Lohia and Language Policy: Ram Manohar Lohia’s Views on Socialism, Hindi, and Indian Languagesलोहिया और भाषा नीति: समाजवाद, हिंदी और भारतीय भाषाओं पर राममनोहर लोहिया के विचार ||
लोहिया और भाषा नीति
मोहित कुमार लाल
भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में इसकी भाषा नीति का मूल्यांकन अनिवार्य है। यहाँ संविधान के आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है। इसी प्रकार अनेक भाषा-भाषी समूह अपनी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाना चाहते है। संविधान सभा में भी भाषा के विषय में गंभीर चिंतन हुआ था। अंतिम निर्णय यह हुआ कि 15 वर्ष तक अंग्रेजी ही राजकीय भाषा रहेगी। तत्पश्चात् हिन्दी को राजकीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जायेगा। किन्तु यह शुभ दिन आज तक नहीं आया। आज भी हिंदी अंग्रेजी की चेरी बनी हुई है जबकि हम हिन्दी को सम्मान दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रयास करते हैं और इसे संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा बनाना चाहते हैं। वर्तमान में 11वीं हिंदी अंतराष्ट्रीय सम्मेलन जो मौरिसस में आयोजित हुआ। हिंदी को विश्व पटल पर लाने का आह्वान किया गया। डॉ. लोहिया उन राजनेताओं में हैं जिन्होंने समी विषयों पर चिंतन कर अपने विचार दिये। उन्होंने भाषा के विषय में भी गंभीर मंथन किया था। वे हिन्दी और भारतीय भाषाओं को विकसित करने के लिए कुछ सुझाव दिये थे। वर्तमान संदर्भमें जब हम हिंदी को विश्व भाषा बनाना चाहते हैं जबकि यह भारत की ही राजकीय भाषा नहीं बन सकी है। इसी आलोक में यह लेख लिखने की प्रेरणा मिली है जिसमें डॉ. लोहिया के भाषा संबंधी विचारों का मूल्यांकन किया गया है।
लोहिया और भाषा नीति: समाजवाद, हिंदी और भारतीय भाषाओं पर राममनोहर लोहिया के विचार ll
प्रस्तुत आलेख को तैयार करने के पूर्व राममनोहर लोहिया रचनावली खण्ड-8-का अध्ययन किया गया जिसमें राममनोहर लोहिया द्वारा भाषा पर लिखे गये लेखों का संकलन है। इसका संपादन मस्तराम कपूर ने किया है। इसी प्रकार मस्तराम कपूर द्वारा संपादित स्मरण लोहिया का भी अध्ययन किया गया जिसमें विशेष कर तीन लेख डॉ. लोहिया के भाषा संबंधी विषय पर है। ये है भारतीय भाषाएँ और डॉ० लोहिया- जिसमें कौशलेंद्र प्रपन्न ने लिखा है। इसी प्रकार दूसरा लेख राजाराम कोडपड़े ने लिखा है जिसका विषय है भाषा समस्या लोहिया के विचार, तीसरा लेख नंदकिशोर आचार्य ने लिखा है, विषय है डॉ. लोहिया और हिंदी साहित्य इसी प्रकार भारत के शासक नामक पुस्तक का अध्ययन किया गया है जिसमें डॉ. राममनोहर लोहिया द्वारा लिखे लेखों का संग्रह है जिसका संपादन समाजवाद की दशा-दिशा और लोहिया जीवन-दर्शन का अध्ययन किया गया। इन पुस्तकों के आधार पर राममनोहर लोहिया के भाषा संबंधी दृष्टिकोण का अध्ययन किया गया।
