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स्वतंत्रता सेनानी "ग्राण्ड ओल्ड लेडी" अरुणा आसफ अली

अरमा मजहर
https://www.mekohindienglish.com/2026/06/why-is-aruna-asaf-ali-called-grand-old.html






शोधार्थी, राँची विश्वविद्यालय, राँची Email: abdurrahman7913@gmail.com

सैकड़ों वर्षों से गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ भारत सन् 1947 में आजाद हुआ था। यह आजादी लाखों लोगों के त्याग और बलिदान के कारण संभव हो पायी। इन महान लोगों ने अपना तन-मन-धन त्याग कर दे की आजादी के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। स्वतंत्र भारत का हरेक व्यक्ति आज इन वीरों और महापुरुषों का आऋणी है जिन्होंने अपना सबकुछ छोड़ संपूर्ण जीवन दे की आजादी के लिए समर्पित कर दिया। भारत माता के ये महान सपूत आज हम सब के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हैं। इनकी जीवन गाथा हम सभी को इनके संघर्षों की बार-बार याद दिलाती है। स्वतंत्रता सेनानी के रुप में अनगिनत महापुरुषों के साथ-साथ असंख्य महिलाएं भी शामिल हैं जिन्होंने कठोर और दमनकारी अंग्रेजी हुकूमत से लड़कर देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।'

इन्हीं क्रांतिकारियों में से कुछ ऐसे भी क्रांतिकारी हुए जो अपने जीवन साथी के साथ दे के लिए कुर्बान हो गए। ऐसे महान दंपति जोड़े का नाम अरूणा आसफ अली है। जिन्होंने एकसाथ आजादी की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। अरुणा आसफ अली, यह दो लोगों का नाम है। लेकिन आज भी हम इस नाम को किसी एक व्यक्ति के नाम की तरह जानते हैं। दरअसल अरुणा और आसफ अली ने न सिर्फ अलग-अलग धर्म के होने के बावजूद प्यार किया और साथ रहने का साहस दिखाया बल्कि देश की आजादी में खुद को झोंक दिया। अगस्त क्रांति के सूत्रधारों में अरुणा आसफ अली का नाम प्रमुख है। भारत की स्वाधीनता संग्राम की 'ग्रांड ओल्ड लेडी' और 'भारत छोड़ों आंदोलन के समय ग्वालियर टैंक मैदान में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का झंडा फहराने वाली अरुणा आसफ अली का जन्म 16 जुलाई, 1909 को बंगाल के एक सम्मानित ब्राह्मण परिवार में तात्कालिन (पाकिस्तान) पंजाब के "कालका" नामक स्थान में हुआ था। उनके बचपन का नाम अरुणा गांगुली था. उनके पिता डॉ० उपेन्द्र नाथ गांगुली नैनीताल में एक रेस्टुरेंट के मालिक थे। उनकी माता अम्बालिका देवी त्रिलोक नाथ सन्याल की बेटी थी परंतु उन्हें अपने पिता का संरक्षण बहुत अधिक दिन तक नहीं मिल सका, इनके बचपन में ही पिता का देहान्त हो गया। इनकी माता ने अंत में साहस जुटाकर इनकी शिक्षा का बहुत अच्छा प्रबंध करने का प्रयत्न किया। उपेन्द्र नाथ के छोटे भाई धीरेन्द्र नाथ फिल्म डायरेक्टर थे। उनके एक और भाई नागेन्द्र नाथ एक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे, जिन्होंने नोवेल प्राईज विजेता रविन्द्रनाथ टैगोर की बेटी मीरा देवी से विवाह किया था। अरूणा की बड़ी बहन भारत के कॉन्स्टीट्यूएंट एसेम्बली की सदस्य थी।

