शाहजहाँ की आँख
'मुमताज !'
'आलीजाह !'
'अब कैसी हो, मुमताज ?'
'जीवन की आशा शेष होती जा रही है, मालिक !'
'नहीं मलिका, तू मुझे अकेला छोड़कर नहीं जा सकती।'
'यह हसरत लिये ही जाना होगा बन्दापरवर कि साथ मरेंगे, साथ जियेंगे । सोचा तो था कि आज तक जो जीवन के साँस इकट्ठे लिये जा रही हूँ, उनकी डोरी साथ ही टूटेगी। किन्तु आशा को निराशा की डोरियाँ बड़ी तत्परता से अपनी ओर तान रही हैं मुझे अकेले ही जाना होगा, आलीजाह !'
'बेगम !' और शहंशाह शाहजहाँ का गला भर्रा गया, आँखें भर आयीं।
'क्या सोच रहे हैं, मालिक ?' फीकी आवाज थी मुमताज की।
इसी समय शाहजहाँ के दरबार जाने का सूचक राजकीय वाद्य बज उठा। वैसे आजकल मुमताज की बीमारी के कारण बादशाह का दरबार में जाना प्रायः बन्द था, किन्तु कभी-कभी किसी आवश्यक मन्त्रणा के लिए जाना ही पड़ता था ।
कई दिनों से शाही महलों में राजकीय वाद्य इत्यादि सुनायी नहीं दे रहे थे। चारों ओर मौत की-सी संजीदगी छायी रहती थी। राजधानी आगरा में हवा की तरह मलिका-ए-आलम मुमताज की बीमारी की खबर फैल चुकीथी। बादशाह की उदासी जनता के अन्तर की उदासी बनी हुई थी। नगर में कोई भी उत्सव या रौनक नहीं थी। शाही महलों की चहल-पहल तो सर्वथा लुप्त हो चुकी थी । सर्वथा मौन की छाया चारों ओर छायी रहती। हाँ, कभी दासियों के पाँवों की आहट या फिर कराहता हुआ फीकान्सा शाह और मुमताज का वार्तालाप सुनायी दे जाता ।
मुमताज के फीके, घटते हुए चाँद के से चेहरे की तरफ आँखें गड़ाये शाहजहाँ ने कहा, 'खुदा ने मुझे बादशाह क्यों बनाया ? भिखारी बनाया होता तो आज मैं निश्चिन्त अपनी हृदय-साम्राज्ञी की सेवा में दिन-रात एक कर देता। उसे अपनी पलकों पर उठाये रहता और खुदा से कहता कि मेरी जिन्दगी चाहे ले लो, किन्तु मेरी आत्मा का प्रकाश न बुझाओ।'
'बालिये-हिन्द के मुँह से ये कैसी बहकी बहकी बातें सुन रही हूँ ?' 'सच कहता हूँ मुमताज, जी में आता है कि जो प्यार तुमने मुझे अपनी जिन्दगी में दिया, जो प्रकाश तुमने अपनी आत्मा को जलाकर मुझे दिया, उस पर एक तो क्या हजारों सल्तनतें न्योछावर कर दूँ।'
'नन्न, ऐसा न कहिये, मेरे मालिक ?' बाँदी को गम है तो केवल इतना कि वह जीवन की अन्तिम साँस तक इन कदमों की सेवा न कर सकी, जिन्होंने कीचड़ से उठाकर इस नाचीज मुमताज को अपने ताज का हीरा बनाया ।'
सहसा शाहजहाँ का दरबार में आह्वान-वाद्य पुनः बज उठा। बादशाह ने आकुल अन्तर और अधीर नयनों से एक बार ऊपर देखा और फिर बोले, 'बादशाह की जिन्दगी भी क्या है ! लोग शायद यह नहीं जानते कि अपनी मुमताज के साथ-साथ आज उनके बादशाह का अन्तर भी बुझा जा रहा है, उसकी आत्मा रोग शैया पर तड़प रही है, फिर भी बार-बार नक्कारा बजा मन्त्रणागार मैं बुला रहे हैं। उफ! यह भी कोई जीवन है !'
