Origin, Construction, and Use of the Mandar झारखण्ड का प्रसिद्ध लोक वाद्ययंत्र मांदर – सम्पूर्ण जानकारी मांदर वाद्ययंत्र क्या है? झारखण्ड की लोक संस्कृति में इसका महत्व - New hindi english facts important best articles news, biography history

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 झारखण्ड के प्रमुख वाद्ययंत्रः मांदर  :- मनीषा कुमारी

झारखण्ड के प्रमुख वाद्ययंत्र: मांदर का इतिहास, महत्व और विशेषताएँ

मांदर: झारखण्ड की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख वाद्ययंत्र

झारखण्ड का प्रसिद्ध लोक वाद्ययंत्र मांदर – सम्पूर्ण जानकारी

मांदर वाद्ययंत्र क्या है? झारखण्ड की लोक संस्कृति में इसका महत्व

झारखण्ड के प्रमुख वाद्ययंत्र मांदर की उत्पत्ति, बनावट और उपयोग

मांदर: झारखण्ड के लोक संगीत की धड़कन

झारखण्ड के पारंपरिक वाद्ययंत्रों में मांदर का विशेष स्थान

मांदर वाद्ययंत्र पर निबंध | झारखण्ड की लोक विरासत

झारखण्ड का मांदर: इतिहास, संरचना और सांस्कृतिक महत्व

मांदर वाद्ययंत्र: झारखण्ड की लोक परंपरा और संगीत का प्रतीक


प्रारंभिक काल से संगीत में बाद्यों का विशेष महत्व रहा है। अजन्ता, एलोरा और एलिफेण्टा की चित्रकारी व मोहनजोदड़ों के भग्नावशेष में तथा वेद, उपनिषद् आदि ग्रंथों में विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्रों का प्रयोग हुआ है। भगवान शंकर का प्रिय वाद्ययंत्र डमरू और भगवती सरस्वती का प्रिय वाद्य वीणा मानी गयी है। इससे वाद्ययंत्रों की प्राचीनता का पता चलता है। भारतीय वाद्ययंत्रों को चार प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है तिते सुधिर, अवनद्द तथा घन। यह विभाजन 'संगीत-रत्नाकर' पर आधारित है।


तत् सुषिर अवनद्ध एवं घन। वाद्यतन्त्री ततं वाद्यं सुषिरमतम। चर्मावनद्धवदनमवनद्ध तु वाद्यते। धनोमूर्तिः सार्श्वभधाताद्वधते यंत्र तद्धनम् ।

तत् वाद्य - तत् वाद्य वे है जिनमें तारों द्वारा स्वरों की उत्पत्ति होती है। वाद्य में लगे हुए तारों पर जब प्रहार किया जाता है, तब उसके तार आन्दोलित होते है, जिससे ध्वनि निकलती है। तत् वाद्य को दो भागों में बाँटा जा सकता है- तत् और वितत् ।


तत् वाद्य - तत् वाद्य वे हैं जिनके तारों पर ऑगुलियों एवं मिजराब द्वारा प्रहार किया जाता है। जैसे-तानपूरा, वीणा, सितार, सरोद आदि। वीणा को तत् वाद्य की जननी मानी जाती है।

वितत् वाद्य - वितत् वाद्य वे है, जो गज अथवा कमानी द्वारा बजाये जाते हैं। जैसे सारंगी, इसराज, बेला, आदि।

सुषिर वाद्य - जिन वाद्यों में वायु के प्रवेश से स्वरों की उत्पत्ति होती है, वो सुषिर वाद्य कहलाते है। इन वाद्यों में वायु मुँह के द्वारा पहुँचायी जाती है। जैसे बाँसुरी, शहनाई, क्लेरोनट, बीन आदि। धौंकनी द्वारा भी इन वाद्यों में वायु प्रवेश कराई जाती है। जैसे हारमोनियम।

अवनद्ध वाद्य - जिन वाद्यों में खिंचे हुए चमड़े या कपड़े पर प्रहार करने से ध्वनि उपलब्ध होती है, वे अवनद्ध वाद्य कहलाते है। इन्हें ताल-वाद्य भी कहा जाता है। अवनद्ध वाद्यों में मृदंग, तबला, पखावज, नगाड़ा, डमरू, ढोलक आदि आते है।

इसी प्रकार झारखण्ड के वाद्ययंत्रों को भी उपर्युक्त चार भागों में विभाजित किया गया है।

झारखण्ड की संस्कृति में प्रचलित सबसे महत्वपूर्ण वाद्यत्रयों में से मांदर और ढोल है जिनका प्रयोग आदिकाल से ही विभिन्न नामों के रूप में होता आ रहा है।