अरूणा आसफ अली कीक्षा लाहौर के सेक्रेट हर्ट में हुई थी। उसके बाद नैनीताल के प्रोटेस्टेन्ट स्कूल से अपनी शिक्षा प्राप्त की। अरुणा जी बहुत ही कुशाग्र बुद्धि की थी और बाल्यकाल से ही कक्षा में सर्वोच्च स्थान पाती थी। नैनीताल उस समय भी अभी की तरह ग्रीष्म ऋतु में आकर्षण का केन्द्र रहता था। उन दिनों दे के बड़े-बड़े नेता गर्मियों के दिनों में कुछ समय विश्राम के लिए नैनीताल आया करते थे। वहीं उनका संपर्क नेहरु परिवार से हुआ, जवाहर लाल नेहरु के संपर्क में आने के कारण इनमें स्वदे। प्रेम की भावनाएं प्रबल हो उठी और धीरे-धीरे इन पर राष्ट्रीयता का रंग चढ़ने लगा। नैनीताल से स्नातक करने के बाद कलकत्ता लौट आयीं। यहां उन्होंने गोखले मेमोरियल कॉलेज में पढ़ाना शुरु किया। उनकी इच्छा विदे। जाकर और अधिक उच्चशिक्षा प्राप्त करने की थी परंतु उन्हीं दिनों वे इलाहाबाद अपनी बड़ी बहन, जिनका विवाह बनर्जी परिवार में हुआ था, से मिलने आयी। यहां उनकी मुलाकात दिल्ली के एक प्रसिद्ध वकील आसफ अली से हुई। आसफ अली एक कांग्रेसी नेता थे जो
राष्ट्रवादी विचारधारा में वि वास करते थे और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा भी थे। उनके व्यक्तित्व का अरुणा पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस बीच जयप्रका। नारायण, राममनोहर लोहिया, अच्यूत पटवर्धन और उन जैसे अन्य समाजवादी नेताओं के साथ उनका परिचय हुआ। इस मेल-मुलाकात से अरुणा के समाजवादी विचार को और ज्यादा मजबूती मिली। आसफ अली से यह परिचय धीरे-धीरे घनिष्ठता में बदल गया। इसके बाद दोनों को परिवार और

समाज की नाराजगी भी झेलनी पड़ी मगर इसके बावजूद दोनों हमे ।। साथ ही रहे। कांग्रेसी नेताओं ने इस कदम की सराहना की। परिवार की नाराजगी का कारण था कि आसफ अली दूसरे धर्म के थे और उम्र में भी अरुणा से काफी बड़े थे। अरुणा जी के जीवन में स्वतंत्रता और क्रांति प्रवृत्तियां प्रबल थी. यही कारण था कि उन्होंने सभी प्रकार की रुढ़ियों की चिन्ता न करते हुए 1928 में आसफ अली से विवाह कर लिया। इलाहाबाद उन दिनों नेहरु परिवार के रहने का स्थान होने के कारण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख गढ़ भी था। समय-समय पर वहां देश के सभी भागों से नेता आते रहते थे। इसी कारण यहां दिल्ली के आसफ अली से भी परिचय हुआ था और विवाह के बाद उनका कार्यक्षेत्र भी दिल्ली हो गया। आसफ अली चूंकि स्वयं कांग्रेस के स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित थे इसलिए अरुणा जी को भी राजनीतिक कार्यों में रुचि बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उन्होंने राजनीतिक कार्यों में गहरी रुचि लेना आरंभकिया। परिणामस्वरुप 1930 में महात्मा गांधी द्वारा सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने के कारण एक वर्ष की सजा सुनायी गई। 1930 में नमक सत्याग्रह के समय ही वे राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम की अग्रणी नेता के रुप में सामने आ गई थी। अरुणा आसफ अली का पहला बड़ा राजनीतिक लगाव नमक सत्याग्रह के दौरान दिखायी पड़ा जिसमें उन्होंने न केवल जनसभाओं को संबोधित किया बल्कि नमक बनाने के साथ-साथ प्रद निों का भी नेतृत्व किया। अरुणा आसफ अली पर राजद्रोह के बजाय लावारिस इधर-उधर घूमने के आरोप में मुकदमा चलाया गया। इन गतिविधियों को देखकर अंग्रेज सरकार द्वारा उन्हें चेतावनी दी गयी और अच्छे व्यवहार का लिखित आश्वासन तथा बॉण्ड भरने को कहा गया। उन्होंने अस्वीकार कर दिया परिणामस्वरुप एक वर्ष का कारावास मिला। कुछ माह पश्चात् गांधी-इरविन समझौता के फलस्वरूप अधिसंख्य राजनैतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया। परन्तु चूँकि अरूणा जी राजनैतिक कैदी नहीं थी इसलिए उसे जेल से रिहा नहीं किया गया। लाहौर जेल में महिला सह कैदियों ने उनके बगैर अपनी रिहाई ठुकरा दी। गाँधी जी ने भी हस्तक्षेप किया तो उनके पक्ष में व्यापक जनमत के समक्ष नतमस्तक होना पड़ा और अरूणा आसफ अली को रिहा कर दिया गया।

