Valuable biography of Mahadevi Varma ji[महादेवी वर्मा जी का बहुमूल्य जीवन परिचय ] - New hindi english imp facts & best moral Quotes 2020

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महादेवी वर्मा जी का बहुमूल्य जीवन परिचय --


महादेवी वर्मा  जी का जन्म  होली के दिन 26 मार्च, 1907 को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद नगर में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा तथा माता का नाम श्रीमती हेमरानी देवी थी । उनके नाना ब्रजभाषा में काव्य - सृजन किया करते थे , फलतः बचपन से ही उनमें कविता लिखने की प्रवृत्ति विकसित हो गयी तथा वे अपने कविताओ के प्रति जुझारू स्वभाव की थी । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा इंदौर और भागलपुर में सम्पन्न हुई । ग्यारह वर्ष की अवस्था में ही उनका विवाह डॉ . स्वरूप नारायण वर्मा के साथ हुआ । उनके श्वसुर नारी - शिक्षा के विरोधी थे  तथा कुछ रूढ़िवादी विचारधारा के पालनहार भी  थे फलतः कुछ समय के लिए उनकी शिक्षा स्थगित हो गई । श्वसुर के निधन के पश्चात् उन्हें अपने शिक्षक को आगे बढ़ाने का एक अवसर प्राप्त हुआ अतः  उनकी शिक्षा पुनः प्रारम्भ हुई और उन्होंने 1920 ई . में मिडिल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की 1924 ई . में इन्ट्रेस , 1926ई . में इण्टरमीडिएट की पढ़ाई पूर्ण कर 1928ई . में बी . ए . की परीक्षा में उन्होंने उत्तीर्णता प्राप्त की । 1935 ई . में उन्होंने इलाहाबाद  विश्वविद्यालय से एम . ए . ( संस्कृत ) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया । आगे चलकर महादेवी वर्मा जी ने प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्राचार्या के पद पर वर्षों तक कार्यरत रहने के पश्चात् कुलपति पद को भी  संभाला ।

प्रयाग महिला विद्यापीठ  श्री संगमलाल अग्रवाल जी  ने महिलाओं को शिक्षा प्रदान करने एवं उनके भावी उज्जवल भविष्य  के उद्देश्य से इसकी स्थापना की थी जिसकी प्रधानाचार्या  महादेवी वर्मा जी को बनाया गया था। इलाहाबाद के दक्षिण मलाका नामक मुहल्ले में यह प्रयाग महिला विद्यापीठ  अवस्थित  है।

1971 में जब इसे महाविद्यालय का दर्जा  प्राप्त हुआ। तो महादेवी जी  फिर से इसके महाविद्यालय विभाग की प्रधानायार्या बनीं।
1952 ई . से 1957ई . तक वे उत्तर प्रदेश की विधान परिषद् की सदस्या भी रहीं । बचपन से ही उनमें काव्यगत प्रतिभा के परिदर्शन होते हैं । मैट्रिक की कक्षा तक पहुँचते - पहुँचते उनकी काव्य - धारा से धीरे धीरे और आकर्षक होने लगी । फलतः उनकी रचनाएँ रहस्यवादी प्रवृत्तियों से आवृत्त हैं । काव्य क्षेत्र में महादेवी की अपनी एक विशिष्ट पहचान रही है ।विरल वेदना और पीड़ा की गायिका के रूप में इनकी विशेष ख्याति है । पारिवारिक और सामाजिक बंधनों में जकड़ी हुई नारी की दुःस्थिति के प्रति वे अत्यधिक संवेदनशील हैं । उनकी कविता की धारा में विद्रोह के स्वर भी झंकृत होते हैं । महादेवी के काव्य की वेदना लौकिक वेदना से भिन्न आध्यात्मिक जगत से सम्बद्ध है । उनके काव्यों में वेदना , पीड़ा और दुःखों के संसार से सम्पृक्त शब्दों की भरमार है । उनकी कविता में विरह के शब्द हैं तो साथ - ही - साथ मिलन के शब्दों का प्रयोग भी करीब - करीब उसी अनुपात में किया गया है । प्रकृति के सौंदर्य के अभिव्यंजन के साथ - साथ उनके काव्य की धारा राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना से भी जुड़ी हुई है । उनकी कविता का कलापक्ष उतना ही मनोरम , आकर्षक और सुदृढ़ है जितना कि भाव पक्ष । उनकी कविताएँ निजी संसार को बेहतरीन ढंग से अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम हैं । स्मरण रहे कि वेदना से आपूरित काव्य संसार में महादेवी की आस्था और निष्ठा कम नहीं है । उनके काव्यों में महत्त्वपूर्ण अलंकारों का अद्भुत संयोजन है ।

