पहला अध्याय है जिसमें वे लिखती हैं- यह जंगल में बसने वाले ही जानते हैं कि जंगल को देखकर नहीं, उसे सुनकर, उसे सूंघकर ही पार किया जा सकता है। दरअसल यह उपन्यास भारतीय वाचिक परम्परा के कहन परम्परा से भी जुड़ती हैं। जंगल और पहाड़ भूतों का डेरा नहीं है बल्कि आदिवासी जीवन में कला-शिल्प, संगीत, उपचार चिकित्सा, आहार-भोजन, शिकार-सेन्दरा, मनोरंजन-आनन्द है, साथ ही नदी-झरनों, फूलों, बीजों, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों के प्रति प्रेम की भी पाठशाला है।
उपन्यास में भील आदिवासियों के बीच मानवेत्तर पात्र के रूप में शेर का चित्रण किया है। खेल-खेल में बच्चे शेर की गुफा तक पहुँच जाते हैं, परन्तु पूर्वजों के आशीर्वाद से वे सही सलामत वापस आ पाते हैं। लेखिका ने अपनी माँ पारू और पिता वेला को उपन्यास के पात्र बनाया hai| unki माँ को अब भी लगता है अगर शेर भूखा होता तो न जाने उनके साथ क्या होता। आदिवासियों और जीव-जन्तुओं का आज भी गहरा रिश्ता है। वानरों को अब भी पूर्वज समझा जाता है। लेखिका बताती है कि भूलवश किसी वानर या अजगर की मृत्यु हो जाने पर आज भी उसकी अन्त्येष्टि सम्मान पूर्वक व विधिपूर्वक की जाती है। भील आदिवासी समुदायों में ये परम्परा मौजुद है। उपन्यासकार करीब दो सौ साल पीछे पाठकों को ले जाने में सफल रही हैं।
उपन्यास में भोपा के द्वारा तिलिस्म और रहस्य को लेखिका ने प्रमुखता से गढ़ा है। कबीले के सारे लोग खास पूजा की तैयार में जुट गए हैं। 'मताई' के ठीक सामने की तरफ गमेती व दूसरों बढ़ीलों (बुजुर्गों) द्वारा धुणी जलाने की तैयार होने लगी। गमेती ने पहले आटे से चौकोर आकृति बनाई, जिसके बीच में सूर्य था। दायें से बाएं घूमते हुए पृथ्वी व चंद्रमा की आकृति उकेरी गई।
कबीले वाले 'मताई' और पुरखा पूर्वजों को अपना रक्षक मानते हैं। इनको खुश करने का भील आदिवासी कबीलों की अपनी ही रीति है जिसे उपन्यासकार ने बहुत खूबसूरती से दर्ज किया है- हे मताई, हम सब आपके आभारी है। आपने हमें रहने को जमीन, खाने को अनाज, पीने को पानी दिया.... हमारी हमेशा रक्षा की। हमारे पशुओं को बीमारियों से बचाकर रखा, इसलिए आज हम सभी फले के कुटुंबवासी आपको सभी बातों के लिए धन्यवाद देते हुए सूर्य, पृथ्वी, चंद्रमा, अग्नि, पानी, आकाश, जंगल और हमारे पूर्वजों को साक्षी मानते हुए इसी धुणी को प्रज्वलित करते हैं। 'मताई' उपन्यास में भीलों के पुरखों की गाथाओं को रोचक ढंग से लेखिका ने लिखा है। यह उपन्यास पूर्वजों, प्रकृति, प्रकृति पूजक आदिवासियों की महागाथा है।
इस उपन्यास में लेखिका ने स्त्री पात्रों को प्रमुख जगह दी है क्योंकि आदिवासियों में कुवाईयों (युवतियों) का सम्मान किया जाता है। आदिवासी जीवन संस्कृति में स्त्रियों को नेतृत्व करने का मौका दिया जाता है। इस उपन्यास में प्रमुख स्त्री पात्र है सोमी जो भील आदिवासी कबीले के गमेती (मुखिया) की कुवाई (बेटी/युवती) है। उपन्यास के पहले खण्ड में ही भील आदिवासी समूह की युवतियों को जंगल में शिकार करते दिखलाया गया है जिसकी अगुवाई सोमी कर रही है। शिकार में उसके साथ हकरी, मंगली, थावरी, वाली, आदि कुवाईयां हैं। यह शिकार 'मताई' के लिए किया जा रहा है। युवकों का समूह शिकार के लिये निकला है। सोमी चाहती है कि इस बार शिकार करके सबसे पहले कुवाईयां गाँव वापस जाये ताकि उन्हें मताई को शिकार को समर्पित करने का अवसर मिले और भाईयों के सहयोग से वे ऐसा कर पाती हैं क्योंकि भाई उन्हें पहले गाँव पहुँचने का मौका देते हैं।