भारत में स्वतंत्रता के समय से यह विवाद निरंतर राजनीतिक परिदृश्य में चलाया जा रहा है कि भारत की भाषा नीति क्या होगी। यह संविधान सभा में भी इस विषय पर गंभीर चिंतन हुआ था। अंतोगत्वा यह निर्णय हुआ कि राष्ट्र भाषा हिन्दी होगी किन्तु अगले 15 वर्ष तक अंग्रेजी सरकारी भाषा रहेगी। यह आशा की गई थी कि 15 वर्ष में हिन्दी विकसित हो जायेगी और अंग्रेजी का स्थान ले लेगी। वस्तुतः राजनीतिक नेतृत्व के एक वर्ग को यह विश्वास था कि बहुभाषीय भारतीय राष्ट्र में अंग्रेजी संपर्क भाषा है। भारत को एक राष्ट्र बनाने में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। डॉ. लोहिया प्रारंभ से ही इस विचार से सहमत नहीं थे। उनका विचार था कि अंग्रेजी को तत्काल समाप्त कर भारतीय भाषाओं को सम्मान देना चाहिए। उन्होंने लिखा है कि "अंग्रेजी एक विदेशी भाषा है और राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुँचाती है, यह बात इस बात की तुलना में मामूली है कि आर्थिक प्रगति में वह बाधक है, गैरबराबरी को बढ़ावा देती है और अंग्रेजी का इस्तेमाल अल्पसंख्यक के शासन का हथियार बनता है। किन्तु खास करके अहिंदी क्षेत्रों में, यह बात उल्टे ढंग से कही जाती है और इससे जनता को बरगलाने में सफलता मिली है।' डॉ. लोहिया का कथन था कि भारत में एकता के लिए अंग्रेजी भाषा अनिवार्य नहीं है। यह केवल 1% पढ़े-लिखों की भाषा है। 99% लोग भारतीय भाषा (मातृभाषा) बोलते और समझते हैं। अतः इन भाषाओं को विकसित करना अनिवार्य है।
डॉ. लोहिया ने यह भी कहा था कि अंग्रेजी भाषा में लोकतंत्र संभव नहीं है क्योंकि अंग्रेजी एक सामंती भाषा है। केवल "हिन्दुस्तान में अंग्रेजी बोलने वाले चालीस से पचास लाख लोग है और समझने तथा वेशभूषा वाले पचास से सत्तर लाख लोग होंगे। कुल मिलाकर एक प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो अंग्रेजी जानते हैं। जिस भाषा को देश के 99 प्रतिशत लोग नहीं समझते, उसमें देश का सारा कामकाल करनेवाला हमारा ही देश है।" वस्तुतः डॉ. लोहिया का विचार था कि हिन्दी और अंग्रेजी को लेकर संविधान सभा में जो झगड़ा हुआ वह झगड़ा ही गलत तथ्यों पर आधारित था। भारत में वास्तविक झगड़ा अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं का है। इसे राजनेता गलत स्वरूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा था कि "हिन्दी और हिन्दीतर के झगड़े के संबंध में उन्होंने स्पष्ट कहा कि असली झगड़ा तो अंग्रेजी और देशी भाषाओं का है, न कि हिन्दी और हिन्दीतर भाषाओं का। यह नकली और जहरीला झगड़ा 'अंग्रेजी और देशी भाषाओं के झगड़े पर पर्दा डालने के लिए कुछ मुट्ठी भर अंग्रेजी समर्थकों ने अपने स्वार्थ के लिए खड़ा किया है।"
डॉ. लोहिया ji का विचार था कि भारतीय अपना सारा समय विदेशी भाषा सीखने में लगा देते हैं जिससे उनके कौशल का विकास नहीं होता। छात्रों को अपना ध्यान भाषा सीखने के स्थान पर उनका ज्ञान प्राप्त करने में लगाना चाहिए। भारत में विद्यता का प्रतीक अंग्रेजी भाषा बन गई है। अंग्रेजी भाषा बोलने वाले सम्मान के पात्र हो गए हैं। यह एक दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति है जिससे हमें बचना चाहिए। वे इसे गुलाम प्रवृति का प्रतीक मानते हैं। उन्होंने कहा था "मैं चाहूँगा कि हिन्दुस्तान के साधारण लोग अपने अंग्रेजी के अज्ञान पर न लजाएँ बल्कि घमण्ड करें। इस सामंती भाषा को उन्हीं के लिए छोड़ दें, जिनके माँ-बाप अगर शरीर से नहीं, तो आत्मा से अंग्रेज रहे हों।