महादेवी वर्मा जी को आधुनिक मीरा भी कहा गया है। कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है। उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरूआत की और अंतिम समय तक व प्रयाग महिला क प्रधानाचार्या बनी रहीं। उनका बाल-विवाह हुआ परंतु उन्होंने अविवाहित की भांति जीवन-यापन किया। प्रतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं। उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। गत शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में वे जीवन भर बनी रहीं वे भारत की 50 सबसे यशस्वी महिलाओं में भी शामिल हैं।महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान के बीच बचपन से मित्रता थी। महादेवी वर्मा जी का देहांत
11 सितंबर, 1987 को हुआ  वे हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से एक थी।


महादेवी वर्मा जी की प्रमुख कृतियां  कृतियाँ : -.नीहार ,दीपशिखा , संधिनी , परिधि , रश्मि , नीरजा , सांध्यगीत , यामा ,  अग्निरेखा जैसे काव्य संकलनों के साथ ही साथ रेखाचित्र , संस्मरण , निबन्ध , साक्षात्कार , भाषण , समीक्षा आदि कई विधाओं की विशिष्ट गद्य कृतियाँ प्रकाशित । सम्मान : 
महादेवी वर्मा जी प्रतिभाशाली महिला थी तथा उन्हें1956 में पद्मभूषण के सम्मान से भी सम्मानित किया गया था आगे चलकर 1983 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार भी उन्हें प्राप्त हुआ।  ' यामा ' पर मंगला प्रसाद पारितोषिक तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन ,  उनकी अद्भुत प्रतिभाशाली काव्य लेखन ने उन्हें प्रयाग द्वारा भारतेन्दु पुरस्कार अपने नाम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। महादेवी वर्मा जी एक प्रसिद्ध जिन्होंने अपने मेहनत और लगन के बदौलत बहुत सुर्खियां बटोरी।
💥💥💥 महादेवी वर्मा जी के सुप्रसिद्ध कविताएं=
1.यह मंदिर का दीप
2.प्राणों के अन्तिम पाहुन
3.रूपसि तेरा घन - केश - पाश
4. विरह का जलजात जीवन
5.मैं नीर - भरी दुःख की बदली
6.जो न प्रिय पहिचान पाती
7.मधुर - मधुर मेरे दीपक जल !
8.सजल है कितना सबेरा।
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1.यह मंदिर का दीप
      
यह मंदिर का दीप यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो !
रजत शंख - घड़ियाल , स्वर्ण वंशी , वीणा स्वर ,
गये आरती बेला को शत - शत लय से भर ;
जब था कल - कण्ठों का मेला
विहँसे उपल - तिमिर था खेला
अब मन्दिर में इष्ट अकेला ;
इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो !
चरणों से चिन्हित अलिन्द की भूमि सुनहली ,
प्रणत शिरों को अंक लिए चन्दन की दहली ,
झरे सुमन विखरे अक्षत सित
धूप - अर्घ्य नैवेद्य अपरिमित
तम में सब होंगे अन्तर्हित ;
सबकी अर्चित कथा इसी लौ में पलने दो !
पल के मनके फेर पुजारी विश्व सो गया ,
प्रतिध्वनि का इतिहास प्रस्तरों के बीच सो गया ;
साँसों की समाधि का जीवन
मसि - सागर का पंथ गया बन ;
रुका मुखर कण - कण का स्पन्दन ।
इस ज्वाला में प्राण - रूप फिर से ढलने दो !

