मानव अधिकार की रक्षा में असफल धोनेशक अगर झारखंड सरकार
Protect Human Rights or Face Punishment: Jharkhand Government Under Scrutiny"
एशिया में मानव अधिकार की सुरक्षा एवं प्रोमोशन के लिये समर्पित The Asian Centre for Human Rights के अनुसार झारखंड राज्य लोगों के मानव अधिकार की रक्षा में बुरी तरह असफल रहा है। इस संस्था द्वारा प्रकाशित 2008 की रिपोर्ट के कुछ अंश इस प्रकार हैं। नक्सलवादी और सुरक्षा बल दोनों ही मानव अधिकारों के हनन के लिये उत्तरदायी हैं साथ ही वे गैर न्यायिक हत्याओं और प्रताड़ना के लिये भी जिम्मेदार हैं। माओवादियों ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को लक्ष्य किया है। जुलाई 2007 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने खुलासा किया कि लगभग 84,000 मानव अधिकार उल्लंघन की घटनायें घटीं जिसमें से 3000 घटनायें केवल झारखंड में घर्टी। फिर भी झारखंड सरकार ने. राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन नहीं किया। इधर आदिवासी मानव अधिकार उल्लंघन की घटनाओं से दिन-ब-दिन प्रताड़ित होते रहे। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के रिकार्ड के अनुसार 2006 में केवल झारखंड में आदिवासियों के विरूद्ध कुल 332 अपराधिक घटनायें हुई। फर्जी मुकदमों के तहत (आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया। उनका गुनाह सिर्फ यह था कि वे झारखंड में लघु वनोपज जमा करने के लिये जंगल गये थे। आदिवासियों ने राष्ट्रीय वन कानून के तहत जमीन पर अधिकार जताया तो उनके खिलाफ 12 अगस्त 2007 तक में राज्य के वन विभाग ने कुल 12,000 मुकदमा ठोंक दिया। गाणा सुरक्षाबलों द्वारा मानव अधिकार के उल्लंघनों की फेहरिस्त लंबी है। उन्होंने जीवन के अधिकार का ही उल्लंघन किया। 01 अप्रैल 2006 से 31 मार्च 2007 के बीच राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने केवल झारखंड के पुलिस हिरासत में मृत्यु के तीन केस पाये हैं। इसी दरिम्यान पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की दो घटनाओं का भी वर्णन है। मनमाना गिरफ्तारी, अवैध हिरासत एवं प्रताड़ना की घटनाओं में भी वृद्धि हुई। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने 01 अप्रैल 2006 से 31 मार्च 2007 के बीच अवैध गिरफ्तारी की दो घटनायें, दो गैर कानूनी नजरबंदी, एक गुम हो जाने का केस और 128 पुलिस ज्यादतियों के केस केवल झारखंड में पाये हैं। कुल 144 केसों में पुलिस ने ध्यान ही नहीं दिया। कई बार पुलिस ने आरोपी व्यक्तियों को सवाल-जवाब करते समय सताया है। जिन प्रकाELE
अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन भी माओवादियों ने खूब किया है। झारखंड पुलिस द्वारा तैयार रिपोर्ट के अनुसार माओवादियों द्वारा मारे गये 70 प्रतिशत लोग आदिवासी एवं दलित समुदाय से आते हैं। जनवरी और सितंबर 2007 के बीच माओवादियों ने 28 नागरिकों की हत्या की है। राजनीतिज्ञ और पुलिस के लिये मुखबिरी करने वाले विशेष रूप से निशाने पर रहे हैं। माओवादियों ने पुलिस के लिये सूचना पहुंचाने वालों की हत्या करना जारी रखा है। माओवादी न्याय को थोपने के लिये जन अदालत लगातार जारी है। माओवादियों ने सार्वजनिक सम्पतियों को नुकसान पहुंचाया है।