मांदर

मांदर का शाब्दिक अर्थ है-मृदंग का एक भेद और मृदंग ढोलकी की तरह एक बाजा मुरज होता है। इस प्रकार मांदर, मृदंग, मुरज एक ही प्रकार के वाद्य है। मांदर की प्राचीनता बहुत पुरानी है। नटराज शंकर का डमरू सबसे प्राचीन अवनद्ध वाद्य है, उसी के आधार पर मृदंग की उत्पत्ति हुई। मृदंग की प्राचीनता का प्रमाण ऋग्वेद से मिलता है। इसमें वीणा, मृदंग, वंशी और डमरू का वर्णन आया है। पुरातन काल में मृदंग को पुष्कर वाद्यों की श्रेणी में प्रथम वाद्य कहा जाता था जिसका वर्णन भरत-मत के ग्रंथों में मिलता है। पुष्कर वाद्य देवताओं को बहुत प्रिय था। इसकी ताल के साथ-साथ उनका नृत्य हुआ करता था। इसका प्रमाण अनेक प्राचीन मूर्तियों तथा चित्रों द्वारा मिलता है।

पखावज, मुरज और मर्दल, ये नाम भी मृदग के ही है। इस प्रकार के विभिन्न नाम और उनकी आकृतियों का वर्णन ग्रंथों में मिलता है। मृदंग का विशेष प्रचार दक्षिण भारत में रहा जिसे वहाँ मृदंगम्' कहा जाता है। कुछ समय बाद उत्तर भारत के संगीतज्ञों ने 'मृदंग' से मिलता-जुलता वाद्य बनाकर उसका नाम 'पखावज (पक्ष वाद्य) रखा दिया। पखावज पर उनके कठिन तालों का प्रयोग हुआ करता था। लेकिन जब से तबले का आविष्कार हुआ, मृदंग का प्रचार उत्तर भारत में कम हो गया है।


ऐतिहासिक दृष्टि से मृदंग, मांदर, मुरज आदि का उल्लेख वैदिक साहित्य में प्राप्त नहीं होता। फिर भी जिस प्रकार मांदर, मृदंग आदि का नाम वाल्मीकि रामायण में प्रयुक्त हुआ है उससे यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि रामायणकाल से अनेक वर्षों पूर्व इन वाद्यों का प्रचार हो चुका था। रामायण के अध्ययन से यह पता चलता है कि उस समय अवनद्ध वाद्यों में मांदर, मृदंग का सर्वाधिक प्रचार था।

मांदर का उल्लेख अनेक प्राचीन साहित्यक ग्रंथों में मृदंग के रूप में हुआ है। महाभारत में भी मृदंग के नाम उपलब्ध है। कालिदास के साहित्य में मर्दल, मुरज तथा मृदंग इन तीनों का वर्णन विभिन्न जगहों पर हुआ हैं। महर्षि भरत ने अपनी पुस्तक नाट्यशास्त्र में मृदंग का उल्लेख किया है-

निगदन्ति मृदङ्ग तं मर्दलं मुरजतया। प्रोक्तं मृदङ्ग शब्देन मुनिना पुष्कर त्रयम् ।।

अभिनव गुप्त ने भी मुरज को मृदंग का पर्याय बताया है। महर्षि भरत ने 34वें अध्लिखा है- सुख प्रदान करने वाली मांगलिक होने के कारण इसे मृदंग कहते हैं। मुलायम मिट्टी से बनी हुई होने के कारण इसे मुरज कहते हैं। शारंगदेव ने भी इसे मृदंग का पर्याय माना है।

वैदिक संस्कृत ग्रंथों के पूर्व प्राकृत भाषा प्रचलित थी जिसे संस्कारित कर संस्कृति की कठिनाईयों ने प्रकृति की ओर भाषा का विकास हुआ। नागपुरी भी प्राकृत के ही एक क्षेत्रीय रूप झारखण्डी प्राकृत (अर्द्ध मागधी) में जो मांदर, मांदल आया है इसी लोक भाषा के शब्द बाद में मृदंग बन गए। लालमणि मिश्र का कहना है कि मृदंग का यह नाम प्राकृत भाषा की देन है।

"मांदर किनलो दादा, जनी किनल नियर लागेला । मांदर फूटलो दादा, जनी मोरल तरी लागेला ।

अर्थात् मांदर खरीदने पर पत्नी खरीद लाने का सुख मिलता है, (कन्या मूल्य देने के कारण)। मांदर फूटने पर पत्नी के मर जाने जैसा दुःख होता है। इस प्रकार इस गीत से यह पता चलता है कि झारखण्ड के जनजातीय समाज में मांदर बहुत महत्वपूर्ण वाद्ययंत्र है। प्रायः हर समुदाय का मांदर अपने विशिष्ट स्वरूप में होता है। सबकी बनावट में अंतर भी दृष्टिगत होते है जिसके कारण झारखण्ड को संगीत के पक्ष से मांदर देश कहा जाता है। झारखण्डी संगीत-संसार से मांदर, नगाड़े, बांसुरी गीतों के प्राण कहे गए हैं। इनके बिना झारखण्डी संगीत का आनन्द अधुरा है।

नागपुरी में एक पहेली कही जाती है-

काठ कर घोड़ा, लोहा कर सींग। माइर दे मृदंग, बाजे धातिंग तिंग ।।

अर्थात् ढेकी। यहां ढेकी की "ढेकुर चा" की आवाज को मृदंग के धातिंग लिंग ध्वनि से बताया गया है और यह ध्वनि धातिंग तिंग यहां की ताल या ध्वनि है। इस तरह इससे मृदंग और मांदर की निकटता का पता चलता है। नागपुरी में मृदंग का प्रयोग न कर मांदर का उपयोग किया जाता है।