झंझा है दिग्भ्रान्त रात की मूर्छा गहरी ,
आज पुजारी बने , ज्योति का यह लघु प्रहरी ;
जब तक लौटे दिन की हलचल ,
तब तक यह जागेगा प्रतिपल रेखाओं में भर आभा जल ;
दूत साँझ का इसे प्रभाती तक चलने दो !
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2.प्राणों के अन्तिम पाहुन
चाँदनी - धुला , अंजन सा , विद्युत् - मुस्कान बिछाता ,
सुरभित समीर - पंखों से उड़ जो नम में घिर आता ,
वह वारिद तुम आना बन !
ज्यों श्रान्त पथिक पर रजनी छाया सी आ मुस्काती ,
भारी पलकों में धीरे निद्रा का मधु ढुलकाती ,
त्यों करना बेसुध जीवन !
अज्ञात लोक से छिप - छिप ज्यों उतर रश्मियाँ आती ,
मधु पीकर प्यास बुझाने फूलों उर खुलवाती ,
छिप आना तुम छायातन !
हिम से जड़ नीला अपना निस्पन्द हृदय ले आना ,
मेरा जीवन - दीपक धर उसको सस्पन्द बनाना ,
हिम होने देना यह तन !
कितनी करुणाओं का मधु कितनी सुषमा की लाली ,
पुतली में छान भरी है मैंने जीवन की प्याली ,
पी कर लेना शीतल मन !
कितने युग बीत गये इन निधियों का करते संचय ,
तुम थोड़े से आँसू दे इन सबको कर लेना क्रय ,
अब हो व्यापार - विसर्जन !
है अन्तहीन लय यह जग , पल पल है मधुमय कम्पन ,
तुम इसकी स्वरलहरी में धोना अपने श्रम के कण ,
मधु से भरना सूनापन !
पाहुन से आते जाते कितने सुख के दुख के दल ,
वे जीवन के क्षण क्षण में भरते असीम कोलाहल ,
तुम बन आना नीरव क्षण !
तेरी छाया में दिव को हँसता है गर्वीला जग ,
तू एक अतिथि जिसका पथ हैं देख रहे अगणित दृग ,
साँसों में घड़ियाँ गिन गिन !
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3.रूपसि तेरा घन - केश - पाश
रूपसि तेरा घन - केश - पाश
श्यामल श्यामल कोमल कोमल ,
लहराता सुरभित केश - पाश !     
नभगंगा की रजतधार में ,
धो आई क्या इन्हें रात ?
कम्पित हैं तेरे सजल अंग ,
सिहरा सा तन हे सद्यस्नात !
भीगी अलकों के छोरों से
चूती बूंदें कर विविध लास !
रूपसि तेरा घन - केश - पाश !
           सौरभ भीना झीना गीला
         लिपटा मृद अंजन सा दुकूल ;
चल अंचल से झर झर झरते
पथ में जुगनू के स्वर्ण - फूल ,
दीपक से देता बार बार तेरा
उज्ज्वल चितवन - विलास !
रूपसि तेरा घन - केश - पाश !
उच्छवसित वक्ष पर चंचल है
बक पाँतों का अरविन्द - हार ;
तेरी निश्वासें छू भू को
बन बन जाती मलयज बयार ;
केकी - रव की नूपुर - ध्वनि सुन
जगती जगती की मूक प्यास !
रूपसि तेरा घन - केश - पाश !
इन स्निग्ध लटों से छा दे तन
पुलकित अंकों में भर विशाल ;
झुक सस्मित शीतल चुम्बन से
अंकित कर इसका मृदुल  भाल ;
दुलरा दे ना , बदला दे ना
यह तेरा शिशु जग है उदास !
रूपसी तेरा धन -केस- पाश
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4. विरह का जलजात जीवन
विरह का जलजात जीवन, विरह का जलजात जीवन ,
विरह का जलजात ! वेदना में जन्म करुणा में मिला आवास , अश्रु चुनता दिवस इसका ; अश्रु गिनती रात ;
जीवन विरह का जलजात !
आँसुओं का कोष उर , दृग अश्रु की टकसाल ,
तरल जल - कण से बने घन - सा क्षणिक मृदुगात ;
जीवन विरह का जलजात !
अश्रु से मधुकण लुटाता आ यहाँ मधुमास ,
अश्रु ही की हाट बन आती करुण बरसात ;
जीवन विरह का जलजात !
काल इसको दे गया पल - आँसुओं का हार ,
पूछता इसकी कथा निश्वास ही में वात ;
जीवन विरह का जलजात !
जो तुम्हारा हो सके लीला - कमल यह आज ,
खिल उठे निरुपम तुम्हारी देख स्मित का प्रात ;
जीवन विरह का जलजात !
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5.मैं नीर - भरी दुःख की बदली
मैं नीर - भरी दुख की बदली मैं नीर भरी दुख की बदली ।
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते ,
पलकों में निरिणी मचली !