दो वर्ष बाद 1932 में सत्याग्रह करने पर उन्हें फिर कारावास मिला। 200 रूपये जुर्माना और 6 महीने की सजा घोषित हुई। जुर्माना न अदा करने पर पुलिस उनकी किमती साड़िया ले गयी। दिल्ली के जेल में कैदियों के दुर्व्यवहार को देख अरुणा जी ने जेल में हड़ताल कर दी। जिनके कारण उन्हें अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्हें अम्बाला जेल भेज दिया गया। जेल से आकर उन्हें स्वास्थ्य सुधार के लिए एक घर में रहना पड़ा। यह एक वर्ष उन्होंने दे के उन हालातों में आजादी पाने के उपायों के चिन्तन करने और अध्ययन में बिताया। अपनी रिहाई के प चात् वे राष्ट्रवादी आंदोलन से 10 वर्षों के लिए अलग हो गई। सन् 1942 में वे अपनी पति के साथ बम्बई में कांग्रेस अधिवेान में पहुँची और 8 अगस्त को कांग्रेस द्वारा 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित होने के अवसर पर मौजूद रहीं। प्रस्ताव पास होने के दूसरे ही दिन अधिकतर कांग्रेसी नेता गिरफ्तार कर विभिन्न जेलों में बंद कर दिये गये। तो ऐसे अवसर पर अरूणा जी जैसी दे। प्रेम से ओतप्रोत महिला कैसे पीछे रह सकती थी। उन्होंने इस आंदोलन में खुलकर भाग लेने का नि चय किया। अनेक कठिनाइयों के बावजूद अरूणा आसफ अली ने बम्बई के ग्वालियर टैंक के एक ऐसे खुले मैदान में तिरंगा फहराया जहां अपार जनसमूह एकत्रित था। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पहले लाठी चार्ज किया बाद में आंसू गैस छोड़ी गयी। परंतु जब इतने पर भी भीड़ तितर-बितर नहीं हुई तो गोली चलायी गयी, इसमें अनेक लोग घायल हुए। इस घटना का परिणाम यह हुआ कि अरुणा जी के हृदय में क्रांति की ज्याला भड़क उठी।" एकत्रित विशाल जनसमूह के मध्य झंडारोहन समारोह सभा की अध्यक्षता की। उन्होंने कठिनाईयों के बावजूद ग्वालियर टैंक मैदान में तिरंगा फहरा कर अपने बहादुरी का परिचय दिया और अंग्रेजों को खुला चैलेंज दे दिया।

