हरीवंश नारायण सिंह (हरिवंश के नाम से चर्चित) एक भारतीय पत्रकार और राजनीतिज्ञ हैं। हरिवंश ने देश के सामने सामाजिक सरोकार से जुड़ी निष्पक्ष, जमीनी, प्रतिबद्ध और रचनात्मक पत्रकारिता का मॉडल पेश किया। देशभर में मूल्यों और जन सरोकार की पत्रकारिता के लिए आपकी पहचान है। आप एक प्रखर वक्ता, लेखक और विचारक हैं। हरिवंश वर्तमान में राज्यसभा के उपसभापति हैं। आप दूसरी बार इस पद के लिए चुने गए हैं।
आपका जन्म 30 जून, 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिताब दियारा गाँव में हुआ, जिसे ‘जेपी (जयप्रकाश नारायण)’ के गाँव के नाम से जाना जाता है। आपके पिता बाँके बिहारी सिंह एवं माता देवकी देवी का स्वर्गवास हो चुका है। आशा सिंह आपकी जीवनसंगिनी हैं। आपकी पढ़ाई की शुरुआत गाँव के स्कूल में हुई। जयप्रकाश नारायण के नाम पर बने हाईस्कूल से मैट्रिक किया। इंटर की पढ़ाई के लिए बनारस के उदयप्रताप कॉलेज में दाखिला हुआ। बी.ए. यू. (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) से स्नातक व अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई की। फिर बी.ए.यू. के ही पत्रकारिता विभाग से डिप्लोमा स्तरीय प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। बी.एच.यू. में छात्र राजनीति में सक्रिय रहे।
जेपी आंदोलन, छात्र राजनीति का असर और पढ़ने-लिखने की आदत से देश व समाज के प्रति आपकी पत्रकारिता में आना हुआ। सक्रिय पत्रकारिता की शुरुआत ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ समूह से हुई। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ समूह में ट्रेनिंग जर्नलिस्ट के रूप में चयन हुआ। फिर उसी समूह की हिंदी पत्रिका ‘धर्मयुग’ में उप-संपादक के रूप में सन 1977-1981 तक कार्य किया। ‘धर्मयुग’ में धर्मवीर भारती से लेकर गणेश मंत्री जैसे पत्रकारों का सानिध्य और मार्गदर्शन मिला। इस तरह पत्रकारिता को बुनियादी और सरोकार का पाठ सीखने का अवसर करियर के आरंभिक दिनों में ही मिला। फिर आपने सन 1981 में सन 1984 तक बैंक ऑफ इंडिया, हैदराबाद व पटना में अधिकारी के रूप में कार्य किया। मन पत्रकारिता में रमा था, सो लौटकर ‘आनंद बाजार पत्रिका समूह’ की हिंदी पत्रिका ‘रविवार’ में सहायक संपादक के तौर पर सन 1985-1989 तक कार्य किया। हरिवंश की पत्रकारिता के करियर में अहम और सबसे लंबा पड़ाव बना।
प्रभात खबर’। आप अक्टूबर, 1989 में राँची से प्रकाशित अखबार ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक बने। आपने ही साल जब चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने आपकी पीएमओ से जुड़ने का प्रस्ताव दिया। अतिरिक्त सूचना सलाहकार (संयुक्त सचिव स्तर का पद) के रूप में आप दिसंबर, 1990 से जून, 1991 तक पीएमओ से जुड़े रहे। चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री पद से हटते ही वहीं से इस्तीफा देकर आपने सन 1991 में पुनः ‘प्रभात खबर’ में वापसी की। तब से जून, 2016 तक आप अखबार में प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत रहे। जब आप ‘प्रभात खबर’ से जुड़े, जिसके भविष्य को लेकर तब अनेक अटकलें लगाई जा रही थीं, से जुड़े तब अपने प्रबंधकीय कौशल और प्रयास से पहले इसे राँची से स्थापित किया और फिर इसे हिंदी पट्टी का सर्वश्रेष्ठ व्यावसायिक अखबार बना दिया। यह सफलता कम संसाधनों के बावजूद आपने हासिल कर दिखाई।