'जाओ, मेरे मालिक ! यह केवल शाही नक्कारा ही तो नहीं; बल्कि शाहे-हिन्द के कर्त्तव्य की पुकार है। जनता अपने राजा से सुख-दुःख कहने के लिए ताक रही होगी। आज तक आपने अपने दिल को कठोर बनाकर अपना कर्त्तव्य पालन किया है। आज उसी की पुकार सुन यह उपेक्षा नहीं जंचती, आलीजाह ! जाइये, वाँदी तब तक आपके लौटने की प्रतीक्षाकरेगी।'
'नहीं मुमताज ! आज न जाने कैसा लग रहा है? ऐसा लगता है कि जैसे मेरी समस्त आन्तरिक शक्तियाँ क्षीण होती जा रही हैं, चेतना विलुप्त-सी हो रही है, जैसे कोई मेरी आत्मा को बलात छीने-नोचे लिये जा रहा है। नहीं बेगम, आज मैं किसी भी तरह दरबार नहीं जा सकता ।'
हत्प्रभ-सी मुमताज शाह के चेहरे को पढ़ने लगी। मुस्कानों से खिले चेहरे पर उदासी का एकाधिपत्य था। आँखें बुझी-बुझी-सी लग रही थीं।
आकुल से कुछ क्षण काट बादशाह ने एकदम पुकारा :
'बाँदी !'
'जहाँपनाह !' एक बाँदी हाथ बाँधे खड़ी थी।
'वजीरे-आजम को कहला भेजो कि वे खुद ही अहमदाबाद और दिल्ली से आये सरदारों से निपट लें। मैं दरबार नहीं आ सकूँगा। जाओ।'
गयी । 'जो हुक्म, परवरदिगार !' कोनिश कर बाँदी उन्हीं पाँवों पर लौट
बाँदी महल से बाहर ही हुई थी कि बादशाह का आह्वान-वाद्य पुनः बज उठा और कई क्षणों तक बजता रहा।
'उफ !' बादशाह के मुँह से निकल गया।
'जाओ मालिक, इस मिट्टी के बुत का प्यार....
'न-न, इतनी कठोर न बनो मुमताज ! बादशाह भी एक साधारण
व्यक्ति जैसा ही...'
'प्रजा को भूलकर एक जान के लिए यहाँ बैठे रहना क्या शोभा देता है बादशाह को ?'
'मजबूर न करो, मलिका ।'
'हो सकता है मालिक, आज आप तो यहाँ एक जान के लिए बैठे हो और उधर हजारों जानों पर बन आयी हो। प्यार की जो तस्वीर आज तक हमने बनायी है इस जरा-सी भूल के कारण कहीं उस पर धब्बा न पड़ जाये। दुनिया को यह कहने का अवसर मिल जाय कि मुमताज की मुहब्बत ने शहंशाह शाहजहाँ को कर्त्तव्यविमुख कर दिया।'
'ओह मुमताज ! मुझे आज तुम्हारी ये बातें अच्छी नहीं लग रहीं। मैंदुनिया की परवाह नहीं करता।'
'दुनिया में रहने के लिए दुनिया की परवाह करना आवश्यक है, मालिक ! प्यार की जो रीति आज तक हमने पाली है, दुनिया से उठ जाने के बाद भी मुमताज उस पर उंगली उठती नहीं देखना चाहती। मुमताज और उसका प्यार, सर्वस्व तो आपका है ही। किन्तु प्रजा की दुआएँ मिलनी कठिन होती हैं। जाइये मेरे सरताज, सरदार लोग आपकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।'
'तुम्हारा हुक्म, मलिका !' न चाहता हुआ भी शाहजहाँ सिर नीचा किये उठकर चल दिया ।
राजकीय वाद्य शान्त स्वरों में बज उठे। बाँदियाँ इतर छिड़कने लगीं। आज बहुत दिनों के बाद बादशाह दरबार में आ रहे थे।
धधकती-सी उजली किरणें रक्तिम होकर सन्ध्यागमन की सूचना दे रही थीं। दिन भर का क्लान्त दिनकर विरक्त-सा भागा जा रहा था पश्चिमी क्षितिज की ओर । वातावरण अजीब उदास-सा लग रहा था।
मन्द-मन्द सरकता समीरण प्राणों में गुदगुदी-सी भरने का असफल प्रयास कर रहा था। संगमरमर से निर्मित हवादार बैठक में दुग्ध-धवल शैया पर रोगिनी मुमताज पड़ी थी। दासियाँ परिचर्या में रत थीं। अर्धोन्मादिनी-सी रोगिणी कभी-कभी कुछ अस्पष्ट-सा कराह उठती। आज उसकी दशा अधिक चिन्ताजनक थी। शाही हकीमों ने निराश हो अधिक सतर्कता की आवश्यकता बता रखी थी ।