मांदर पूरे झारखण्ड का सर्वप्रिय वाद्य है और इसकी ताल इसकी गूँज लोगों को दिवाना बना देती हैं। अखरा से मांदर की आ‌ह्वान ताल बजा कर किया जाता है। झारखण्ड में शायद ही ऐसा कोई घर हो चाहे वो सदान का हो या आदिवासी का, जहाँ मांदर खूँटी पर टंगा न हो। मांदर अखरा की शान है। इसके बिना अखरा जागता नहीं। अखरा को जगाने के लिए मांदर की ताल को बजाया जाता है। मांदर का जादू अखरा में ही देखने को मिलती है जब मांदर वादक (मंदरिका) झूम-झूम कर मांदर बजाता है।


"जने जने मांदर बाजे । चले हो तने तने जाब। छउवा पुता भेबै डाँवा डोल।"

[09/06, 01:57] 🪷: अर्थात् जहाँ-जहाँ मांदर बजता है चलो प्रिय वहाँ यहाँ चलें। बच्चे भले ही डाँया डोल हो आएँ हृदय डौंवाडोल न हो। इस प्रकार जब मांदर बजता है तो लोगों के तन-मन को झंकृत कर देता है।'


झारखण्ड का मांदर पूरब में मृदंग और पश्चिम में पखावज के रूप में परिवर्तित हो गया। पखावज भी मांदर के नजदीक का वाद्य यंत्र है। तभी वसंत लिखित संगीत विशारद कहा है-पखावज, मुरज और मर्दल ये नाम भी मृदंग के ही हैं। इसके अलावा मृदंग का विशेष प्रचार दक्षिण भारत में रहा। कुछ समय बाद उत्तर भारत के संगीतज्ञों ने मृदंग का मिलता-जुलता प्रकार बनाकर इसका नाम पखावज कर लिया। इस संबंध में कृष्ण दास के पद देखे जा सकते है गिड़िगिड़ितों धितों धितों मन्दिलरा बाजै", इस तरह संगीत रत्नाकार में वर्णित मर्दल से ही मादल और मन्दिलरा शब्द बनें।


मांदर से मिलते-जुलते वाद्य है मृदंग, मुरज, मर्दल, मंदिलरा, मादल। मांदर की उत्पत्ति के बारे में कहा जा सकता है कि झारखण्ड का मांदर तो आदिवासी सदान अर्थात् पुराने निवासियों का लोकप्रिय वाद्य रहा है। आगे चलकर विकसित सभ्यता आर्य समाज ने इस लोकवाद्य मांदर को उपर्युक्त रूपों में विकसित किया। मांदर की उत्पत्ति का इतिहास तो झारखण्ड में भी अज्ञात है। यह इतिहास के अज्ञात काल से बजता और लोगों को रिझाता आ रहा है।"


ऐसा कहा जाता है कि जहां आज मुड़‌मा मेला लगता है, इतिहास के किसी अज्ञात काल में मुड़मा इलाके में मुंडाओं का विस्तार था। बाद में उराँव यहां आए। दोनों नृत्य-संगीत-वाद्य के अनन्य प्रेमी थे। दोनों समूहों में एक शर्त पर सात दिन सात रात मुड़मा अखरा में जतरा का नाच-गान बजान चलता रहा। दोनों में कोई नहीं हारा। अंत में निर्णायकों ने उराँवों को मांदर की कोमल, मधुर, मदिर ध्वनि के कारण विजय घोषित किया। शर्त के अनुसार पराजित समूह मुडमा इलाका छोड़कर अन्यत्र चला जायेगा और विजेता इस इलाके में बस जाएगा। लेकिन उराँवों के निवेदन पर कुछ पहान मुंडा रह गए। आज भी इस इलाके के अनेक गांवों का नाम मुंडारी भाषा का है।


यहाँ के ऐतिहासिक लोक गीतों में मांदर की महता बताने के अनेक गीत हैं। एक तो शिशु के जन्म लेने पर मांदर बजाने की परंपरा है। मांदर बजाकर गांव को सूचित किया जाता है कि गांव में अखरा और मांदर का एक और कलाकार आ गया और वह अपना गान अभी से शुरू कर दिया है। बेटे के जन्म पर घुम-घुमकर मांदर बजाया जाता है। बेटी के जन्म लेने पर मांदर का श्रृंगार कर बजाया जाता है।


बेटी जन्म दियाले गे आयो घुमरी घुमरी मांदर बजाए रे

सपरी सपरी मांदर

बेटी जे जनमाले आयो

अखरा के सोहान करें रे।


झारखण्ड में मांदर का इतिहास अज्ञात होते हुए भी रोचक हैं। मांदर का लोकवाद्य जब शिष्ट वाद्य बना तो इसके अनेक रूप हो गए। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे मांदर की बुनियाद ही है।


झारखण्ड के विभिन्न जाति समूह के गीत एवं नश्त्य में बजाये जाने वाले मांदर :-


1. जशपुरिया मांदर यह मांदर नागपुरी गीतों में उपयोग किया जाता है।


2 कुडुख अथवा गुमला मांदर उराँव गीतों में गुमला मांदर बजाया जाता है, लेकिन कभी-कभी जशपुरिया मांदर के स्थान पर नागपुरी गीत में भी यह मांदर उपयोग में आता है।