झारखंड की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण न्याय विलम्ब से मिल रहा है। एक जनवरी 2008, की स्थिति के मुताबिक झारखंड उच्च न्यायालय में 11 जजों के स्थान रिक्त थे जबकि कुल 20 जजों की व्यवस्था होनी चाहिये। 30 सितंबर 2007 की स्थिति के अनुसार जिलों एवं अधीनस्थ न्यायालयों में जजों की संख्या 503 होनी चाहिये जिसमें से कुल 66 सीटें खाली थीं। झारखंड उच्च न्यायालय में कुल 49,276 मुकदमें लम्बित हैं जबकि जिलों एवं अधीनस्थ न्यायालयों में कुल 2,63,907 केस लम्बित हैं।
झारखंड की न्याय प्रणाली में आदिवासी प्रतिनिधित्व का नितांत अभाव है। जीभि कि आदिवासी पूरे राज्य की जनसंख्या का एक तिहाई है। झारखंड के उच्च न्यायालय में और जिला के न्यायालय में भी एक भी आदिवासी नहीं है। झारखंड उच्च न्यायालय के वकीलों के संघ के अनुसार कुल 1,836 कार्यरत वकीलों में से 300 वकील आदिवासी, हरिजन अल्पसंख्यक और महिला हैं। राजकीय न्यायिक सेवा में लगभग 430 अफसर हैं लेकिन एक भी आदिवासी अफसर नहीं है। यहां गौरतलब है कि राज्य द्वारा नियुक्त न्यायिक पदाधिकारी भी कई न्यायालयों के साथ-साथ उच्च न्यायालय में बहस कर सकता है। अपराध रिकार्ड की राष्ट्रीय ब्यूरो के अनुसार 2006 में झारखंड राज्य में 332 केस आदिवासियों के विरूद्ध में लगाये गये।
इनमें से 13 हत्या 21 बलात्कार, 13 अपहरण, 91 केस हरिजन आदिवासी उत्पीडन एक्ट 1989 के तहत है। झारखंड सरकार की संवेदनहीनता के कारण आदिवासियों की स्थिति बहुत दयनीय है। सबर आदिवासी जो छोटानागपुर पठार के सबसे पुराने आदिवासी हैं अब समाप्त हो जाने के कगार में है। फरवरी 2007 में ली गयी जानकारी के अनुसार डारीसाई गांव में अब केवल 11 सबर परिवार हैं जिसमें 47 व्यक्ति हैं जबकि एक समय उसी गांव में 200 परिवार रहते थे।
भूमि हस्तांतरण और विस्थापन परगना काश्तकारी अधिनियम हैं जो आदिवासी भूमि को गैर आदिवासियों के लिये बेचने से रोकते हैं - झारखंड में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संताल लेकिन इसके बावजूद झारखंड में भूमि हस्तांतरण का मामला बहुत बढ़ गया है। वर्ष 2003-2004 में Special Area Regulation Court (एस.ए.आर. कोर्ट) के तहत आदिवासियों ने कुल 2,608 मुकदमें दर्ज किये जो 2004-2005 में बढ़कर 2657 हो गया और इससे भी कहीं अधिक 3230 मामले 2005-2006 में हो गये। जनवरी 2007 में कुल 3789 मामले एस.ए.आर. कोर्ट में दायर किये गये।
आदिवासियों की भूसंबंधी मुकदमों को लड़ने के लिये जानकार वकीलों की भारी कमी है जिसके कारण मुकदमा का निपटारा जल्दी नहीं हो पाता है। मार्च 2007 के रिकार्ड के अनुसार झारखंड के जिला कोर्ट में ही कुल 5,500 भूसंबंधी मुकदमें लंबित थे। झारखंड सरकार के वार्षिक बजट में गरीब आदिवासियों के लिये कानूनी सहायता उपलब्ध करने के लिये 50 लाख देने का प्रावधान है। फिर भी पिछले छह वर्षों में बजट में पास किये गये कानूनी अनुदान का 10 प्रतिशत से कम खर्च किया गया। सरकारी सहायता से मुकदमा लड़ने वाले आदिवासियों का केस लेने से वकील पीछे हट जाते थे। भूसंबंधी मुकदमों के कोर्ट में लंबित रहने का कारण प्रतिकेस 5000 रुपया मात्र देने का सरकारी प्रावधान भी एक कारण है।