आपका यह भाषण ऐतिहासिक माना जाता है। भाषण के तुरंत बाद यह भूमिगत हो गई। पुलिस लाख प्रयत्न करने पर भी आपको न पा सकी। सरकार ने उन्हें फरार घोषित कर उनकी गिरफ्तारी के लिए 5000 रुपया का ईनाम रखा। 26 सितम्बर 1942 को सरकार ने उनकी दिल्ली की संपत्ति को जब्त कर ली। उनकी गिरफ्तारी का हुकुमनामा 9 अगस्त 1942 से 26 फरवरी 1946 तक जारी रहा। उन्हें नोटिस मिला कि वे एक महीना के भीतर आत्मसमर्पण कर दे, तो उसकी संपत्ति लौटा दी जायेगी। उनकी कार और मकान नीलाम कर दिये गये। वे राम मनोहर लोहिया के साथ कांग्रेस के मासिक पत्र 'इंकलाब' की संपादक बनी। अखबार के 1944 के अंत में उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को सलाह दी कि ये बुद्धिजीवियों द्वारा चलायी जा रही हिंसा या अहिंसा की तार्किक बहस के चक्कर में न पड़े क्योंकि बहस से मौजूदा कड़ी सच्चाई से ध्यान हटेगा। मैं चाहती हूं कि देश का प्रत्येक छात्र तथा नौजवान खुद को आने वाली क्रांति का सिपाही समझे। उनकी अपीलों से प्रभावित होकर लोगों ने सरकारी नौकरियां छोड़ दी, अनेक नौकरी में रहते हुए आंदोलनकारियों की हर प्रकार से सहायता करते रहे। संपूर्ण आंदोलन जयप्रकाश नारायण, डॉ० राममनोहर लोहिया, अच्यूत पटवर्धन और अरुणा आसफ अली द्वारा पूरी व्यवस्था के साथ चलता रहा। सैंकड़ों बार अरुणा जी वेश बदल-बदलकर "प्रगट" होती रही और पुलिस को चकमा देती रही। कभी लखनऊ के "मे फेयर" सिनेमा हाउस से स्कर्ट ब्लाउज पहने बिल्कुल एंग्लो-इंडियन महिला के रुप में चपला की भांति चमक जाती थी तो कभी मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलेरी में ढीला कुर्ता और पतलून पहने एक बड़ा कैनवेस बगल में दबाये दिख जाती थीं। कभी दिल्ली के मटिया महल में किसी नानबाई के दुकान से मैले कुचैले बुर्के में छिपे रोटी और सालन खाती नजर आती थी तो कभी अमृतसर के हरमंदर साहब के प्रमुख द्वार से सलवार-कुर्ता पहने और दुपट्टा सर पर डाले बाहर निकलकर केसर दा ढाबे की ओर लपकती हुई दिखायी देती थी। महाराष्ट्र में वह एक परिवार के सबसे बड़े बेटे की विधवा बहु बनकर नागपुर के महारानी लक्ष्मीबाई बाजार में सुबह-सुबह झाडू लगाती थी तो कभी लाहौर के अनारकली बाजार में गोलगप्पे का आनंद लेती नजर आती थी और इसी प्रकार वह पूरे आंदोलन की दि-निर्दे देती रही। आंदोलनकारियों से संपर्क करती थी तथा उनके परिवारों को सूचनाएं (आर्थिक) सहायता पहुंचाती थी। जरुरत पड़ने पर हथियारों को भी पहुंचाने का प्रबंध करती थी।"

पुलिस से लुका-छिपी में उन्हें बहुत तकलीफ उठानी पड़ी। भूमिगत अनियमित जीवन बिताने के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ता गया। परंतु इस अवधि में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाली अन्य नेताओं से भी मिलने का अवसर मिला। उन्होंने अपना यह भूमिगत जीवन बहुत ही बहादुरी से बिताया। प्रातःकाल वे एक स्थान पर होती तो दोपहर तक किसी दूसरे नाम और विभिन्न भेष में किसी और स्थान पर पहुंची होती।" वे वेश बदलने में चतुर थी। डॉ० सु गीला नैयर के अनुसार, जब वे आधुनिकता के छदम् वेश में गांधी जी से मिलने आयी तो मैं स्वयं उन्हें नहीं पहचान सकी। इस प्रकार वे भारत के विभिन्न प्रदे में घुम-घुमकर स्वतंत्रता आंदोलन की ज्योति की म गाल को जीवित रख सकी। इस प्रकार उन्होंने जितने कष्ट सहे न तो उनका संपूर्ण विवरण प्राप्त है और न अरुणा जी ने कभी उन्हें स्वयं प्रकट करने का प्रयत्न किया। इस समय की दुखद घटना यह है कि उनकी माता का देहांत हो गया। मां-बेटी में अत्यंत घनिष्ठ संबंध था परंतु इसके बावजूद अरुणा जी भारतमाता की सेवा में लगी रही।