3. संथाल मांदर संथाल गीत का सर्वश्रेष्ठ मांदर होता है। संथाली मांदर में दूसरे गीतों का सामंजस्य नहीं होता है।


4. हो मांदर हो गीतों में बजाये जाने वाले मांदर।


5. मुचि (कुरमाली) मांदर इसे कुरमाली और खोरठा गीतों में बजाया जाता है। इस मांदर का बोल गुमला मांदर के बोल से मिलता-जुलता है।


6. खड़िया मांदर इसे खड़िया गीतों में बजाया जाता है। खड़िया मांदर नागपुरी अथवा जशपुरिया मांदर से थोड़ा सा भिन्न है। दोनों के बोल समान रूप से मिलते-जुलते हैं।


ये मांदर विभिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न आकार के है। सदानों का जशपुरिया मांदर लम्बा होता है। मोटाई भाग पर थोड़ा अंदर उभार होता है जिससे फीते सटे होते हैं। वहीं छोटा खड़िया मांदर होता है जिसके उभार में फीते सटे नहीं होते हैं। उरांव मांदर के तुंग भाग एक इंच लगभग अंदर धँसे होते हैं जबकि बाकि सभी मांदर में समतल पर ही चमड़े मढ़े होते हैं। मुंडाओं के मांदर उरांव मांदर से थोड़ा छोटा होता है और 'हो' मांदर इससे भी छोटा होता है। कुरमाली, पंचपरगनिया व खोरठा मांदर की लंबाई बहुत कम होती है लेकिन गोलाई बड़ी होती है। इन तीनों की आकृति भी लगभग समान होती है।"


मांदर झारखण्ड का सर्वाधिक लोकप्रिय वाद्ययंत्र है। इसे लोग पत्नी के समान मानते है। इसे राजवाद्य भी कहा जाता है। झारखण्ड की प्रायः सभी जातियों का अपना-अपना मांदर होता है। बस इसकी आकृति और आकार में विभिन्नता देखने को मिलती है। इसके निर्माण

में प्रयोग की गई खोल मिट्टी, लकड़ी; लोहा या अल्युमिनियम के चादरों से निर्मित किया जाता है। प्रारंभ में इसके निर्माण में मिट्टी या लकडी का बना खोल का ही प्रयोग किया जाता था। मिट्टी से बने होने के कारण यह ढोलक से भी अधिक भारी होता था। ढ़ोलक की तरह इसका खोल एक तरफ पतला तथा दूसरी ओर चौड़ा बनाया जाता है। इस खोल पर पतला चमड़ा मढ़ा जाता है। चमड़े में सबसे उपयुक्त हनुमान बंदर के चमड़े को माना जाता है। लेकिन अब इसकी अनुपलब्धता के कारण बकरी के चमड़े का प्रयोग किया जाने लगा है।


इस लेप के निर्माण में काली मिट्टी और पके हुए चावल (भात) की लाई का प्रयोग किया जाता है। इस लेप को चार से पाँच बार मांदर के दोनों तरफ लगाया जाता है जिससे इसे मजबूती मिल सके। तुंग भाग के प्रत्येक परत को पत्थर की सहायता से घिस कर चिकना किया जाता है।


इसके छोटे मुँह की तरफ जिसे चना या तुंग कहा जाता है: महीन बारीक एवं पतली और चिकनी लेप लगाया जाता है। मांदर के दूसरी तरफ चौड़े भाग पर जिसे डिसना या गद कहा जाता है, मोटा और खुरदरा लेप लगाया जाता है।


मांदर के दोनो तरफ लगे चमड़े को अच्छी प्रकार से कसने के लिए फीता का प्रयोग किया जाता है। यह फीता भी चमड़ा का बना होता हे। इस फीते को लगभग आधा से एक इंच की दूरी पर मोटी बाधी से खींचा जाता है। मांदर को सभी तरफ से फीते की सहायता से कसा जाता है। मोटी बाधी के नीचे दोनों कोरों पर गद्दा एवं ऊँचा उठाने के लिए आधा इंच मोटी रस्सी लगाई जाती है। बड़े मुँह की तरफ पुआल की रस्सी और छोटे मुँह की तरफ चमड़े की रस्सी का रिंग बनाकर इसे अच्छी प्रकार से गोलाई में लगाया जाता है। इसे टांगने के लिए चमड़ा से बना टंगना का प्रयोग किया जाता है। मांदर को आकर्षित एवं सुंदर दिखने के लिए रंगो की सहायता से रंगा भी जाता है।