डॉ. लोहिया ने सरकार की शिक्षा नीति की आलोचना की है। उन्होंने भारतीय छात्रों की असफलता के पीछे सरकारी नीति को उत्तरदायी माना है। भारत में अंग्रेजी को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, जिससे छात्र परेशान रहते हैं उन्होंने कहा था कि 'ये पाँच लाख दूसरे सभी विषयों में पास होते हैं पर सिर्फ एक में फेल हो जाते हैं। उन्हें क्यों अंग्रेजी लाजमी तौर पर पढ़ाई जाए और फिर क्यों वे असफलता का कलंक भुगते? शिक्षा का मतलब होता है कि उन्हें आवश्यक ज्ञान दिया जाए, न कि उन्हें विदेशी भाषा पढ़ाकर हैरान किया जाए, जिसे सीख पाना उनके लिए प्रायः असंभव है।"*
डॉ. लोहिया का विचार था कि भारत चीन की अपेक्षा आर्थिक रूप से पिछड़ गया है जबकि दोनों ने लगभग एक ही समय में अपना विकास यात्रा प्रारंभ की। भारत 15 अगस्त 1947 में स्वतंत्र हुआ जबकि साम्यवादी चीन 1949 में अस्तित्व में आया। चीन ने विकास हेतू अपनी मात्री भाषा चीनी को अपनाया जबकि भारत में तकनीक और कौशल की भाषा अंग्रेजी ही रही। लोहिया ने कहा था "चीन के मुकाबले में हिन्दुस्तान की दयनीय अवस्था और लज्जाप्रद स्थिति कई कारणों से है, जिनमें से भाषा कोई कम मुख्य कारण नहीं है। उद्योग, ज्ञान-विज्ञान, हुनर आदि में हिन्दुस्तान से चीन कहीं ज्यादा बढ़ा है, क्योंकि उसने मातृभाषा या लोकभाषा को माध्यम बनाया। हमारे अपने देश में अल्पमत द्वारा शासन और शोषण की भाषा अंग्रेजी के इस्तेमाल से ज्ञान-विज्ञान और उद्योगीकरण सिकुड गया है।" डॉ. लोहिया अंग्रेजी की तुलना गुप्त ज्ञान से करते हैं। उनका विचार था कि प्रजातंत्र में लोकभाषा ही राज्य भाषा होनी चाहिए क्योंकि जनता का शासन जनता की भाषा में ही न्याय संगत है। शासक वही बोलें जो शासित समझ सके। उन्होंने कहा कि "अंग्रेजी को हटाये बिना समाजवाद, जनतंत्र और ईमानदारी का पहला कदम भी असंभव है। चालीस करोड़ हिन्दुस्तानियों के लिए तीस लाख लोगों की अंग्रेजी एक गुप्त विद्या है। जैसे टोना टोटका या भूत झाड़ने के मंत्र इत्यादि। गुप्त विद्याओं से किसी भी देश का नाश हुआ करता है।""
डॉ. लोहिया की स्पष्ट मान्यता थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ मानसिक रूप से भी राष्ट्र को स्वतंत्र होना चाहिए। देश की शिक्षा प्रणाली मात्रीय भाषा में ही पल्लवीत और पुष्पित होगी। उनकी मान्यता थी कि भाषा को विदेशी शासन के प्रभाव से मुक्ति मिलनी चाहिए "उनका यह भी दृढ़ मत था कि लंबे समय से औपनिवेशिक संस्कृति और वैचारिक गुलामी में रहने वाले भारत की अपनी स्वायत्तता, अपनी भाषा की पहचान को सोच-समझकर स्थापित करने में
ही हो सकती है।" डॉ. लोहिया ने स्पष्ट किया था कि उनका संघर्ष हिन्दी को स्थापित करने के लिए नहीं है वरन् भारत की सभी भाषाओं को विकसित करना है। इनके बीच सामिप्य स्थापित करन इन्हें विकसित करना है। अंग्रेजी के प्रभाव में सभी भारतीय भाषायें अविकसित अवस्था में रह जायेगी क्योंकि भारत में यह आम धारणा बना दी गई है कि अंग्रेजी ही ज्ञान-विज्ञान की भाषा है।