ब्रिटि । सरकार के गुप्तचर विभाग की पकड़ से बचने के लिए वे किसी भी एक स्थान पर कुछ घंटों के लिए भी टिक नहीं सकती थी, इसलिए उनका स्वास्थ्य किसी भी प्रकार की उचित व्यवस्था न होने के कारण दिन-प्रतिदिन बिगड़ता गया और वे बहुत कमजोर हो गयीं। सारे भारत में उस समय उनकी बहादुरी पूर्ण कार्यों की गूंज थी परंतु जनता और नेता उनके अस्वस्थ होने के कारण परेशान भी थे। उनकी बीमारी की खबर सुनकर गांधी जी ने उन्हें आत्समर्पण कर देने का सुझाव दिया। अपने संदे। में गांधी जी ने कहा था "मैं तुम्हें एक संदे भेजा था कि तुम भूमिगत रहकर नहीं मरोगी। तुम हड्डियों का ढांचा बनकर रह गई हो। बाहर आकर आत्मसमर्पण कर दो तथा पुरस्कार की जो राा। तुम्हारी गिरफ्तारी के लिए घोषित की गई है उसे स्वयं जीतो। पुरस्कार रा िको हरिजनों के कल्याण के लिए संभाल कर रखो। परंतु उन्होंने गांधी जी का यह पराम भी नहीं माना और अपने क्रांतिकारी जीवन में सफलतापूर्वक लगी रही। बहरहाल अरुणा जी 26 जनवरी 1946 को उनकी गिरफ्तारी का वारंट रद्द होने के बाद ही बाहर आई। साढ़े तीन वर्ष के भूमिगत जीवन के पश्चात् जब अरुणा जी दिल्ली पधारी तब दिल्ली वालों ने उनका हार्दिक स्वागत किया। रामलीला मैदान में उनका भव्य अभिनंदन किया गया। फरवरी 1946 को उन्होंने सुझाव दिया कि शीघ्र आजादी के लिए भारत में ही आजाद हिन्द सेना का गठन किया जाय। परंतु जब तक नौसेना विद्रोह हो चुका था तथा सत्ता हस्तांतरण की वार्तायें शुरु हो चुकी थी। अतः इसकी जरुरत ही नहीं रह गई थी। दैनिक "ट्रिब्यून' में आसफ अली की साहसी भूमिगत मोर्चा बंदी के लिए सन् 1942 की "रानी झांसी की संज्ञा दी।

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया। आजादी के बाद सन् 1947 में उन्हें दिल्ली प्रदे 1 कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष बनाया गया। बाद में उन्हें रेलवे कर्मचारी का नेतृत्व भी सौंपा गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे समाज सेवा के कार्यों में जुट गये। 24 इसके बाद उन्हें राजधानी के नगर निगम का प्रथम महिला महापौर बनाया गया। महापौर रहकर उन्होंने शहर में कई क्रांतिकारी कदम उठाये। अरुणा जी जितनी दृढ़ और मजबूत थी उतनी ही कोमल और संवेदन गील हृदय की मालिक भी थी। अपना पक्ष जितने अकाट्य तर्कों के साथ प्रस्तुत करती थी उसे अस्वीकार करने का कोई बहाना नहीं बचता था और उसके सम्मुख वाले पक्ष के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं रह जाता था और उससे सहमत होना पड़ता था। वह अपने क्रांतिकारी तथा विद्रोही उद्‌गारों से अपनी श्रोताओं को काफी उत्तेजित कर लेती थी। वह अपने ऊर्जा पूर्ण भाषणों के लिए प्रसिद्ध थी। वह अपने भाषणों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती थी। आंख मूंदकर अरुणा जी का नेतृत्व स्वीकार कर लिया जाता था। सदा ही प्रवाह के विपरीत "तैरने" की प्रवृत्ति रही। जो मार्ग चुन लिया तो जीवन भर उसी के प्रति अत्यंत निष्ठा एवं समर्पण भावना से कार्य करती रही। कालान्तर में अरुणा जी साम्यवाद की ओर झुकी थी। 60 के दशक में डॉ० बालिगा के सहयोग से राजधानी में उन्होंने एक अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र 'पैट्रियॉट' प्रकाशित करना आरंभ किया और उसके साथ एक अंग्रेजी साप्ताहिक लिंक' का भी प्रकाान आरंभ किया। 'पैट्रियॉट' की प्रथम प्रति का विमोचन तात्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ।

सम्मान एवं पुरस्कार भारत-रूस के बीच संबंध बढ़ाने के लिए किये गये अरुणा जी के प्रयासों के

