Netaji Subhash Chandra Bose, the immortal freedom fighter of India. - New hindi english imp facts & best moral Quotes 2020

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Shubhash chandra bose in hindi

Netaji Subhash Chandra Bose, the immortal freedom fighter of India.
मातृभूमि की वन्दना में अनेकों ने अपनी - अपनी स्वर साधनाएँ प्रस्तुत की , परन्तु सबसे ऊँचा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस स्वर ऊध्वरेता ब्रह्मचारी सुभाष का था । वह स्वर सर्वोच्च होने के साथ- साथ सबसे भिन्न भी था । उस समय की स्थिति ऐसी थी कि सुभाष के स्वर में शंखनाद था , सिंह गर्जना थी , बैरियों की छाती घड़कने लगौं , मातृ - भूमि अपने वरद्पुत्र की साधना पर मुस्कुरा उठी । जनता ने जय - जयकार किया , कवियों ने प्रशंसा में गीत लिखे , आजाद हिन्द फौज सम्पादकों ने लेखनी सफल को , बस फिर क्या था साधक अब बहुत आगे था , यही एक ऐसा साधक था , जिसने गाँधी जी जैसे कूटनीतिज्ञ व्यक्ति से एक बार नहीं अनेकों बार भारतवर्ष के सार्वजनिक क्षेत्र में टक्कर ली ।
  • सुभाष बाबू का जन्म उड़ीसा राज्य के कटक शहर में 20 जनवरी , सन् 1897 में हुआ था । इनके पिता रायबहादुर जानकी नाथ बोस कटक म्युनिसीपैलिटी तथा जिला बोर्ड के प्रधान थेतथा नगर के गणमान्य वकीलों में से थे । 

सुभाष की प्रारम्भिक शिक्षा एक यूरोपियन स्कूल में हुई । मैट्रिक की परीक्षा में सुभाष ने कोलकाता यूनीवर्सिटी में द्वितीय स्थान प्राप्त किया । इसके बाद इन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया । वहाँ एक ओटेन नामक अंग्रेज प्रोफेसर था जो सदैव भारतीयों के प्रति निन्दाजनक शब्द कहा करता था , स्वाभिमानी सुभाष के लिये यह असहनीय था । उन्होंने कक्षा में ही एक दिन उसे एक जोरदार चाँटा जड़ दिया । उस दिन से ही उसने भारतीयों को निन्दा करनी तो बन्द कर दी , परन्तु सुभाष को कॉलिज से निकाल दिया गया । इसके पश्चात् वे स्कॉटिश चर्च कॉलिज में प्रविष्ट हुये और कोलकाता विश्वविद्यालय से बी ० ए ० ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की ।

सन् 1919 में वे भारतीय सिविल सर्विस की परीक्षा पास करने के लिये इंग्लैण्ड गये । छ : महीने के कठोर परिश्रम से उस परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त करके उत्तीर्ण हो गये । आई ० सी ० एस ० को परीक्षा पास करके वे भारत लौट आये किन्तु नौकरशाही की शोषक मशीन का पुर्जा बनने से स्पष्ट इंकार कर दिया ।

सुभाष बाबू के जीवन पर देशबन्धु चितरंजन दास के त्याग और तपस्या का बड़ा गहन प्रभाव पड़ा । वे उनके कार्यों में सहयोग देने लगे । उनके द्वारा निकाले गये “ अग्रगामी पत्र का सम्पादन भार इन्होंने अपने ऊपर ले लिया । सन् 1921 में इन्होंने स्वयं सेवकों का संगठन- कार्य प्रारम्भ किया ।



फलस्वरूप अंग्रेज गवर्नमेण्ट ने इन्हें दिसम्बर महीने में गिरफ्तार कर लिया । प्रिंस ऑफ वेल्स जब भारत आये , समस्त भारत में उनका बॉयकॉट किया गया , सुभाष ने बंगाल में इस आयोजन का नेतृत्व किया । देशबन्धु द्वारा आयोजित स्वराज्य पार्टी में इन्होंने तन , मन , धन से पूर्ण सहयोग दिया । इस भयानक आतंक से डर कर  25 अक्टूबर को इन्हें बर्मा की माँडले जेल भेज दया गया , परन्तु स्वास्थ्य खराब हो जाने के कारण 14 मई , 1926 को इन्हें मुक्त कर दिया । उस मय तक देशबन्धु की मृत्यु हो चुकी थी । कारावास से मुक्त होने के पश्चात् चेन्नई कांग्रेस धिवेशन के अध्यक्ष डॉ . अंसारी ने इन्हें राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रधानमन्त्री नियुक्त किया । सुभाष बाबू भारतीय नेताओं की औपनिवेशिक स्वराज्य की माँग से सहमत नहीं थे , वे पूर्ण वातन्त्र्य के पक्षपाती थे , आगामी वर्ष के कांग्रेस के अधिवेशन में यही प्रस्ताव सर्वसम्मति से जीकार कर लिया गया । गाँधी जी से विरोध होने पर भी , ये उनके द्वारा संचालित आन्दोलनों में हर्ष भाग लेते रहे । 1930 में कानून भंग के अपराध से इन्हें पुनः जेल भेज दिया गया । जेल आपका स्वास्थ्य खराब हो गया , अंग्रेजी सरकार से अपने स्वास्थ्य लाभ के लिये विदेश जाने अनुमति माँगी , सरकार ने आज्ञा दे दी । आप यूरोप चले गये । विदेश में चार वर्ष रहकर आपने 7 के बाहर का वातावरण भारतीयों के अनुकूल बना लिया । विदेश से लौटने पर ये हरीपुरा बेस अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित किये गये । इस अधिवेशन में आपने अपने ओजस्वी । अगले वर्ष अर्थात् 1939 ई.में ये गाँधी जी

