ठहरना जरूरी है प्रेम में: स्त्री जीवन का इतिवृत
(अमनदीप गुजराल 'विम्मी' की पुस्तक की समीक्षा)
अनामिका प्रिया
रामगढ़ कॉलेज, रामगढ़
श्री विमर्श की बात होती है तो छप नारीबाद जैसा शब्द भी चर्चा में चला आता है। दरअसल कई बार स्त्री-विमर्श श्री जीवन के असली सवालों से इतर बेतुके कुतकों और अनर्गल प्रलापों में उलझ जाया करती है। देखें तो सामाजिक या सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का यह समय कई साझी चुनौतियां के बीच है। यौनिकता या देह के सवाल भी इतने छल-छों से घिरे हैं कि कोई ओर-छोर नजर नहीं आता। सच तो यह है कि कभी नारीबादी होना और कभी उस नारीबाद को छद्य बताते हुए बिरोध जताना, यह दोनों आज फैशन में है। ऐसे में अमनदीप गुजरात 'विम्मी' की कविताएं अपनी बेशक बहुत ठोस और प्रमाणिक अनुभवों से बनी है।
अमनदीप जी की एक कविता पंक्तियों से गुजरते हुए झारखंड की कवि शैल प्रिया की कविता याद आ जाती है। शैल प्रिया ने लिखा है 'कविता से दिवास्वप्न और दिवास्वप्न से कविता तक फैला है मेरा विस्तार। अमनदीप गुजराल 'विम्मी' की पुस्तक 'ठहरना जरूनी है प्रेम में' को पढ़ते हुए। कवयित्री जिस ठहराव का स्वप्न देखती है, या जिसकी आंकाक्षी हैं, दरअसल बह ठहराव एक लम्बी जीवन यात्रा में एक बहाव भी है। ठहरना भी एक बड़े बहाव का हिस्सा है। इस किताब को पढ़ते हुए, प्रारंभमें लिखी गई अवधेश प्रीत की खी लेखन पर की गई मायनेखेज टिप्पणी पर बरबस ध्यान आता है। 'इनके लेखन में पांडित्य मत ढूंढिए, शास्त्रीयता मत तलाशिए। तलाशना है तो उनके मन और मर्म की परतों में न्यस्त उसके होने को तलाशिए।' बस्तुतः खी लेखन के साथ-साथ दलित लेखन भी ऐसी ही दृष्टि की मांग करता है। यह दृष्टि उदार होने से ज्यादा जेनविन या कहें न्यायोचित है।
खी लेखन यों भी बड़ी कठिनाई से आगे बढ़ता है। घर-परिवार की जवाबदेही के बीच अपने लेखन के लिए स्पेस निकालना वाकई आसान नहीं है। शायद यही बजह रही हो कि अमनदीप गुजराल जी का लिखने का क्रम आठवीं कक्षा से शुरू हुआ, पर उनका पहला काव्य संकलन आने में काफी वक्त लगा। जीबन में हाशिए पर चली गई आवाज को बचा लेने की साध बेशक एक गहरी जिजीविषा, जीवन से एक गहरे प्रेम से ही निःसृत है। 'आह से निकला होगा गान' से 'उमड़कर आंखों में चुपचाप बही होगी कविता अनजान' पंत की ये दर्ज पंक्तियां कई बार पास खड़ी दिखती है। '
ठहहना जरूरी है प्रेम में' के संदर्भ में देखें तो स्त्री की कही अनकही पीड़ा बिना शोरगुल के अपनी ठौर निर्मित करती है निर्मल मुस्कान लिए बुदबुदाई नदी / तुम भी न... स्त्रियों का शुक्रिया कौन अदा करता है? यह प्रश्न्न वाकई अब तक अनुत्तरित है। स्त्रियां समाज की वो इकाई है जिनकी भूमिकाएं पहले से तय हैं। वैसी कामगार जो मन और शरीर से प्रशिक्षित की जाती रही है भावी जीवन के लिए। अतिशयोक्ति पूर्ण लग सकती है पर स्त्री विमर्श के किसी भी चर्चा में यह दो पंक्तियां बहुत बजनी साबित होंगी।