आप एक प्रयोगधर्मी पत्रकार रहे और ‘प्रभात खबर’ को आपने पत्रकारिता की प्रयोग भूमि बनाया। आपके प्रयोग के मूल में नैतिकता और प्रतिबद्धता के भाव रहे। आपने अपनी गति और सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। अवसरवादिता से दूर रहे और संस्थान व सहकर्मियों के साथ विश्वास का नाता जोड़ा। ‘प्रभात खबर’ को बोलचाल की सजीव हिंदी का आंदोलन बनाया और इसके माध्यम से आंदोलन की जमीन तैयार करने में मदद करती रही। यही कारण है कि झारखंड समेत पूरे देश के अनेक ऐतिहासिक अखबार से जुड़े रहे। हरिवंश स्वयं में तो आंदोलन नहीं थे, पर इसके पीछे आपकी भावना सदैव दो परिवर्तन और निर्माण की रही।
आपने हिंदी पत्रकारिता को जन-सरोकार से जोड़ा और इसके लिए आपने अखबार में जन-सरोकार की भाषा का प्रयोग किया। आपके आने के बाद ‘प्रभात खबर’ में आदिवासी, वंचित एवं अशिक्षित लोगों के मुद्दों को काफी जगह मिलने लगी, जिससे इन सबसे जुड़े आंदोलनों को गति मिली। यह आपकी विशेषता रही कि पूंजीवादी व्यवस्था से बाहर रहकर भी आप लोगों के जीवन की बेहतरी के लिए आपने राजनीतिक और सामाजिक चेतना को बढ़ावा दिया। झारखंड में साक्षरता आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए आपने आदि को ‘प्रभात खबर’ के साथ लेकर ‘अक्षर झारखंड कार्यक्रम’ की आगाजिला रखी।
जनपक्षीय पत्रकारिता की, जनमुद्दों को चिन्हित करने की, उन्हें पुकार तरीके से उठाने, उसे दिशा देने और जनसरोकार को हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा का विषय बनाने में आपने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दिशा में राज्य भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘घूस को घूँसा’, ‘झारखंड पीपुल्स असेम्बली’, दुमका के जनजातीय क्षेत्र में किसानों, ग्रामीणों के लिए चापाकल व बाँध की आपने पहली पहल की। पत्रकारिता में मूल्यों और सिद्धांतों के विचलन के इस युग में आपने संपादक पद की संस्था गरिमा को नई ऊँचाई दी।
‘प्रभात खबर’ को किसी विचारधारा का मुखपत्र नहीं बनने दिया। खुद समाजवादी विचारधारा के होकर भी अखबार में इसका या किसी एक विचारधारा का पक्ष नहीं लिया। अखबार को सिर्फ एक सामाजिक-व्यावसायिक मंच ही बनाए रखा और पत्रकारिता के मूल्यों पर कभी आँच नहीं आने दी। अपनी प्रगतिशील दृष्टि की बदौलत ही आप ‘प्रभात खबर’ को एक क्षेत्रीय अखबार से राष्ट्रीय महत्व का अखबार बनाने में सफल रही। आपकी जनसरोकार की पत्रकारिता ने झारखंड के क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय पत्रकारिता का बड़ा विषय बना दिया और इस पर काफी चर्चा हुई। आप देश में क्षेत्रीय पत्रकारिता के प्रतीक बन गए। अखबारों की दुनिया में झारखंड का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अंकक्षण करने का काम पहली बार ‘प्रभात खबर’ ने किया। इस अंकक्षण में भ्रष्टाचार, विकास, प्रशासन, संस्कृति वगैरह पर विशेष अध्ययन कराया गया। आपने ‘झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट’ प्रकाशित कराई, जिसे विकास की भाषा को आमतौर समझ सके और जान सके कि राज्य विकास के पैमाने पर कहाँ खड़ा है? विकास के प्रति नागरिक समाज को विकसित करने और जनता को इस विषय पर सत्ता से बेबाक हस्तक्षेप करने का यह नायाब प्रयोग था। ‘झारखंड डेवलपमेंट रिपोर्ट’ पर विख्यात समाजशास्त्री प्रो. रजनी कोठारी ने कहा— “यह अद्भुत काम है। ऐसा कहीं नहीं हो रहा है।”