आगे के लालकिले पर पड़कर कुंठित-सी रवि-किरणें पीतवर्ण हो रही थीं और नीचे बिलकुल किले की दीवारों से टकराती बह रही थी नील-सलिला यमुना की तेज धारा। यमुना के उस पार वाले झुरमुट में, जहाँ आज रोज-ए-ताज है, अँधियारा-सा भरता जा रहा था। हरियाली पर धुंधली छाया पड़ने लगी थी ।
सहसा मुमताज कराह उठी, 'उफ ! दर्द! सर फटा जा रहा है। चारों तरफ रात की धुंधली रेखाएँ बिच रही हैं और उन धुँधली लकीरों सेनिकलकर कोई जबरदस्ती मुझे अपनी ओर घसीट रहा है। वे नहीं आये, मेरे मालिक, सरताज अभी तक नहीं लौटे। साँसों की डोर तनती जा रही है। दीपक की लौ भभकने लगी है और वह ! वह वह वह न-हीं आ-ये...' हांफती-सी वह बेसुध हो गयी। दासियों में भगदड़ मच गयी । कोई हवा करने लगी, तो कोई गुलाब जल छिड़कने ।
एक दासी अन्धाधुन्ध भागी और राजकीय वाद्य पुनः शोकमय स्वरों में जोर-जोर से बजने लगा ।
ओर । राजदरबार में खलबली मच गयी। शाहजहाँ एकाएक भागे महल की
परिचर्या में निरत दासियाँ एक ओर हट गयीं और सूखा-सा चेहरा लिये भर्राये गले से मुमताज, मुमताज पुकारते शाहजहाँ उसी पलंग पर बैठ गये।
मुमताज ने करवट ली:
'आ गये, आ गये, मेरे सरताज !' आवाज बुझ-सी रही थी।
'मुमताज, कैसी तबीयत है ?' बादशाह का अन्तर उमड़ा आ रहा था।
'साँसों का अन्तिम पासा बाकी है, सरताज ! दो-एक साँस आपके दर्शनों के लिए अटक रहे हैं, मालिक !' कहती कहती मुमताज उठकर बैठ गयी।
'लेटी रहो, लेटी रहो बेगम ! नहीं-नहीं, उठना अच्छा नहीं ।'
'आज मत रोकिये मालिक ! कुछ क्षणों की मेहमान हूँ। चाहती हूँ कि एक बार फिर आपके साथ बैठकर आपको देख लूँ, इस किले के प्राकृतिक उपादानों को देख लूं जिनके कण-कण में हमारे प्यार की कहानियाँ छिपी हैं अन्तिम बार आपके साथ...।'
शाह के कन्धों पर हाथ रखे मुमताज बैठ गयी। शाह भी उसे दोनों हाथों से सहारा दे बैठकर उसके चेहरे के उतार-चढ़ाव देखने लगे ।
यमुना की उबलती लहरें अब शान्त हो रही थीं। शान्त तथा गम्भीर प्रवाह उनको साफ-साफ नजर आ रहा था। दूर यमुना के पार वाले उस झुरमुट का धुंधला-धुंधला प्रतिबिम्ब लहरों के दर्पण में स्पष्ट झलकता हुआ प्रवाह की गम्भीरता में खो गया था। सूर्य ढलकर कुछ और नीचे सरकआया था ।
कहा: शाह के चेहरे पर नजर उलझाये एक शीत निःश्वास छोड़ मुमताज ने
'सूर्य ढल रहा है, मालिक ।'
'हाँ बेगम !'
'और इस ढलते हुए सूर्य के साथ-साथ हजारों चिराग रोशन हो जायेंगे !'
'हाँ बेगम !'
'ये यमुना की लहरें इसी तरह शान्ति से प्रवाहित होती रहेंगी। क्यों शहंशाह ?'
'हाँ मलिका !'
'दुनिया के समस्त नियम कयामत तक चलते रहेंगे।'
'हाँ मुमताज !'
'यह किला, वह झुरमुट, सभी रहेंगे। सूर्य आज की तरह ही उदय और अस्त होगा। दिन ढलेगा, रात आयेगी, तारे चमकेंगे और चाँद मुस्कायेगा । भोर की उया अपनी अल्हड़ मुस्कानों से कुदरत का कण-कण रंग देगी। पक्षी नीड़ों में चहकेंगी, लहरें नाचेंगी, यमुना में ज्वार आयेगा। सारी दुनिया ज्यों की त्यों रहेगी, मगर मेरे मालिक, आपकी मुमताज न रहेगी सरताज ।'
'मुमताज !' शाहजहाँ चीख उठा ।
'सच कहती हूँ, मेरे बादशाह, मुमताज न रहेगी- रह जायेगी केवल उसकी कहानी, उसके मालिक के नाम के साथ उसका नाम केवल नाम ।'
'खुदा के लिए बस करो, मुमताज !'
