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 [29/05, 21:24] 🪷: प्रभुदयाल जी एक अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी थे। आप महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, वल्लभ भाई पटेल सहित उस समय के अनेक बड़े नेताओं


के निकट सहयोगी रहे। तीसरी और चौथी लोकसभा में कांग्रेस पार्टी की टिकट पर बिहार (अब झारखंड) के आदिवासी बहुल क्षेत्र गोड्डा से जीतकर सांसद बने। संतालों की समस्याओं को हरदम सरकार तक पहुँचाकर आप उनका समाधान कराने की कोशिश में लगे रहते थे। अछूतोद्धार एवं अस्पृश्यता निवारण के लिए आपने बहुत काम किया।


आपका जन्म दुमका में 16 अगस्त, 1889 को हुआ। आपकी प्रारंभिक शिक्षा दुमका जिला स्कूल में हुई। इसके बाद आपने कलकत्ता में वकालत की पढ़ाई की और कलकत्ता उच्च न्यायालय में सोलिसिटर और उच्चतम न्यायालय में वकील रहे। आपके लंबे जीवन का काफी हिस्सा आपके वकालत के पेशे के अलावा सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में बीता। इस दौरान दुमका के अलावा, कलकत्ता और असम आपका कार्यक्षेत्र रहा।


छात्र के रूप में कलकत्ता में रहते हुए ही प्रभुदयाल जी में देशभक्ति की ज्वाला धधकने लगी थी। इसके लिए आपने क्रांतिकारी मार्ग चुना और विपिनचंद्र गांगुली के नेतृत्ववाली 'बंगाल रिवोल्युशनरी पार्टी' के सदस्य बन गए। आप रोड़ा आर्म्स केस (1914) और बंगाल छोड़ो आंदोलन (1916) में सक्रिय रहे। आपने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) एवं गांधी जी के साथ दांडी मार्च में भी भाग लिया। राजनीतिक गतिविधियों के कारण सन् 1914 में आप जेल गए। रोड़ा आर्म्स लूट केस में आप पुलिस द्वारा पकड़े गए और फिर प्रमाण के अभाव में छूट भी गए, पर आपको मार्च, 1916 में चार वर्षों के लिए बंगाल से निकाल दिया गया। तब आप अपने घर दुमका आ गए और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गए। इसके पहले ही सन् 1913 में देवघर के पास जसीडीह में लोगों की स्वास्थ्य लाभ की आवश्यकता को ध्यान में रखकर बन रहे 'आरोग्य भवन' की स्थापना में आपने सहयोग किया। फिर दुमका में आपने कन्या पाठशाला की स्थापना की पहल की। उस समय बालिकाओं की शिक्षा की हिमायत करना बहुत असाधारण और चुनौतीपूर्ण बात थी। दुमका में तब तक कोई हिंदी पुस्तकालय नहीं था। आपकी पहल से तब वहाँ एक पुस्तकालय भी

[29/05, 21:28] 🪷: झारखंड के चमकते सितारे


शुरू हुआ। दुमका में आपने एक चिकित्सा केंद्र भी शुरू किया, जहाँ बायो-केमिक दवाओं के द्वारा होने वाला उपचार देहात के निवासियों के लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ। सन् 1917 में वकालत पास कर आपने दुमका में वकालत शुरू की। वहाँ जल्द ही आपकी वकालत अच्छी चल निकली। आप में जन-सेवा की भावना प्रबल होने के कारण आपने नाममात्र की फीस लेकर गरीबों के मुकदमे लड़े। कोर्ट में मुकदमा ले जाने की बजाय आपकी हर संभव पहली कोशिश यही होती कि मामला दोनों पक्ष आपस में सहमति से सुलझा लें।


दुमका तब एक काफी पिछड़ा हुआ क्षेत्र था। तब वहाँ यातायात के साधन के रूप में बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी का ही प्रचलन था। धीमी गति के यातायात साधनों के कारण दुमका का अन्य व्यापारिक केंद्रों से संपर्क नहीं के बराबर था।