मेरा पग - पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न - पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय - बयार पली ।
मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज - कण पर जल - कण हो बरसी ,
नव जीवन - अंकुर बन निकली !
पथ कोन मलिन करता आना ।
     पथ - चिन्ह न दे जाता जाना ;
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली !
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना ,
परिचय इतना , इतिहास यही -
उमड़ी कल थी , मिट आज चली !
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6.जो न प्रिय पहिचान पाती
जो न प्रिय पहिचान पाती जो न प्रिय पहिचान पाती ।
दौड़ती क्यों प्रति शिरा में प्यास विद्युत् - सी तरल बन ,
क्यों अचेतन रोम पाते चिर व्यधामय सजग जीवन ?
किसलिए हर साँस तम में
सजल दीपक राग गाती !
चाँदनी के बादलों से स्वप्न फिर फिर घेरते क्यों ?
मदिर सौरभ से सने क्षण दिवस - रात बिखेरते क्यों ?
सजग स्मित क्यों चितवनों के
सुप्त प्रहरी को जगाती ।
मेध - पथ में चिन्ह विद्युत् के गये जो छोड़ प्रिय - पद ,
जो न उनकी चाप का में जानती सन्देश उन्मद ,
किसलिए पावस नयन में प्राण में चातक बसाती !
कल्प - युगव्यापी विरह को एक सिहरन में सँभाले ,
शून्यता भर तरल मोती से मधुर सुधि - दीप बाले ,
क्यों किसी के आगमन के
शकुन स्पन्दन में मनाती ?
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7.मधुर - मधुर मेरे दीपक जल !
मधुर - मधुर मेरे दीपक जल !
युग - युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर !
सौरभ फैल विपुल धूप बन
मृदुल मोम - सा घुल रे , मृदु - तन  !
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित ,
तेरे जीवन का अणु गल - गल ।
पुलक - पुलक मेरे दीपक जल !
तारे शीतल कोमल नूतन
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण ;
हाय , न जल पाया तुझमें मिल !
       सिहर - सिहर मेरे दीपक जल !
जलते नभ में देख असंख्यक
स्नेह - हीन नित कितने दीपक
जलमय सागर का उर जलता ;
विद्युत ले घिरता है बादल !
      विहँस - विहँस मेरे दीपक जल !
द्रुम के अंग हरित कोमलतम
ज्वाला को करते हृदयंगम
वसुधा है जड़ अन्तर में भी
बन्दी है तापों की हलचल ;
बिखर - बिखर मेरे दीपक जल !
मेरे निश्वासों से द्रुततर ,
सुमग न तू बुझने का भय कर ।
मैं अंचल की ओट किये हूँ ,
अपनी मृदु पलकों से चंचल !
सहज - सहज मेरे दीपक जल !
सीमा ही लघुता का बन्धन
है अनादि तू मत पड़ियाँ गिन
मैं दृग के अक्षय कोषों से-
तुझमें भरती हूँ आँसू - जल !
सजल - सजल मेरे दीपक जल !
तुम असीम तेरा प्रकाश चिर नव खेल निरन्तर ,
तम के अणु - अणु में विद्युत - सा
अमिट चित्र अंकित करता चल ,
सरल - सरल मेरे दीपक जल !
तू जल जल जितना होता क्षय ;
यह समीप आता छलनामय ;
मधुर मिलन में मिट जाना तू ,
उसकी उज्ज्वल स्मित में घुल खिल !
‌मदिर - मदिर मेरे दीपक जल !
प्रियतम का पथ आलोकित कर !
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8.सजल है कितना सबेरा।
सजल है कितना सबेरा ।
गहन तम में जो कथा इसकी न भूला ,
अश्रु उस नभ के , चढ़ा सिर फूल फूला ,
झूम झुक झुक कह रहा हर श्वास तेरा !
राख से अंगार - तारे झर चले हैं ,
धूम - बन्दी रंग के निर्झर खुले हैं ,
खोलता है पंख रूपों में अँधेरा !
कल्पना निज देखकर साकार होते ,
और उसमें प्राण का संचार होते
सो गया रख तूलिका दीपक चितेरा !
अलस पलकों से पता अपना मिटाकर ,
मृदुल तिनकों में व्यथा अपनी छिपाकर ,
नयन छोड़े स्वप्न ने , खग ने बसेरा !
ले उषा ने किरण - अक्षत हास - रोली ,
रात अंकों से पराजय देख धो ली ,
राग ने फिर साँस का संसार घेरा ।
             सजल है कितना सबेरा ।
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