कुछ क्षण मौन रह मुमताज अपलक यमुना के पार वाले उस झुरमुट को देखती रही। वह और भी धुंधला होता जा रहा था। एकाएक वह पुनः कह उठी :
'यमुना के पार वाला यह झुरमुट कितना सुन्दर है!'
'बहुत सुन्दर है, मुमताज !'
'ऐसा लगता है कि उस झुरमुट का अस्तित्व उठता जा रहा है- उसपर आकाश से शोले बरसने लगे हैं। वह देखिये, देखिये जहाँपनाह, उसका नामोनिशान तक मिट गया आपको वह झुरमुट बहुत प्यारा लगता था, आलीजाह हम रोज यहाँ बैठकर उसे देखा करते थे मगर आज वह भी न रहा उफ !'
'क्या कहती हो, मुमताज ! सभी कुछ तो मौजूद है।'
'नहीं मालिक ! ध्यान से देखिये, अब वहाँ एक ज्वाला-सी धधकने लगी है और उस भयानक ज्वाला में मेरी आत्मा के टुकड़े-टुकड़े होकर गिर रहे हैं. कोई जबरदस्ती मेरी आत्मा को नोचे लिये जा रहा है - वह देखिये कोई दैत्याकार काली-काली छाया अब उस झुरमुट के स्थान से निकल रही है उस काली छाया का सिर आसमान को छूने लगा। देखो-देखो ! जहाँपनाह वह काली छाया अपना विकराल मुँह बाये अब मेरी तरफ दाँत निकाले बढ़ी आ रही है देखिये, अब वह मुस्कराने लगी खिलखिलाने लगी और अब ? अब भयानक अट्टहास कर रही है और भागी आ रही है आपकी मुमताज की तरफ वह वह और त्रस्त-सी मुमताज चिपक गयी शाह के सीने से ।
'नहीं-नहीं। दुनिया की कोई शक्ति तुम्हें मुझसे नहीं छीन सकती ।'
'कोई छीने लिये जा रहा है आपकी बाजुओं के ये बन्धन ढीले होते जा रहे हैं बस, अब-अब मैं नहीं रुक सकती नहीं-नहीं मुझे छिपा लो, आलीजाह, छिपा लो, अपने प्यार की इन मजबूत भुजाओं में सूर्य डूब चुका है, उसकी अन्तिम छाया का आभास मात्र रह गया है- आसमान पर तारे चमकने लगे हैं...'
वह कुछ मौन हो गयी। शाह की आँखों में आँसू उतर आये थे। कंठ में कुछ शब्द अटके थे जो बार-बार प्रयास करने पर भी बाहर नहीं आ पा रहे थे कि तभी सामने वाले झुरमुट की ओर संकेत कर मुमताज पुनः कह उठी :
'बह देखिये- देखिये कितनी खुशी का स्थान पर एक महल-सा खड़ा हो रहा है। महल ! जन्तत का नूर समा रहा है उसमें यमुना की लहरों से खेलने लगा आह ! दृश्य है। सामने उस झुरमुट के आह ! कितना सुन्दर है वह वह देखिये उसका प्रतिबिम्ब हाँ, एक अर्ज है बाँदी की मेरेमालिक
'क्या ? कहो कहो मुमताज ! तुम्हारे लिए आसमान का चाँद उतार लाने की हिम्मत अभी इन बाजुओं में है। कहो मलिका !'
'मेरे मालिक, बाँदी की अन्तिम कामना, अर्ज या वसीयत कुछ भी समझें, यही है कि मेरे प्यार की ईदगाह यमुना के किनारे उसी झुरमुट के स्थान पर बने। मेरे प्यार की अजोड़ मंजिल उसी झुरमुट में समायी जा रही है, मेरी आत्मा वहीं खोई जा रही है.''