जी के कहने से न माने तो , उन्होंने अपने प्रिय भक्त डॉ ० पट्टाभि सीतारमैया को विरोधी उम्मीदवार के रूप में खड़ा कर दिया । अखिल भारतीय चुनाव हुआ , सुभाष 203 वोटों से विजयी हुये , सीतारमैया की करारी हार हुई । गाँधी जी ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार मानी । सुभाष बालू ने त्रिपुरा कांग्रेस अधिवेशन का सभापतित्व किया । गांधी जी ने कांग्रेस छोड़ देने की धमकी दी । सुभाष बाबू यह नहीं चाहते थे , इसलिये कुछ दिनों के बाद स्वयं उन्होंने ही इस पद से त्याग - पत्र दे दिया और स्वयं अपने अमगामी दल ( Forward Block ) का अलग निर्माण कर लिया ।

कुछ समय पश्चात् भारत रक्षा कानून के अन्तर्गत इन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया । सुभाष ने आमरण अनशन की घोषणा कर दी , इसलिये सरकार ने इन्हें जेल से मुक्त करके घर पर ही नजरबन्द कर दिया , परन्तु सख्त देखभाल यहाँ पर भी रही । नजरबन्दी के समय में आपने समाधिस्थ होने की घोषणा कर दी । एक दिन द्वारपालों को , अधिकारियों को और अग्रेजी सरकार को अपनी अद्भुत दैवी शक्ति से पागल बना दिया । सबकी आँखों में धूल ओंकते हुये आधी रात के समय मौलवी के वेश में घर से बाहर निकल गये ।

ये कोलकाता से पेशावर गये , वहाँ उत्तम चन्द्र की सहायता प्राप्त करके एक गूंगे मुसलमान के रूप में काबुल होते हुए जर्मनी पहुंचे । यहाँ इन्होंने " आजाद हिन्द फौज " की नीव डाली । जापान की सहायता से सुभाष ने ब्रह्मा तथा मलाया से अंग्रेजों को मार भगाया । अपने देश की स्वतन्त्रता के लिये सैंकड़ों नवयुवकों ने खून से हस्ताक्षर करके सुभाष को दे दिये । नेताजी सुभाष ने अपने सैनिकों से कहा था , " तुम मुझो अपना खून दो , मैं तुम्हें आजादी दूंगा । " विश्व के 19 राष्ट्रों ने आजाद हिन्द फौज को मान्यता प्रदान कर दी थी । ' जयहिन्द ' और ' दिल्ली चलो ' के नारों से इम्फाल और अराकान की पहाड़ियाँ गूंज उठीं । 5 जुलाई , 1943 ई. को सुभाष ने इस सेना का नेतृत्व सम्भाला । 1945 में सुभाष ने अपनी भारत माता की परतन्त्रता की बेड़ियों को काटने के लिये दूसरा भयानक आक्रमण किया । परन्तु जर्मनी की हार के साथ आजाद हिन्द फौज का भाग्य ही बदल गया । सैनिक गिरफ्तार कर लिये गये । वायुयान द्वारा
जापान जा रहे थे, रास्ते में जहाज में आग लग गई

इस प्रकार सुभाष 19अगस्त , 1945 ई. को संसार छोड़कर चल बसे , ऐसा कहा जाता है । परन्तु अधिकांश लोग इस जनश्रुति पर अभी विश्वास नहीं करते क्योंकि नेता जी के परिवार वाले अब भी उनकी जन्मतिथि अर्थात् वर्षगाँठ मनाते हैं । क्रान्ति दूत सुभाष भयंकर ज्वालामुखी के समान थे । वे जीवनपर्यन्त ब्रिटिश साम्राज्य की आँखों में खटकते रहे । यदि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद वे हमारे बीच होते तो निश्चय ही जनता उनका हृदय से स्वागत और आदर करती । परन्तु भारतीयों का दुर्भाग्य है कि वे लौटकर न आये और आये भी होंगे , तो किसी को पता नहीं चला । वे सिंह थे । उनकी गर्जना शत्रुओं के हृदय को शतशः विदीर्ण कर देती थीं । आज भी भारतवासियों के हृदय - पटल पर उनकी भव्यमूर्ति ज्यों की त्यों अंकित है । नेता जी स्वयं में महान् थे और उनका त्याग और बलिदान और भी महान् था । भारतवर्ष की भावी संतति के लिये वे सदैव प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे । उनके आदर्शों पर चलकर जनता देश के कल्याण के लिये कटिबद्ध रहेगी ।

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