फरवरी 2007 में उच्चतम न्यायालय ने एक आदिवासी आवेदक को एक माइनिंग कंपनी से अपनी जमीन वापस लेने हेतु पुनः आवेदन देने के लिये अनुमति दिया। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि झारखंड उच्च न्यायालय ने सुरेन्द्र देहरी नामक आदिवासी के केस को खारिज करके गलत किया है। सुरेन्द्र देहरी ने आरोप लगाया है कि माइनिंग कंपनी ने सरकार के साथ मिली भगत करके 10,000 एकड़ आदिवासी जमीन को हड़प लिया है। इस केस को हाइकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वार्थ का मामला बताकर खारिज किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बी.एन. अग्रवाल और पी.पी. नावलेकर की बेंच ने कहा कि आदिवासियों को दिये गये संवैधानिक गारंटी का एक स्पष्ट उल्लंघन को निजी स्वार्थ के मामले से नहीं जोड़ा जा सकता है।
झारखंड के आदिवासी राष्ट्रीय पनबिजली निगम द्वारा प्रस्तावित कोईल-कारो पन बिजली परियोजना का विरोध कर रहे हैं। यदि यह परियोजना साकार होती है तो आदिवासियों के 256 गांव डूबेंगे जिसमें50,000 एकड़ जंगल एरिया, 40,000 एकड़ कृषि भूमि, 300 सरना स्थल, 175 तिरुजावर और 120 मंदिर हैं।
वन कानून के तहत दमन- लघु वनोपज जमा करने के लिये जंगल जाते आदिवासियों को डराया धमकाया जाता है। उन्हें गाली-गलौज और गिरफ्तार भी किया जाता है। 12 अगस्त 2007 की स्थिति के अनुसार आदिवासियों पर 12,000 मुकमा राज्य वन विभाग ने दायर किया है। आदिवासियों द्वारा राष्ट्रीय वन कानून के तहत भूसंपत्ति पर अपना मालिकाना दावा करने के कारण इस तरह के मुकदर्मी की वृद्धि हुई है|
12 अगस्त 2007 को झारखंड सरकार ने वन विभाग द्वारा मुकदमे में फेररावे गये सभी आदिवासियों को जेल से मुक्त करने और उन सभी किसानों को मुआवजा देने कहा जिनके खेत में वन विभाग ने जबरदस्ती वृक्षारोपण किया था।
महिलाओं पर भी हिंसा जारी रहा और बलात्कार एवं दहेज, हत्या जैसी घटनाओं में भी झारखंड आगे है। अपराध रिकार्ड के राष्ट्रीय ब्यूरो के अनुसार 2006 में कुल 2979 महिला हिंसा के मामले दर्ज हुए। इनमें से 799 बलात्कार, 410 अपहरण और अगवा, 281 दहेज हत्या, 668 दहेज के लिये प्रताड़ना, 414 छेड़छाड़ के मामले हैं। इसके अलावा 11 मामले अनैतिक मानव व्यापार से जुड़े हैं। सुरक्षा बल महिलाओं और बच्चों पर हिंसा के लिये ज्यादा जिम्मेदार हैं। आदिवासी महिलाएं, अधिक बलात्कार की शिकार बनीं।
झारखंड में 2006 में बच्चों के विरुद्ध 42 अपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें से 9 हत्या, 28 बलात्कार और ।। मामला अपहरण और अगवा के हैं। बच्चों की सुरक्षा एवं हित का उल्लंघन होता रहा। बच्चों को घर एवं अनाथालय में प्रताड़ित होना पड़ा। सुरक्षा बलों द्वारा विद्यालय भवन का अतिक्रमण करके कब्जा किया गया जिसके कारण विद्यालय नक्सलियों के टारगेट में आ गये। अप्रैल 2007 की स्थिति में 25 विद्यालयों में सुरक्षा बलों का कैम्प था। पिछले पांच वर्षों में कई विद्यालय बंद हो गये और 12,000 विद्यार्थी बुरी तरह प्रभावित हुए। 1990 से छत्तरपुर मिडिल स्कूल बंद है। बहुत बार विद्यार्थी खुले आसमान में ही पठन-पाठन का कार्य करते हैं।
Jharkhand Government Will Face Consequences If Human Rights Are Not Protected
Failure to Protect Human Rights Could Cost the Jharkhand Government Dearly
Human Rights Protection in Jharkhand: Government May Face Action for Negligence
Jharkhand Government Under Pressure to Safeguard Human Rights
Ignoring Human Rights Violations Could Lead to Punishment for Jharkhand Government
Human Rights at Risk: Jharkhand Government Warned of Consequences
Will the Jharkhand Government Be Held Accountable for Human Rights Failures?