'ऐसा ही होगा मलिका, विश्वास रखो ।'
'विश्वास है मालिक विश्वास है! आह ! उफ ! साँसों की डोर वहाँ पहुँच रही है जहाँ से वापिस आना कठिन है। तेज हवा चलने लगी है, जैसे भयानक तूफान उठ रहा है और साँसों की डोर तूफान के थपेड़ों से टूटना ही चाहती है। आह! देखिये- मुझे कोई लिये जा रहा है। मैं जा रही हूँ मालिक अपने प्यार की तरह मेरी अन्तिम इल्तिजा का ध्यान रखना, मेरे देवता ! मेरे गुनाहों को बख्श देना मैं गुनाहगार हूँ। परवर दिगार मुमताज के ताज दरगाह में खुदा-हा-फि-ज, मुमताज के मालिक, या अल्लाह ब्दा-दुनिया के मालिक पनाह दो अपनी शाहजहाँ की गोदी में मुमताज का सर लुढ़क गया। और
बादशाह बच्चों की तरह बिलख उठा। महलों में कुहराम मच गया। मातम का नक्कारा बड़े ही करुण स्वरों में बजने लगा। पास वाली मोती मस्जिद के इमाम ने फातिहा पढ़ना शुरू कर दिया। बादशाह के साथ-साथ सारा किला और सारा आगरा रो उठा ।
दूर मन्दिरों के घंटे बड़ी ही करुण ध्वनि में बजने लगे। हजारों सिर झुककर मन्दिरों-मस्जिदों में प्रार्थना करने लगे, 'ईश्वर ! या खुदा ! हमारी मलिका को जन्नत बख्शना ! स्वर्ग देना ! या अल्लाह ! ईश्वर ! शान्ति ।'
दिन गुजर गये ।
उसी स्थान पर जहाँ मुमताज ने अपनी अन्तिम साँसों का बन्धन तोड़ा था, अक्सर शाहजहाँ दीवार से पीठ टिकाये संजीदा-रंजीदा खड़े रहते ।अपलक उस झुरमुट की ओर निहारती आँखों में रक्त-सा उतर आता था। वे अक्सर निनिमेष उस सामने वाले झुरमुट को निहारते रहते। वे आँखें जाने उस स्थान पर क्या देख कभी-कभी एक फीकी मुस्कान छोड़ देतीं !
नीचे मन्थर गति से बह रही थी तीव्र सलिला यमुना, कि जिसकी लहरों से टकरा शाहजहाँ की आँखें जाने क्या देखकर कभी-कभी चमक उठतीं।
और एक दिन शाह के नयनों में बसी कल्पना और कारीगरी की कुशलता ने ताजमहल को जन्म दिया।
प्रकृति के सभी नियम स्थिर रहे। समय का चक्कर चलता रहा। धीरे-धीरे दुनिया मुमताज को भूल तो गयी, लेकिन शाहजहाँ के दिल में उसकी प्रणय स्मृतियाँ एक फफोला बनकर पलती रहीं, जलती रहीं।
पारस्परिक राजनीतिक संघर्षों के कारण औरंगजेब ने शाहजहाँ को बन्दी बना लिया। कैद में भी बूढ़े शाहजहाँ के दिल में मुमताज की याद ताजी रही। औरंगजेब से कहकर वह कैदी की हालत में भी वहीं रहने लगा जहाँ मुमताज की मृत्यु हुई थी और जहाँ दिन-रात दीवार के सहारे खड़े रह उसने कल्पना के ताज के अपनी आँखों में प्रथम दर्शन किये थे। कैदी शाहजहाँ वहीं खड़ा आठों याम अपनी प्रेयसी की चिर समाधि ताज को देखता रहता और मौन सिसकती आँखों से मानो अपना आर्तनाद चिर प्रसुप्त प्रेयसी के कानों में पहुँचाता रहता कि देखा, अपने प्रेमी का हाल ! देखी अपनी औलाद की कारगुजारी !
उसकी आँखों में रक्त उत्तर आया था।
आगे का लालकिला देखने वाले देखते हैं कि जहाँ मुमताज की मृत्यु के बाद शाहजहाँ की बन्दी दशा में मृत्यु हुई थी, वहाँ उस दीवार में पैसे जितना छोटा शीशा लगा है कि जिसमें ध्यान से देखने पर सामने यमुना के किनारे ऊँचा सिर उठाये ताजमहल, यमुना की लहरें, सभी कुछ नजर आता है।उस शीशे को छूते हुए जब मैंने अपने पथ-प्रदर्शक से कहा कि यह तो लाल शीशा है, तो वह मेरी बात काटकर बोला :
'यह लाल शीशा नहीं सरकार, बल्कि उस आशिक की आँख है, जिसमें माशूका की याद में रो-रोकर खून उतर आया है और आज भी वह अपनी महबूबा के मकबरे को अपने अन्तर में छिपाये ज्यों की त्यों सिसकती-सी खड़ी है।'
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