दुमका के समर्थ व्यक्तियों से प्रभुदयाल जी ने यातायात की कठिनाइयों पर चर्चा की, पर सार्वजनिक यातायात के लिए मोटर गाड़ी के उनके प्रस्ताव से सहमत होने का साहस लोग नहीं जुटा सके। पर धुन के पक्के प्रभुदयाल जी ने हार नहीं मानी और बगैर लाभ-हानि की परवाह किए एक फोर्ड कार खरीदकर आपने उसे वहाँ टैक्सी के रूप में चलवाने का प्रयोग शुरू किया। जब सवारी और सामान की दूरी बहुत कम समय में तय होने लगी तो जनता का इसे अच्छा समर्थन मिला। एक वर्ष के बाद ही इस सफलता से उत्साहित होकर आपने यात्रियों के लिए बस और माल ढोने के लिए लॉरी सेवा चालू कर दी। इस प्रयोग से दुमका, नौनीहाट, भागलपुर (बिहार) आदि क्षेत्र आपस में जुड़ गए और उस क्षेत्र की व्यापारिक गतिविधियों में गति आई और वहाँ सभ्यता की रोशनी भी तेजी से फैलने लगी। इस तरह दुमका में सड़क परिवहन में मोटर गाड़ी लाकर उस क्षेत्र का द्रुत यातायात से परिचय कराने का श्रेय आपको ही जाता है। सन् 1917 में चम्पारण सत्याग्रह की सफलता के बाद जब गांधी जी ने स्वाधीनता, ग्राम स्वराज्य, स्वावलंबन और समृद्धि के प्रतीक के रूप में चरखा देश के सामने रखा, तो सशस्त्र क्रांति की राह के पथिक प्रभुदयाल जी भी इससे प्रभावित हुए और गांधी जी के अनुयायी बन गए। आपने तब दुमका की ग्रामीण जनता में आत्मनिर्भर स्वाधीन चेतना के जागरण के लिए जरमुंडी में एक चरखा केंद्र स्थापित किया।


आप दुमका क्षेत्र के लोगों के सुख-दुःख में सदैव भागीदार रहे। क्षेत्र के लोगों की प्राकृतिक आपदा में या सिंचाई के लिए नहर-कुओं के निर्माण में या फिर नौकरी दिलाने में सहायता करने में आप हरदम तत्पर रहते थे। गुजरात में आदिवासी समुदाय के उत्थान में लगे समाजसेवी अमृतलाल विट्ठलदास ठक्कर, जो ठक्कर

[29/05, 21:29] 🪷: बापा के नाम से प्रसिद्ध थे, से संपर्क होने पर उन्हीं की सलाह से आपने अपने क्षेत्र में जहाँ कुष्ठ का काफी प्रकोप था, 'संताल पहाड़िया सेवा मंडल' के माध्यम से कुष्ठ निवारण का कार्य प्रारंभ किया। इसी संस्था के द्वारा संताल और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए शुरू किए गए शिक्षा केंद्रों से शिक्षा प्राप्त कर अनेक आदिवासी उच्च सरकारी पदों पर पहुँचने में सफल रहे। आप शिक्षा, कुष्ठ निवारण, विधवा विवाह, हरिजन उत्थान, स्काऊट्स एंड गाइड्स जैसे समाज सेवा के कार्यक्रमों में जीवनभर सक्रिय रहे। समाज सुधार की जो बातें दूसरों से कहते, उसे आप खुद भी करने में विश्वास रखते थे। विधवा विवाह के आप प्रबल हिमायती थे और इसका परिचय आपने अपने पोते का विवाह उस महिला की लड़की से करके दिया, जिसका विधवा होने पर आपने ही विवाह कराया था। सन् 1946 से मृत्युपर्यंत आप कुष्ठ निवारण के काम में संताल पहाड़िया सेवा मंडल के माध्यम से जुड़े रहे। दुमका में आपके सामाजिक कार्यों में परिवार और विशेष रूप से आपके अनुज रामजीवन हिम्मतसिंहका, जो खुद संताल परगना के एक जाने-माने समाजसेवी थे, ने मजबूती से साथ निभाया। कलकत्ता में रहते हुए आपने अपने गृह राज्य बिहार (अब झारखंड) से जाकर वहाँ पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए राजेंद्र छात्रावास की स्थापना की, जिसमें रह कर यहाँ के हजारों छात्रों ने उच्च शिक्षा पाई। आपने कलकत्ता में अनेक सामाजिक संस्थाएँ खड़ी कीं, पर बिहार के लिए कुछ करने की बेचैनी उनके मन में सदैव रही।