मूल्य-आधारित पत्रकारिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और विज्ञापन के नाराज होने का जोखिम लेने के साहस ने आपकी पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्ट बनाया। आपने सरकार की विफलता को उजागर करने और परिणामस्वरूप सरकार के द्वारा बनाए गए दबाव को झेलने का साहस दिखाया। घोटालों, गड़बड़ियों को पूरी तत्परता और तीव्रता से आम जनता के सामने लाते रहे। आदिवासी बहुल इलाके में वर्षों से चल रहे चारा घोटाले का पता सबको था पर उसे उजागर करने का जोखिम आपने उठाया। आपने नदी, पहाड़, जमीन और सरकारी कारखानों की लूट के प्रकरण उठाए, जिनमें सीबीआई जाँच बैठी। यह ‘प्रभात खबर’ के अभियान का असर था कि सरकार कंपनियों के हजारों एकड़ कब्जे से मुक्त हुए। सन 1992 में आपने ‘प्रभात खबर’ के द्वारा ‘भारत किधर’ व्याख्यानमाला शुरू की, जिसमें वर्ष दर वर्ष देश की अनेक प्रभावशाली हस्तियों ने अपने विचार साझा किए।
आदिवासी समाज के प्रति आपके मन में गहरा सम्मान रहा है। आपके मन में आदिवासी जीवन-मूल्यों, उनके संघर्ष की चेतना और स्वाभिमान तथा सांस्कृतिक संवेदना के प्रति आदर का भाव रहा है। ‘रविवार’ में रहते हुए आपने धनबाद के कोल माफिया से लेकर राँची के आदिवासी इलाकों की दुर्दशा पर कई स्टोरी की, जो चर्चित हुईं। आप ‘रविवार’ में रहते हुए झारखंड के बारे में लिखते रहे। झारखंड आंदोलन, छोटानागपुर में हो रहे चर्चों पर भी आपने ‘रविवार’ में कई स्टोरी की। आपने आदिवासी इलाकों में व्याप्त आर्थिक अपराध और अंतहीन शोषण के विरुद्ध खुलकर कलम चलाई। आपने ‘प्रभात खबर’ के माध्यम से आदिवासी समाज और संस्कृति से संबंधित विषय ही नहीं उठाए, बल्कि आदिवासी समाज में लेखकों और पत्रकारों की पौध तैयार की।0n
झारखंड अलग राज्य आंदोलन को आपने बौद्धिक शक्ति, गति व दिशा दी। झारखंड अलग राज्य आंदोलन में आपने खुलकर वैचारिक रूप से भागीदारी की। राज्य निर्माण के बाद सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में आपने अपने लेखन से सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाई।
आपको झारखंड सरकार द्वारा राज्य योजना आयोग का अध्यक्ष, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल, मध्य प्रदेश का कुलपति, कई बड़े अखबारों से प्रधान संपादक बनने जैसे प्रस्ताव मिले। सन 2010 में आपको भाजपा से राज्यसभा का प्रस्ताव भी मिला। पर आप ऐसे बड़े-बड़े प्रस्तावों को नकारते रहे और ‘प्रभात खबर’ को ही अपना मिशन बनाकर चले। आपके संघर्ष की राह चुनी। आपका संघर्ष भी दो मोर्चों पर था— अखबार के अस्तित्व को बचाना और साथ ही साथ पत्रकारिता के मूल्यों का संरक्षण और संवर्धन भी करना। हरिवंश ने अखबार की पूँजी के रूप में धन के अलावा श्रम, मानव और विचार को भी स्थान दिया। आपने अपनी टीम पर भरोसा किया और उसे लिखने की स्वतंत्रता दी। आप अखबार में सुधार के लिए लगातार रचनात्मक रहे और आलोचनाओं पर गौर किया। उल्लेखनीय है कि सन 1995 में एक पाठक के रूप में मेरे द्वारा भेजे गए एक शिकायत पत्र का स्वागत करते हुए आपने न सिर्फ उसका जवाब दिया, वरन मिलने के लिए आमंत्रित भी किया।
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हरिवंश का पत्रकारिता, राजनीति और सामाजिक…


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