मांदर के निर्माण में लगाए गए मिट्टी के खोल को बनाने के लिए कुम्हार जाति के लोग बहुत ही सावधानी पूर्वक बनाते है। यह इतना लंबा होता है कि कुम्हार इसे एक बार में नहीं बना सकते है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले खोल के आधे भाग का निर्माण किया जाता है। कुम्हार मांदर के चौड़े भाग का लगभग एक से डेढ़ फीट की लंबाई में निर्मित करता है। वह इसे फिर धूप में सूखने के लिए छोड़ देता है। जब यह हल्का सूख जाता है तब इस पर बने हुए मांदर का ऊपरी हिस्सा अच्छी प्रकार से रख दिया जाता है। यह दोनों भाग अलग-अलग न दिखे इसके लिए वह गेरूआ गिली मिट्टी का प्रयोग कर बीच की दरार को भर देता है। अब इसे अच्छी प्रकार से सूखा दिया जाता है। इस मिट्टी का प्रयोग मांदर के आंतरिक भाग के लिए किया जाता है। इसके बाह्य भाग को पोतनी मिट्टी (चूना मिट्टी) से लेप लगाया जाता है।"   -मनीषा कुमारी

प्रारंभिक काल से संगीत में बाद्यों का विशेष महत्व रहा है। अजन्ता, एलोरा और एलिफेण्टा की चित्रकारी व मोहनजोदड़ों के भग्नावशेष में तथा वेद, उपनिषद् आदि ग्रंथों में विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्रों का प्रयोग हुआ है। भगवान शंकर का प्रिय वाद्ययंत्र डमरू और भगवती सरस्वती का प्रिय वाद्य वीणा मानी गयी है। इससे वाद्ययंत्रों की प्राचीनता का पता चलता है। भारतीय वाद्ययंत्रों को चार प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है तिते सुधिर, अवनद्द तथा घन। यह विभाजन 'संगीत-रत्नाकर' पर आधारित है।

तत् सुषिर अवनद्ध एवं घन। वाद्यतन्त्री ततं वाद्यं सुषिरमतम। चर्मावनद्धवदनमवनद्ध तु वाद्यते। धनोमूर्तिः सार्श्वभधाताद्वधते यंत्र तद्धनम् ।

तत् वाद्य - तत् वाद्य वे है जिनमें तारों द्वारा स्वरों की उत्पत्ति होती है। वाद्य में लगे हुए तारों पर जब प्रहार किया जाता है, तब उसके तार आन्दोलित होते है, जिससे ध्वनि निकलती है। तत् वाद्य को दो भागों में बाँटा जा सकता है- तत् और वितत् ।

तत् वाद्य - तत् वाद्य वे हैं जिनके तारों पर ऑगुलियों एवं मिजराब द्वारा प्रहार किया जाता है। जैसे-तानपूरा, वीणा, सितार, सरोद आदि। वीणा को तत् वाद्य की जननी मानी जाती है।

वितत् वाद्य - वितत् वाद्य वे है, जो गज अथवा कमानी द्वारा बजाये जाते हैं। जैसे सारंगी, इसराज, बेला, आदि।

सुषिर वाद्य - जिन वाद्यों में वायु के प्रवेश से स्वरों की उत्पत्ति होती है, वो सुषिर वाद्य कहलाते है। इन वाद्यों में वायु मुँह के द्वारा पहुँचायी जाती है। जैसे बाँसुरी, शहनाई, क्लेरोनट, बीन आदि। धौंकनी द्वारा भी इन वाद्यों में वायु प्रवेश कराई जाती है। जैसे हारमोनियम।

अवनद्ध वाद्य - जिन वाद्यों में खिंचे हुए चमड़े या कपड़े पर प्रहार करने से ध्वनि उपलब्ध होती है, वे अवनद्ध वाद्य कहलाते है। इन्हें ताल-वाद्य भी कहा जाता है। अवनद्ध वाद्यों में मृदंग, तबला, पखावज, नगाड़ा, डमरू, ढोलक आदि आते है

इसी प्रकार झारखण्ड के वाद्ययंत्रों को भी उपर्युक्त चार भागों में विभाजित किया गया है।

झारखण्ड की संस्कृति में प्रचलित सबसे महत्वपूर्ण वाद्यत्रयों में से मांदर और ढोल है जिनका प्रयोग आदिकाल से ही विभिन्न नामों के रूप में होता आ रहा है।

मांदर

मांदर का शाब्दिक अर्थ है-मृदंग का एक भेद और मृदंग ढोलकी की तरह एक बाजा मुरज होता है। इस प्रकार मांदर, मृदंग, मुरज एक ही प्रकार के वाद्य है। मांदर की प्राचीनता बहुत पुरानी है। नटराज शंकर का डमरू सबसे प्राचीन अवनद्ध वाद्य है, उसी के आधार पर मृदंग की उत्पत्ति हुई। मृदंग की प्राचीनता का प्रमाण ऋग्वेद से मिलता है। इसमें वीणा, मृदंग, वंशी और डमरू का वर्णन आया है। पुरातन काल में मृदंग को पुष्कर वाद्यों की श्रेणी में प्रथम वाद्य कहा जाता था जिसका वर्णन भरत-मत के ग्रंथों में मिलता है। पुष्कर वाद्य देवताओं को बहुत प्रिय था। इसकी ताल के साथ-साथ उनका नृत्य हुआ करता था। इसका प्रमाण अनेक प्राचीन मूर्तियों तथा चित्रों द्वारा मिलता है।