इसी कारण राममनोहर लोहिया ने विचार दिया था कि यदि इसको एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय भाषाओं के लिए लोहिया एक विशिष्ट एजेंडा तैयार कर रहे थे और अंग्रेजी हटाओ आंदोलन उसका एक हिस्सा मात्र ही था। भाषा के विषय पर लोहिया का कार्य मूलतः भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे के निकट समृद्ध बनाने का प्रयास था। यह उनके एक वृहत्त स्वप्न का अभिन्न अंग था जिसमें वह भाषाओं की समृद्धि द्वारा मनुष्य जाति की समृद्धि की परिकल्पना करते थे।"*
डॉ. लोहिया इस बात के समर्थन में थे कि भाषा जीवंत और सरस होनी चाहिए। प्रत्येक भाषा में शब्द-कोष विकसित होना चाहिए। वे चाहते थे कि हम अपनी भाषाओं को समृद्ध करें और अंग्रेजी के समक्ष लाएँ।
हिन्दी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाने हेतु हिन्दी भाषियों को प्रयास करना होगा। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा है कि "हिन्दी ऐसी हो कि उसमें सब तरह की बुद्धियाँ खिल सकें। भाषा सटीक हो, रंगीन हो, अलग-अलग मतलब को बता सके अर्थात परिभाषिक हो और ठेठ, जारेदार तथा रोचक हो। संपन्न भाषा के और कोई मतलब नहीं होते। किसी भाषा में कितने विषय की कितनी किताबें हैं, यह एक गौण अथवा संदर्भ का सवाल है। अगर हिन्दी सभी विषयों के लिए सटीक और रंगीन बन जाए तो लाख या पचास हजार किताबों के लिखने या अनुवाद करने में क्या देर लगती है।"
डॉ. लोहिया हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने के साथ गैर-हिन्दी भाषा-भाषियों के हितों की भी चिंता करते थे। हिन्दी को गैर हिन्दी क्षेत्रों में ग्रहण योग्य बनाने हेतु उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि "10 साल तक केन्द्रीय सरकार की नौकरियाँ हिन्दी भाषी लोगों के लिए बंद कर दी जाए। बंगाली, मराठी, तमिल, आदि लोग ही इन नौकरियों में लिए जाएँ। हिन्दी के लिए हिन्दी भाषा बोलने वालों को इतना त्याग करना चाहिए। लोग कहते हैं कि इस तरह आप हिन्दी वाले को मारते हैं। मैं कहता हूँ कि इस देश को केवल बीस हजार हिन्दी भाषी जो सरकारी नौकरियाँ ढुंढ़ते हैं के लिए चलाना है या चालीस करोड़ के लिए। हिन्दी वाले इस गैर बराबरी का मुकाबला नहीं करेगें इसका मुझे काफी विश्वास है।""
डॉ. लोहिया हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को भी प्रतिष्ठत करने के पक्ष में थे। उनका विश्वास था कि मातृभाषा में ही प्राथमिक शिक्षा दी जानी चाहिए। इस हेतु उन्होंने एक भाषा नीति का प्रस्ताव रखा था। "लोहिया का पहला सरोकार अंग्रेजी-वर्चस्व के अभेद किले पर हमला करना है। लोहिया मानते हैं कि हिन्दी की हिमायत वही कर सकता है जो उसकी बराबरी में अंग्रेजी को न लाए, बल्कि हिन्दुस्तान कि दूसरी भाषाओं की बात करे। इसलिए लोहिया बार-बार साफ करते चलते हैं कि मैं सिर्फ हिन्दी कि नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं कि बात कर रहा हूँ। भारतीय भाषाओं को बचाने के लिए लोहिया कुछ सूत्र सुझाते है। मसलन, केन्द्र व राज्य सरकार आपस में हिन्दी व स्थानीय भाषा में पत्रव्यवहार करें। स्कूल, कॉलेज स्तर पर बी.