सम्मानस्वरुप अरुणा जी को 'लेनिन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अरुणा जी द्वारा वि व शांति और स‌द्भावना के लिए किये गये प्रयासों को देखते हुए अरुणा जी को 1992 में अंतर्राष्ट्रीय स‌द्भाव के लिए 'जवाहर लाल नेहरु पुरस्कार दिया गया। 1992 में ही आपको 'पदम् विभूषण' के नागरिक सम्मान से विभूषित किया गया। इसके अतिरिक्त उनके नाम से राजधानी की एक सड़क का नामकरण किया गया था। इन दोनों के योगदान को देखते हुए भारतीय डाक सेवा द्वारा इनके नाम का डाक टिकट भी जारी किया। अरुणा जी के भारतीय राजनीति, वि व शांति, राष्ट्रीय एकता, साम्प्रदायिक स‌द्भाव, समाज सेवा, जनकल्याण और महिलाओं के उत्थान के लिए किये गये प्रयासों को ध्यान में रखते हुए अंत में भारत सरकार ने 24 जुलाई 1997 को अरुणा जी को दे के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत-रत्न' से (मरणोपरांत) अलंकृत किया। अरुणा जी को यह सम्मान राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिन में प्रदान किया था।

उन्हें दे। का सर्वोच्च नागरिक अलंकरण 'भारत रत्न' से सम्मानित करके उनकी अपार दे सेवा के उपलक्ष्य में दे का प्यार व आदर व्यक्त किया गया। यही प्यार अरुणा आसफ अली जैसी 
विप्लवी महिला के लिए उचित है। जब भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिपिबद्ध किया जायेगा तब वह इतिहास अरुणा आसफ अली के उल्लेख के बिना अधूरा ही रहेगा। भारत की रत्न, वीरांगना अरुणा आसफ अली का 29 जुलाई 1996 को सायं 4 बजे दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में निधन हो गया। अरुणा की महायात्रा चल पड़ी अंतिम प्रयाण की ओर। उनके निधन पर सारा दे। स्तब्ध रह गया।


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संदर्भ ग्रंथ

1. इट्स हिन्दी डॉट कॉम बायोग्राफी

2. वेब दुनिया नवीन रंगयाल भार ऐप फोर डेली न्यूज

3 रोर मीडिया आर्टिकल, खुर्शीद आलम, 13 जुलाई 2018

4. प्रभात प्रका ान अरुणा आसफ अली

5. राधा कुमार, स्त्री संघर्ष का इतिहास, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ० सं०- 147

8. प्रभात प्रकाशन, पूर्व उद्धरित।

7. विश्वामित्र शर्मा, भारत रत्न, शिक्षा भारती, न्यू दिल्ली, 1997, पृ० सं०- 210

स्त्री संघर्ष, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 147

9. राजेन्द्र पटोरिया, 50 क्रांतिकारी, राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली, 2008, पृ० सं०- 252

10. भारत रत्न, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 211

11. भारत रत्न, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 211

12. रोर मीडिया, पूर्व उद्धरित।

13. राजेन्द्र पटोरिया, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०-252

14. यही, पृ० सं०-253

15. राधा कुमार, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 148

16. बलबीर सक्सेना, भारतीय महिलाएं, सन भााईन बुक्स, नई दिल्ली, 2008, पृ० सं०- 163

17. भारत रत्न, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 211

18. बलबीर सक्सेना, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 163

19. भारत रत्न, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 211

20. राधा कुमार, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 148

21. यही, पृ० सं०- 148

22. बलबीर सक्सेना, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 165

23. राजेन्द्र पटोरिया, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०-253

24. अनिल कुमार और मनीष कुमार, भारत रत्न, ज्ञान गंगा, दिल्ली, 2011. पृ० सं०-206

25. बलबीर सक्सेना, पूर्व उद्धरित, पृ० सं० 166

26. रोर मीडिया, पूर्व उद्धरित।

27. बलबीर सक्सेना, पूर्व उद्धरित, पृ० सं०- 166

28. ममता मिश्रा, हमारे भारत रत्न, संजीव प्रकाान, दरियागंज, नई दिल्ली, 2007, पृ० सं०- 154

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