पखावज, मुरज और मर्दल, ये नाम भी मृदग के ही है। इस प्रकार के विभिन्न नाम और उनकी आकृतियों का वर्णन ग्रंथों में मिलता है। मृदंग का विशेष प्रचार दक्षिण भारत में रहा जिसे वहाँ मृदंगम्' कहा जाता है। कुछ समय बाद उत्तर भारत के संगीतज्ञों ने 'मृदंग' से मिलता-जुलता वाद्य बनाकर उसका नाम 'पखावज (पक्ष वाद्य) रखा दिया। पखावज पर उनके कठिन तालों का प्रयोग हुआ करता था। लेकिन जब से तबले का आविष्कार हुआ, मृदंग का प्रचार उत्तर भारत में कम हो गया है।

ऐतिहासिक दृष्टि से मृदंग, मांदर, मुरज आदि का उल्लेख वैदिक साहित्य में प्राप्त नहीं होता। फिर भी जिस प्रकार मांदर, मृदंग आदि का नाम वाल्मीकि रामायण में प्रयुक्त हुआ है उससे यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि रामायणकाल से अनेक वर्षों पूर्व इन वाद्यों का प्रचार हो चुका था। रामायण के अध्ययन से यह पता चलता है कि उस समय अवनद्ध वाद्यों में मांदर, मृदंग का सर्वाधिक प्रचार था।


मांदर का उल्लेख अनेक प्राचीन साहित्यक ग्रंथों में मृदंग के रूप में हुआ है। महाभारत में भी मृदंग के नाम उपलब्ध है। कालिदास के साहित्य में मर्दल, मुरज तथा मृदंग इन तीनों का वर्णन विभिन्न जगहों पर हुआ हैं। महर्षि भरत ने अपनी पुस्तक नाट्यशास्त्र में मृदंग का उल्लेख किया है-


निगदन्ति मृदङ्ग तं मर्दलं मुरजतया। प्रोक्तं मृदङ्ग शब्देन मुनिना पुष्कर त्रयम् ।।


अभिनव गुप्त ने भी मुरज को मृदंग का पर्याय बताया है। महर्षि भरत ने 34वें अध्याय में लिखा है- सुख प्रदान करने वाली मांगलिक होने के कारण इसे मृदंग कहते हैं। मुलायम मिट्टी से बनी हुई होने के कारण इसे मुरज कहते हैं। शारंगदेव ने भी इसे मृदंग का पर्याय माना है।


वैदिक संस्कृत ग्रंथों के पूर्व प्राकृत भाषा प्रचलित थी जिसे संस्कारित कर संस्कृति की कठिनाईयों ने प्रकृति की ओर भाषा का विकास हुआ। नागपुरी भी प्राकृत के ही एक क्षेत्रीय रूप झारखण्डी प्राकृत (अर्द्ध मागधी) में जो मांदर, मांदल आया है इसी लोक भाषा के शब्द बाद में मृदंग बन गए। लालमणि मिश्र का कहना है कि मृदंग का यह नाम प्राकृत भाषा की देन है।


"मांदर किनलो दादा, जनी किनल नियर लागेला । मांदर फूटलो दादा, जनी मोरल तरी लागेला ।


अर्थात् मांदर खरीदने पर पत्नी खरीद लाने का सुख मिलता है, (कन्या मूल्य देने के कारण)। मांदर फूटने पर पत्नी के मर जाने जैसा दुःख होता है। इस प्रकार इस गीत से यह पता चलता है कि झारखण्ड के जनजातीय समाज में मांदर बहुत महत्वपूर्ण वाद्ययंत्र है। प्रायः हर समुदाय का मांदर अपने विशिष्ट स्वरूप में होता है। सबकी बनावट में अंतर भी दृष्टिगत होते है जिसके कारण झारखण्ड को संगीत के पक्ष से मांदर देश कहा जाता है। झारखण्डी संगीत-संसार से मांदर, नगाड़े, बांसुरी गीतों के प्राण कहे गए हैं। इनके बिना झारखण्डी संगीत का आनन्द अधुरा है।


नागपुरी में एक पहेली कही जाती है-


काठ कर घोड़ा, लोहा कर सींग। माइर दे मृदंग, बाजे धातिंग तिंग ।।


अर्थात् ढेकी। यहां ढेकी की "ढेकुर चा" की आवाज को मृदंग के धातिंग लिंग ध्वनि से बताया गया है और यह ध्वनि धातिंग तिंग यहां की ताल या ध्वनि है। इस तरह इससे मृदंग और मांदर की निकटता का पता चलता है। नागपुरी में मृदंग का प्रयोग न कर मांदर का उपयोग किया जाता है।


मांदर पूरे झारखण्ड का सर्वप्रिय वाद्य है और इसकी ताल इसकी गूँज लोगों को दिवाना बना देती हैं। अखरा से मांदर की आ‌ह्वान ताल बजा कर किया जाता है। झारखण्ड में शायद ही ऐसा कोई घर हो चाहे वो सदान का हो या आदिवासी का, जहाँ मांदर खूँटी पर टंगा न हो। मांदर अखरा की शान है। इसके बिना अखरा जागता नहीं। अखरा को जगाने के लिए मांदर की ताल को बजाया जाता है। मांदर का जादू अखरा में ही देखने को मिलती है जब मांदर वादक (मंदरिका) झूम-झूम कर मांदर बजाता है।


