झारखंड की जनजातीय महिलाएँ और मानवाधिकार : भारतीय संविधान की परिधि में
डॉ. रोज उराँव ..
भारतीय संविधान अपने उद्देश्यिका में ही भारत के नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय उपलब्ध कराने का संकल्प व्यक्त करता है। भारतीय संविधान के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा एवं विकास के लिय अनेक प्रावधान हैं। संविधान के अनुच्छेद 15(4), 16(4), 19(5), 23, 29, 46, 164, 330, 332.334, 335, 338, 339, 339 (1) में इसका उल्लेख किया गया है।' संविधान के भाग 16 के अनुच्छेद 330 से लेकर 342 में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा आंग्ल भारतीय समुदाय के संबंध में विशेष प्रावधान का वर्णन है जिससे सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग उन्नति कर विकास की मुख्य धारा में शामिल हो सके।
संविधान के भाग 19 के अनुच्छेद 366 के उपखंड 24 तथा 26 के अन्तर्गत अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित किया गया है और यह परिभाषा राष्ट्रपति द्वारा किसी विशेष राज्य या क्षेत्र के राज्यपाल से विमर्श कर बनाई गई जाति नामक सूची के आधार पर परिभाषित होती है जिसका वर्णन अनुच्छेद 341 (अनुसूचित जाति) और अनुच्छेद 342 (अनुसूचित जनजाति) में संदर्भित है। इन्हीं सूचियों में जिनका नाम है वही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति माने जाते हैं और जिन्हें संविधान के द्वारा विशेष सुविधाएँ मिली हुई हैं।
भारतीय संविधान में प्रत्येक मनुष्य को व्यक्तिगत विशेष अधिकार दिए गये हैं। उन अधिकारों को मानवाधिकार कहा जाता है। ये वैसे अधिकार हैं जो प्रत्येक मनुष्य को जन्म से ही स्वतः प्राप्त हो जाते हैं और उसके जीवन काल में बरकरार रहते हैं। "मानवाधिकार" से तात्पर्य ऐसे अधिकारों से है जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समता एवं महत्ता से सम्बद्ध है और संविधान द्वारा या अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय द्वारा प्रत्याभूत किए गए हैं तथा भारतीय न्यायालय द्वारा प्रर्वतनीय हैं।' मानव अधिकार, मानवजीवन और उसके सर्वागीण विकास के लिए बेहद जरूरी है।
भारतीय संविधान में आदिवासियों को राष्ट्रपति के विशेष संरक्षण में रखा गया है परन्तु विडम्बना यह है कि आज आदिवासी ही सबसे ज्यादा शक्तिहीन, भूमिहीन, बेघर वंचित, दलित और गरीब हैं। संवैधानिक प्रावधानों और संरक्षणों के बावजूद उनके मानवाधिकार का हनन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। आधुनिक विकास योजनाओं के निष्पादन के क्रम में सबसे ज्यादा आदिवासियों का ही आशियाना उजाड़झ गया है। बड़े बांध हों या कल-कारखाने इनकी बुनियाद आदिवासियों के रिहायसी इलाकों और जंगलों पर ही रखी गई है। छोटानागपुर, उडीसा और छत्तीसगढ़ की बात करें तो भिलाई बोकारो तथा राउरकेला इत्यादि स्थानों में इस्पात कल कारखाने आदिवसियों की ही जमीन पर बने हैं। बडे पैमाने पर उनका विस्थापन हुआ है। शहरीकरण के प्रभाव से ग्रामीण इलाके कीट के जंगल में परिवर्तित हो रहे हैं। प्राकृतिक वातावरण में रहने वाले ग्रानीप अब शहरीकरण की मार से कुपोषित, वंचित और फटेहाल जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं। आधुनिक विकास की इन विसंगतियों के बीच इन परिस्थितियों पर गम्भीरता और ईमानदारी से पुनर्विचार करने की जरूरत है। वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में आदिवासी जीवन पर पड़ने वाले कुप्रभाव के कारण उनके मानवाधिकार पर चौस्तफा हमला हुआ है।
भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति और जनजातियों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए बनाये गये मजबूत प्रावधानों के बावजूद आज झारखंड में जनजातीय मानवाधिकारों का उल्लंघन दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। डायन प्रथा, घरेलू हिंसा, छेडछाड, बलात्कार, अपहरण आदि के कारण आज जनजातीय महिलाएँ त्रस्त है। अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं का व्यापक स्तर पर उत्पीड़न हुआ है।' अमानवीय कृत्य डायन प्रथा को रोकने के लिए बिहार सरकार द्वारा डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 1999 लागू किया गया परंतु आज भी डायन घोषित कर प्रताड़ना जारी है। आदिवासियों के धर्म, रीति-रिवाज, भाषा, संस्कृति और पहचान पर भी लगातार हमले जारी हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350 (क) में स्पष्ट निर्देश है कि प्रत्येक राज्य और उस राज्य के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक स्थानीय भाषायी अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को उनकी ही मातृभाषा में शिक्षा देने का प्रावधान है किन्तु आज आदिवासी बच्चों की उनकी अपनी भाषा में शिक्षा देने की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाई है।