आज यह एक अविश्वसनीय-सी बात लगेगी कि सन् 1962 में आपके झारखंड के गोड्डा से (तब बिहार) पहली बार और सन् 1967 में दूसरी बार लोकसभा का सदस्य चुने जाने से पहले आप दो दूसरे राज्यों असम (1946-48) और बंगाल (1948) की विधानसभाओं के सदस्य भी रहे। इसके अलावा आप संविधानसभा (1948-50), प्रॉविजनल संसद् (1950-52) और राज्यसभा (1956-62) के सदस्य भी रहे। दुमका में आप पार्षद (1917-20) भी रहे। इसके पहले सन् 1912 में आपने डिप्टी मजिस्ट्रेट बनने का सरकारी आग्रह ठुकरा दिया था। सन् 1924 में, जब देशबंधु चित्तरंजन दास कलकत्ता कॉरपोरेशन के मेयर चुने गए, उसी समय प्रभुदयाल जी कॉरपोरेशन के पार्षद चुने गए। आप फिर लगातार सन् 1943 तक वहाँ पार्षद चुने जाते रहे।


प्रभुदयाल जी सन् 1920 में गांधी जी के संपर्क में आए। सन् 1946 में जब असम में सांप्रदायिक हिंसा भड़कने पर गांधी जी वहाँ गए तो प्रभुदयाल जी ने उनके साथ पाँच दिनों तक दंगाग्रस्त इलाकों की यात्रा की और दंगापीड़ितों को राहत देने

[29/05, 21:30] 🪷: में सहयोग दिया। नेताजी से आपके बड़े निकट संबंध रहे। नेताजी की लंबी बीमारी के दौरान जेनेवा (स्विट्जरलैंड) में चिकित्सा व्यय का भार प्रभुदयाल जी ने अपने ऊपर लिया और निरंतर समय पर उनके लिए औषधि और रुपए-पैसे की व्यवस्था करते रहे। डॉ. राममनोहर लोहिया से प्रभुदयाल जी का संपर्क सन् 1926 में हुआ और शीघ्र ही डॉ. लोहिया से आपका संबंध छोटे भाई की तरह का हो गया। लोहिया जी के व्यक्तित्व निर्माण में प्रभुदयाल जी का काफी योगदान रहा। विरोधी राजनीतिक विचारधारा का होने के बावजूद, दोनों में आत्मीय संबंध अंतिम समय तक बना रहा। राजेंद्र बाबू से तो आपका परिचय कलकत्ते में पढ़ने के दौरान ही हो गया था। सन् 1934 में जब बिहार में भूकंप आया और उससे भीषण तबाही हुई तो राहत कार्य में सहयोग के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बुलाने पर प्रभुदयाल जी ने न सिर्फ धन भेजा, बल्कि स्वयं वहाँ जाकर राहत कार्य में हाथ बँटाया। राजेंद्र बाबू ने आपको भूकंप राहत के लिए बनी अखिल भारतीय कमिटी में रखा। राजेंद्र बाबू के साथ आपके संबंध प्रगाढ़ होते गए और अंत समय तक ऐसे ही बने रहे। सरदार पटेल के भी आप विश्वासपात्र थे। सरदार पटेल ने आपको असम में कई राजनीतिक अभियानों की जिम्मेदारी सौंपी, जिन्हें आपने सफलतापूर्वक निभाया। लालबहादुर शास्त्री से भी आपके निकटतम संबंध थे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण से तो आपके घर जैसे संबंध थे।


प्रभुदयाल जी ने एक जागरूक विधिवेत्ता और जन-प्रतिनिधि के रूप में संविधान निर्माण में अपना योगदान किया। संविधान के आमुख में आपके भी हस्ताक्षर हैं। सन् 1950 के प्रारंभ में संविधान का कार्य पूर्ण होने पर सन् 1952 तक यही संविधान सभा अंतरिम संसद् के रूप में कार्य करती रही और इस अवधि में प्रभुदयाल जी इसके सदस्य बने रहे। राजनीतिक आदर्शों में होते अवमूल्यन से तालमेल न बिठा पाने के कारण सन् 1971 में आपने अपने को दलगत राजनीति से पूरी तरह मुक्त कर लिया और पूरी तरह समाज सेवा को समर्पित हो गए। सांसद के रूप में आपके भाषण संतुलित और विचारशील हुआ करते थे। कानूनी मसलों पर संसद् में आपके भाषण बहुत पसंद किए जाते थे। आपने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कार्य किया और राष्ट्रीय विचारधारा को दिशा देने वाले दो पत्रों का सफलतापूर्वक संचालन कर आपने सिद्ध कर दिया कि पत्रकारिता में भी आपकी गहरी पैठ थी।


अपने कर्मों से आपने संताल परगना का नाम देश में ऊँचा किया। सन् 1991 में 102 वर्ष की उम्र में अपने पीछे अपनी कीर्ति और एक भरा-पूरा परिवार छोड़कर आप सदा के लिए इस दुनिया से प्रयाण कर गए।

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