"जने जने मांदर बाजे । चले हो तने तने जाब। छउवा पुता भेबै डाँवा डोल।"

 अर्थात् जहाँ-जहाँ मांदर बजता है चलो प्रिय वहाँ यहाँ चलें। बच्चे भले ही डाँया डोल हो आएँ हृदय डौंवाडोल न हो। इस प्रकार जब मांदर बजता है तो लोगों के तन-मन को झंकृत कर देता है।'


झारखण्ड का मांदर पूरब में मृदंग और पश्चिम में पखावज के रूप में परिवर्तित हो गया। पखावज भी मांदर के नजदीक का वाद्य यंत्र है। तभी वसंत लिखित संगीत विशारद कहा है-पखावज, मुरज और मर्दल ये नाम भी मृदंग के ही हैं। इसके अलावा मृदंग का विशेष प्रचार दक्षिण भारत में रहा। कुछ समय बाद उत्तर भारत के संगीतज्ञों ने मृदंग का मिलता-जुलता प्रकार बनाकर इसका नाम पखावज कर लिया। इस संबंध में कृष्ण दास के पद देखे जा सकते है गिड़िगिड़ितों धितों धितों मन्दिलरा बाजै", इस तरह संगीत रत्नाकार में वर्णित मर्दल से ही मादल और मन्दिलरा शब्द बनें।


मांदर से मिलते-जुलते वाद्य है मृदंग, मुरज, मर्दल, मंदिलरा, मादल। मांदर की उत्पत्ति के बारे में कहा जा सकता है कि झारखण्ड का मांदर तो आदिवासी सदान अर्थात् पुराने निवासियों का लोकप्रिय वाद्य रहा है। आगे चलकर विकसित सभ्यता आर्य समाज ने इस लोकवाद्य मांदर को उपर्युक्त रूपों में विकसित किया। मांदर की उत्पत्ति का इतिहास तो झारखण्ड में भी अज्ञात है। यह इतिहास के अज्ञात काल से बजता और लोगों को रिझाता आ रहा है।"


ऐसा कहा जाता है कि जहां आज मुड़‌मा मेला लगता है, इतिहास के किसी अज्ञात काल में मुड़मा इलाके में मुंडाओं का विस्तार था। बाद में उराँव यहां आए। दोनों नृत्य-संगीत-वाद्य के अनन्य प्रेमी थे। दोनों समूहों में एक शर्त पर सात दिन सात रात मुड़मा अखरा में जतरा का नाच-गान बजान चलता रहा। दोनों में कोई नहीं हारा। अंत में निर्णायकों ने उराँवों को मांदर की कोमल, मधुर, मदिर ध्वनि के कारण विजय घोषित किया। शर्त के अनुसार पराजित समूह मुडमा इलाका छोड़कर अन्यत्र चला जायेगा और विजेता इस इलाके में बस जाएगा। लेकिन उराँवों के निवेदन पर कुछ पहान मुंडा रह गए। आज भी इस इलाके के अनेक गांवों का नाम मुंडारी भाषा का है।


यहाँ के ऐतिहासिक लोक गीतों में मांदर की महता बताने के अनेक गीत हैं। एक तो शिशु के जन्म लेने पर मांदर बजाने की परंपरा है। मांदर बजाकर गांव को सूचित किया जाता है कि गांव में अखरा और मांदर का एक और कलाकार आ गया और वह अपना गान अभी से शुरू कर दिया है। बेटे के जन्म पर घुम-घुमकर मांदर बजाया जाता है। बेटी के जन्म लेने पर मांदर का श्रृंगार कर बजाया जाता है।


बेटी जन्म दियाले गे आयो घुमरी घुमरी मांदर बजाए रे

बेटी जे जनमाले आयो

अखरा के सोहान करें रे।

झारखण्ड में मांदर का इतिहास अज्ञात होते हुए भी रोचक हैं। मांदर का लोकवाद्य जब शिष्ट वाद्य बना तो इसके अनेक रूप हो गए। लेकिन इनकी उत्पत्ति के पीछे मांदर की बुनियाद ही है।

झारखण्ड के विभिन्न जाति समूह के गीत एवं नश्त्य में बजाये जाने वाले मांदर :-

1. जशपुरिया मांदर यह मांदर नागपुरी गीतों में उपयोग किया जाता है।

2 कुडुख अथवा गुमला मांदर उराँव गीतों में गुमला मांदर बजाया जाता है, लेकिन कभी-कभी जशपुरिया मांदर के स्थान पर नागपुरी गीत में भी यह मांदर उपयोग में आता है।

3. संथाल मांदर संथाल गीत का सर्वश्रेष्ठ मांदर होता है। संथाली मांदर में दूसरे गीतों का सामंजस्य नहीं होता है।

4. हो मांदर हो गीतों में बजाये जाने वाले मांदर।

5. मुचि (कुरमाली) मांदर इसे कुरमाली और खोरठा गीतों में बजाया जाता है। इस मांदर का बोल गुमला मांदर के बोल से मिलता-जुलता है।