'मताई' उपन्यास में लेखिका ने अपने पूर्वजों और अपने परिवार वालों को कथा-पात्र बनाया है। पारू उनकी माँ है, बेला उनके पिता। मनु मनाथ लेखिका के पड़पड़ दादा हैं। दो सौ साल पीछे की उनकी कहानी है। उपन्यास के तीन अध्यायों में 'मताई' को शिकार अर्पित करने के लिए भील आदिवासी युवक युवतियों की अलग-अलग टोली की शिकार यात्रा के रोचक किस्से बुने हैं। भील आदिवासी युवक युवतियों का जंगल में शिकार करने
के लिए जाना, जंगल पार करके एक गाँव से दूसरे गांव या दूसरे कबीले के सुख-दुख में सम्मिलित होने जाना बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास जंगल के उस अनदेखे रहस्य से परिचित कराता है, जो हाल के दिनों का विवरण नहीं है। बल्कि दो सौ-तीन सौ साल पूर्व के जंगल और जंगल में रहने वाले आदिवासियों का आख्यान है।
भील आदिवासी पशु पक्षियों के साथ आत्मीयता का रिश्ता भी रखते हैं। रमती नामक युवती द्वारा गलती से बंदर को मार दिये जाने पर उसकी मृत्यु के लिए प्रायश्चित किया जाता है। पेमा काका के द्वारा घायल शेर की मदद करने के आख्यान को बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करती हैं। घायल शेर जिसके पैरों में कांटे चुभ गये थे टेमा काका उस घायल शेर की मदद करते हैं और जबतक शेर स्वस्थ नहीं हो जाता है तब तक उसके खाने की व्यवस्था करते ही है बल्कि उसका उपचार भी करते हैं। दरअसल आदिवासी इलाके में जो छोटे बड़े जानवर बचे हुए हैं, वह इस वजह से कि आदिवासियों का जानवरों, परिन्दों, वनस्पतियों से सहजीवी रिश्ता है। इसलिए जहाँ बाघ और हाथी है वहाँ आदिवासी भी। तभी तो झारखण्ड और उससे सटे इलाकों में बाघलता है, भालुलता है और हाथीबारी भी है।
दरअसल यह उपन्यास आदिवासी संस्कृति और जीवन मूल्य को दर्शाती है जिसमें कथित मुख्य धारा के पाठक कुछ असहज महसूस करते हैं। अपने से भिन्न संस्कृति की बातें तो दूसरे समाज के लोगों को असहज ही लगेगी। परन्तु जिस संस्कृति की कथा उपन्यासकार कथित मुख्यधारा के जीवन संस्कृति के प्रभाव में आये बिना लेकर आयी है, उसमें उसने पूरा न्याय किया है। आदिवासियों में अतिरिक्त की आकांक्षा नहीं होती। 'मताई' उपन्यास की कथा नायिका सोमी के shikar yatra ko
इस संदर्भ में याद किया जा सकता है। वह अतिरिक्त शिकार करने से अपने समूह को रोकती है।
'मताई' उपन्यास इस अर्थ में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें उपन्यासकार की भाषिक क्षमता, बिम्ब बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किये गये हैं। उपन्यास का चरम बिन्दु, 'मताई' के अंतिम खण्ड जमाई में है जो बहुत रोचक ढंग से लिखा गया है और एक बड़ी कुप्रथा की समाप्ति के लिए किये गये प्रयास का मार्मिक आख्यान है। उपन्यास को पढ़ते हुए कहानी सुनने की अनुभूति होती है। उपन्यास में पात्र जो संवाद बोलते हैं वह भी परिवेश और चरित्र के अनुसार सटीक है।
भारत में कई आदिवासी समुदाय हैं, सभी अपने-अपने समुदाय की कथा कहेंगे तो कहानी, उपन्यासों में विषय की विविधता, क्षेत्र की विविधता, भाषा की विविधता, कथ्य की विविधता रहेगी। सांस्कृतिक बहुलता से न सिर्फ आदिवासी साहित्य सम्पन्न होगा, बल्कि भारतीय साहित्य भी। 'मताई' उपन्यास की महता इस दृष्टि से भी निर्विवाद है।
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