विम्मी जी की आत्मविश्वास से भरी अभिव्यक्ति आह्वान भी देती है 'यह चहचहाती, फुदकती । कितनी प्यारी लगती हो ।। तुम आसमान में ही बनाना आशियाना अपना / पंखों को देना मजबूती और नाप लेना सारा आकाश.../ कुछ दानों का लालथ /तुम्हारी स्वतंत्रता में सेंध है। पता है तुम्हें/ जिसमें लगभग इक्यावन कविताएं शामिल सिर्फ दूसरी तरफ ही हरी है धरती।' इस हरी भरी धरती की आकांक्षा नई भले न हो, पर इस संग्रह में जिन रूपकों को बिम्मी जी ने गढ़ा है, वे बेशक ताजातरीन हैं, 'ठहरना जरूरी है प्रेम में' सौ पृष्ठों की पुस्तक है, है। प्रारंभ में अवधेश प्रीत, दीपक मिश्र, कुमार बिजय गुप्त, और इंदु बाला शंकर की टिप्पणियां हैं, जो कविताओं को समझने में एक बेहतर दृष्टि देती हैं। बरिष्ठ साहित्यकार अवधेश प्रीत की टिप्पणी स्त्री लेखन और समझने की दिशा में एक जरूरी संकेत देती हैं। मेरा मानना है कि जिन प्रश्नों के उत्तर जब नहीं मिलते उनका जिंदा रहना जरूरी है।
स्त्री मुक्ति और उसकी समानता से जुड़े प्रश्न अब तक अनुत्तरित हैं, इसलिए इन आवाजों को, इन पुकारों को, आह्वान और उद्बोधनों को रचते रहना चाहिए। अमनदीप गुजराल 'विम्मी' कि यह कविताएं उन प्रश्नों में अपना स्वर जोड़ने की कोशिश करती है। 'अपने हृदय से तुम्हारे हृदय तब / मुझे भी करनी है एक यात्रा निर्विघ्न /नदी से बोड़ी आद्रता / पवन से कुछ मुलायमियत और पारदर्शिता लिए आ रही हूं मैं... कि तुम भी पोंछ लेना गर्द, मिटा देना खरोंचें, खत्म कर देना सिलवटें.../
प्रेम को महसूस करने के लिए रुकना पल दो पल / कि ठहरना बहुत जरूरी है प्रेम में...। इन कविताओं में स्त्री मन में उमड़ती तमाम मांगें बड़ी सहज स्वाभाविक और सच्ची लगती है। पर उनकी प्राप्ति इतनी दुर्लभ क्यों है? जैसे कई सवाल लगातार उठते हैं!
क्या तुम मेरे सखा बनोगे ? कविता मानवीय चरित्र के दोहरेपन और नेकनियत की वास्तविक तस्वीर नजर आती है। मां की याद की कई छवियां इस संग्रह की कविताओं में आकार पाती हैं। शब्द, सपने और आंसू पढ़ने वाली मां कपड़े, स्वेटर, रिश्तों सबको खूबसूरती देना जानती थी। जादूगर थी मां ! जो पुरानी पड़ती है हर चीज को / नया कर देती थी। जीवन में नयेपन का इंतजार करते मन के लिए अतीत एक शरण स्थली भी बनता दिखता है।
आज की कविता की अभिव्यक्ति में गद्य तत्व ज्यादा प्रभावी है। इस निकर्ष पर इस संग्रह की कविताओं को देखें तो यथार्थ की सपाट बयानी तो है, पर यथार्थ और संवेदना के अंतरंग जुड़ाव से एक अलग वितान तैयार होता है। ठहरना जरूरी है प्रेम में 'शीर्षक में भी गद्यात्मकता के साथ एक दर्शनात्मक लय भी है।' कहें तो ठोस यथार्थ और तरल संवेदनाओं का मेल इस संग्रह को पठनीय बनाते हैं। वास्तव में कविता की ताकत अभिव्यक्ति के स्थूल स्वरूप में नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति के कई सूक्ष्म अवगुंठन से आकर पाती हैं। इस संग्रह की कविताएं प्रश्नों का एक वृत्त तैयार करती हैं कि स्त्रियों का शुक्रिया कौन अदा करता है! एक यही मार्मिक पंक्ति हमारी पूरी सामाजिक-मानसिक व्यवस्था का इतिवृत प्रस्तुत करने का पर्याप्त है। स्त्री जीवन की अनेकानेक भाव तरंगों से यह काव्य संग्रह के साथ कवि अमनदीप गुजराल विम्मी हमारे मन में उतर जाती है।
It Is Necessary to Pause in Love: The Story of Women’s Lives, Love, and Struggles
It Is Necessary to Pause in Love: A Chronicle of Women’s Lives and Emotions
It Is Necessary to Pause in Love: Women’s Life, Identity, Love, and Struggle
It Is Necessary to Pause in Love: The Untold Story of Women’s Lives and Struggles
It Is Necessary to Pause in Love: Exploring Women’s Lives, Love, and Social Realities


No comments
If you any doubts, please let me know.