6. खड़िया मांदर इसे खड़िया गीतों में बजाया जाता है। खड़िया मांदर नागपुरी अथवा जशपुरिया मांदर से थोड़ा सा भिन्न है। दोनों के बोल समान रूप से मिलते-जुलते हैं।

ये मांदर विभिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न आकार के है। सदानों का जशपुरिया मांदर लम्बा होता है। मोटाई भाग पर थोड़ा अंदर उभार होता है जिससे फीते सटे होते हैं। वहीं छोटा खड़िया मांदर होता है जिसके उभार में फीते सटे नहीं होते हैं। उरांव मांदर के तुंग भाग एक इंच लगभग अंदर धँसे होते हैं जबकि बाकि सभी मांदर में समतल पर ही चमड़े मढ़े होते हैं। मुंडाओं के मांदर उरांव मांदर से थोड़ा छोटा होता है और 'हो' मांदर इससे भी छोटा होता है। कुरमाली, पंचपरगनिया व खोरठा मांदर की लंबाई बहुत कम होती है लेकिन गोलाई बड़ी होती है। इन तीनों की आकृति भी लगभग समान होती है।"

मांदर झारखण्ड का सर्वाधिक लोकप्रिय वाद्ययंत्र है। इसे लोग पत्नी के समान मानते है। इसे राजवाद्य भी कहा जाता है। झारखण्ड की प्रायः सभी जातियों का अपना-अपना मांदर होता है। बस इसकी आकृति और आकार में विभिन्नता देखने को मिलती है। इसके निर्माण में प्रयोग की गई खोल मिट्टी, लकड़ी; लोहा या अल्युमिनियम के चादरों से निर्मित किया जाता है। प्रारंभ में इसके निर्माण में मिट्टी या लकडी का बना खोल का ही प्रयोग किया जाता था। मिट्टी से बने होने के कारण यह ढोलक से भी अधिक भारी होता था। ढ़ोलक की तरह इसका खोल एक तरफ पतला तथा दूसरी ओर चौड़ा बनाया जाता है। इस खोल पर पतला चमड़ा मढ़ा जाता है। चमड़े में सबसे उपयुक्त हनुमान बंदर के चमड़े को माना जाता है। लेकिन अब इसकी अनुपलब्धता के कारण बकरी के चमड़े का प्रयोग किया जाने लगा है।

इस लेप के निर्माण में काली मिट्टी और पके हुए चावल (भात) की लाई का प्रयोग किया जाता है। इस लेप को चार से पाँच बार मांदर के दोनों तरफ लगाया जाता है जिससे इसे मजबूती मिल सके। तुंग भाग के प्रत्येक परत को पत्थर की सहायता से घिस कर चिकना किया जाता है।

इसके छोटे मुँह की तरफ जिसे चना या तुंग कहा जाता है: महीन बारीक एवं पतली और चिकनी लेप लगाया जाता है। मांदर के दूसरी तरफ चौड़े भाग पर जिसे डिसना या गद कहा जाता है, मोटा और खुरदरा लेप लगाया जाता है।

मांदर के दोनो तरफ लगे चमड़े को अच्छी प्रकार से कसने के लिए फीता का प्रयोग किया जाता है। यह फीता भी चमड़ा का बना होता हे। इस फीते को लगभग आधा से एक इंच की दूरी पर मोटी बाधी से खींचा जाता है। मांदर को सभी तरफ से फीते की सहायता से कसा जाता है। मोटी बाधी के नीचे दोनों कोरों पर गद्दा एवं ऊँचा उठाने के लिए आधा इंच मोटी रस्सी लगाई जाती है। बड़े मुँह की तरफ पुआल की रस्सी और छोटे मुँह की तरफ चमड़े की रस्सी का रिंग बनाकर इसे अच्छी प्रकार से गोलाई में लगाया जाता है। इसे टांगने के लिए चमड़ा से बना टंगना का प्रयोग किया जाता है। मांदर को आकर्षित एवं सुंदर दिखने के लिए रंगो की सहायता से रंगा भी जाता है।

मांदर के निर्माण में लगाए गए मिट्टी के खोल को बनाने के लिए कुम्हार जाति के लोग बहुत ही सावधानी पूर्वक बनाते है। यह इतना लंबा होता है कि कुम्हार इसे एक बार में नहीं बना सकते है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले खोल के आधे भाग का निर्माण किया जाता है। कुम्हार मांदर के चौड़े भाग का लगभग एक से डेढ़ फीट की लंबाई में निर्मित करता है। वह इसे फिर धूप में सूखने के लिए छोड़ देता है। जब यह हल्का सूख जाता है तब इस पर बने हुए मांदर का ऊपरी हिस्सा अच्छी प्रकार से रख दिया जाता है। यह दोनों भाग अलग-अलग न दिखे इसके लिए वह गेरूआ गिली मिट्टी का प्रयोग कर बीच की दरार को भर देता है। अब इसे अच्छी प्रकार से सूखा दिया जाता है। इस मिट्टी का प्रयोग मांदर के आंतरिक भाग के लिए किया जाता है। इसके बाह्य भाग को पोतनी मिट्टी (चूना मिट्टी) से लेप लगाया जाता है।"

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