ए., एम.ए. की पढ़ाई का माध्यम हिन्दी व मातृभाषाएँ हो और यदि कोई अंग्रेजी को चुनने पर जोर देता है तो साफ इनकार किया जाए। शिक्षा में माध्यम को लेकर गाँधी जी की धारणा भी यही रही है कि बच्चों को शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जाए। वर्धा सम्मेलन में गाँधी ने स्पष्ट कहा था कि तालिम हमारी अपनी मातृभाषा में मिलना चाहिए।"
वस्तुतः डॉ. राममनोहर लोहिया एक सच्चे अर्थों में स्वतन्त्रता सेनानी थे। वे राजनीतिक ही नहीं सांस्कृतिक, समाजीक और आर्थिक क्षेत्र में भी स्वतन्त्रता के पक्षधर थे। अतः एक विदेशी भाषा को सरकारी भाषा बनाने कि नीति उन्हें गुलाम प्रवृति का परिचायक प्रतीत होती थी। अतः वे हिन्दी और भारतीय भाषाओं को विकसित कर अंग्रेजी का स्थान दिलाने के पक्ष में थे। अपनी भाषा ही अपने राष्ट्र को स्वाभिमान प्रदान कर सकती है इस नीति से भारतीय छात्र-छात्राओं का समय और परिश्रम भी बचेगा, क्योंकि उनका अधिकांश समय विदेशी भाषा सीखने में लग जाता है। डॉ. राममनोहर लोहिया कि भाषा नीति राष्ट्र हित में थी जिसका अनुपालन अभी तक संभव नहीं हो सका है।
संदर्भ सूची
1.
लोहिया, राममनोहर: हिंदी-अंग्रेजी, राममनोहर लोहिया रचनावली खंड- मस्तराम कपूर (सं.) अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा०) लि०, नई दिल्ली, 2008 पृष्ठ संख्या-373
2 सिंह, डॉ. रामसागर समाजवाद की दशा-दिशा और लोहिया जीवन-दर्शन, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 20099 पृष्ठ संख्या-152
3. वही, पृष्ठ संख्या-150-151
4. लोहिया, राममनोहर: सामन्ती भाषा में लोकराज असंभव ओंकार शरद (सं.) भारत के शासक, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबद नयी दिल्ली पटना, 2010 पृष्ठ संख्या 127
5. लोहिया, राममनोहर: वर्णमाला, भाषा और शिक्षा, राममनोहर लोहिया, रचनावली खंड-४ पूर्वोद्धृत, पृष्ठ संख्या-20
*सहायक प्राध्यापक, इतिहास विभाग, सुरज सिंह मेमोरियल कॉलेज, राँची विश्वविद्यालय, राँची
Journal of Historical Research
6. Lohia, Ram Manohar, Speak in Mother Tongue, Omkar Sharad (ed.), Rulers of India, ibid., page no. 122
7. Lohia, Ram Manohar Hindi in Uttar Pradesh, Ram Manohar Lohia Works, Volume 4 (aforementioned), page number 393
8 Tolpadi, Rajaram Language Problem Lohia's Thoughts, Mastram Kapoor (ed.), Remembering Lohia, Anamika Publishers & Distributors, New Delhi 2014 Page No. 323
9. Ibid., page no.-329
10. Lohia, Ram Manohar, "What is Hindi?" Ram Manohar Lohia, "Ram Manohar Lohia's Works," Volume 4, quoted above, page 379.
11. Lohia, Ram Manohar Hindi versus English, Ram Manohar Lohia Rachanavli Volume 4, quoted above, page number 401
12. Prapanna Kaushlendra, Indian Languages and Dr. Lohia, Remembering Lohia, quoted above, page number- 286




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