आज जनजातीय भाषाओं को बचाने की मुहिम चलाई जा रही है। बावजूद इसके जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं पर गहरे संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भाषा के साथ जनजातीय समुदाय की संस्कृति, पहचान, इतिहास और आत्मविश्वास जुड़े होते हैं, जो अब संकट में हैं। संवैधानिक सुरक्षा एवं सरकारी तथा गैर सरकारी प्रयासों के बावजूद झारखंड के जनजातीय महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। घरेलू नौकरानी के रूप में काम करती जनजातीय महिलायें शारीरिक और मानसिक रूप से शोषित हो रही हैं। रोजगार की तलाश में पलायन करने के कारण बाहर भी इनका शोषण हो रहा है। विगत कुछ वर्षों से मानव व्यापार जैसी समस्या भी उभर कर आयी हैं, जिसमें दलाल इन्हें सुनहरे सपने दिखाकर अंधेरे के गर्त में धकेल रहे हैं। असंगठित क्षेत्र जैसे ईंट भट्टा में और भवन निर्माण कार्य में काम करने वाली जनजातीय महिलाओं को मजदूरी के नाम में वाजिब मेहनताना भी नही मिलता। झारखंड की जनजातीय महिलाओं के अधिकांश कार्य निःशुल्क महत्वहीन तथा अदृश्य होते हैं।"
घर और खेतों में इनके द्वारा किया जाने वाला कार्य श्रम की उस श्रेणी में नहीं माना जाता जिसमें शुल्क का भुगतान हो। संविधान के तहत अवसर की समानता के अनुसार महिलाओं के लिए कार्य क्षेत्र के नए अवसर भी प्राप्त हुए जो पहले पुरुषों के अधिकार क्षेत्र में आते थे परंतु इसके साथ ही महिलाओं के मानवाधिकार हनन के कुछ नए दरवाजे भी खुले जैसे कार्यस्थल पर यौन शोषण, असंगठित क्षेत्रों में पुरुषों के समान वेतन न मिलना, घर और बाहर दोहरी जिम्मेदारी निभाने पर भी परिवार का साथ न मिलना और मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाना। जनजातीय महिलाएं इससे ज्यादा प्रभावित हुई हैं। भारतीय संविधान के भाग 3 के अनुच्छेद 32 "संवैधानिक उपचारों का अधिकार द्वारा मौलिक अधिकारों के उल्लघंन होने पर भारतीय नागरिक न्यायालय की शरण लेकर अपने मानव एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा एवं उपयोग कर सकते हैं।' इसके बावजूद अशिक्षा, गरीबी व जानकारी के अभाव के कारण जनजातीय महिलाएं अपने अधिकारों के हनन पर विरोध का स्वर बुलंद नहीं कर पाती है।
अशिक्षा, अंधविश्वास, गरीबी तथा कुपोषण की शिकार झारखंड की जनजातीय महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए आज प्रशासनिक ढांचे में बुनियादी परिवर्तन की जरूरत है। मौजूदा कानूनी प्रावधानों एवं नीतियों की समीक्षा करके उनमें सकारात्मक बदलाव लाने की भी जरूरत है। मनुष्य होने के नाते इन्हें भी अपने व्यक्तित्व के विकास करने एवं गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करने का पूरा अधिकार है। इन्हें इनके मानवाधिकार जो भारतीय संविधान, या अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय द्वारा प्रत्याभूत किए गए हैं तथा भारतीय न्यायालय द्वारा प्रर्वतनीय है कि जानकारी देकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा सकता है। अतः मानवाधिकार को एक पाठ्य विषय के रूप में स्थान देकर सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में अध्यापन की आवश्यकता है ताकि आदिवासियों में अपने अधिकारों के प्रति सजग चेतना का विकास हो सके। तभी भारतीय संविधान की विभिन्न धाराओं और अनुच्छेदों की मर्यादा बनी रहेगी और झारखंड की सरल स्वभाव वाली जनजातीय महिलाओं का भी सर्वांगीण विकास संभव हो सकेगा।
संदर्भ सूची
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शर्मा, ब्रजकिशोर भारत का संविधान, भारत सरकार विधि न्याय और कंपनी कार्य मंत्रालय विधायी विभाग, राजभाषा खंड, दिल्ली, 1991, पृष्ठ 95
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कुमारी, सोनी: झारखंड में महिला उत्पीडन समस्या एवं समाधान जानकी प्रकाशन, पटना, 2017 पृष्ठ 181
सहाय, पाण्डेय संजय : अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989, प्रीतम लॉ हाउस प्रा. लि. पटना, 2019, पृष्ठ 56
वर्मा, उमेश कुमार : झारखंड का जनजातीय समाज, सुबोध ग्रंथमाला, राँची, 2009, पृष्ठ 151
7. कश्यप, अंजली: भारतीय संविधान एवं मानव अधिकार, शताक्षी प्रकाशन, रायपुर, 2014, पृष्ठ 147



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