Protect Human Rights or Face Punishment: A Warning to the Jharkhand Government
Jharkhand Government's Responsibility to Protect Human Rights Under Scrutiny
Human Rights Violations in Jharkhand: Government Accountability in Focus
मानव अधिकार की रक्षा में असफल धोनेशक अगर झारखंड सरकार
Protect Human Rights or Face Punishment: Jharkhand Government Under Scrutiny"
एशिया में मानव अधिकार की सुरक्षा एवं प्रोमोशन के लिये समर्पित The Asian Centre for Human Rights के अनुसार झारखंड राज्य लोगों के मानव अधिकार की रक्षा में बुरी तरह असफल रहा है। इस संस्था द्वारा प्रकाशित 2008 की रिपोर्ट के कुछ अंश इस प्रकार हैं। नक्सलवादी और सुरक्षा बल दोनों ही मानव अधिकारों के हनन के लिये उत्तरदायी हैं साथ ही वे गैर न्यायिक हत्याओं और प्रताड़ना के लिये भी जिम्मेदार हैं। माओवादियों ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को लक्ष्य किया है। जुलाई 2007 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने खुलासा किया कि लगभग 84,000 मानव अधिकार उल्लंघन की घटनायें घटीं जिसमें से 3000 घटनायें केवल झारखंड में घर्टी। फिर भी झारखंड सरकार ने. राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन नहीं किया। इधर आदिवासी मानव अधिकार उल्लंघन की घटनाओं से दिन-ब-दिन प्रताड़ित होते रहे। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के रिकार्ड के अनुसार 2006 में केवल झारखंड में आदिवासियों के विरूद्ध कुल 332 अपराधिक घटनायें हुई। फर्जी मुकदमों के तहत (आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया। उनका गुनाह सिर्फ यह था कि वे झारखंड में लघु वनोपज जमा करने के लिये जंगल गये थे। आदिवासियों ने राष्ट्रीय वन कानून के तहत जमीन पर अधिकार जताया तो उनके खिलाफ 12 अगस्त 2007 तक में राज्य के वन विभाग ने कुल 12,000 मुकदमा ठोंक दिया। गाणा सुरक्षाबलों द्वारा मानव अधिकार के उल्लंघनों की फेहरिस्त लंबी है। उन्होंने जीवन के अधिकार का ही उल्लंघन किया। 01 अप्रैल 2006 से 31 मार्च 2007 के बीच राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने केवल झारखंड के पुलिस हिरासत में मृत्यु के तीन केस पाये हैं। इसी दरिम्यान पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की दो घटनाओं का भी वर्णन है। मनमाना गिरफ्तारी, अवैध हिरासत एवं प्रताड़ना की घटनाओं में भी वृद्धि हुई। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने 01 अप्रैल 2006 से 31 मार्च 2007 के बीच अवैध गिरफ्तारी की दो घटनायें, दो गैर कानूनी नजरबंदी, एक गुम हो जाने का केस और 128 पुलिस ज्यादतियों के केस केवल झारखंड में पाये हैं। कुल 144 केसों में पुलिस ने ध्यान ही नहीं दिया। कई बार पुलिस ने आरोपी व्यक्तियों को सवाल-जवाब करते समय सताया है। जिन प्रकाELE
अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन भी माओवादियों ने खूब किया है। झारखंड पुलिस द्वारा तैयार रिपोर्ट के अनुसार माओवादियों द्वारा मारे गये 70 प्रतिशत लोग आदिवासी एवं दलित समुदाय से आते हैं। जनवरी और सितंबर 2007 के बीच माओवादियों ने 28 नागरिकों की हत्या की है। राजनीतिज्ञ और पुलिस के लिये मुखबिरी करने वाले विशेष रूप से निशाने पर रहे हैं। माओवादियों ने पुलिस के लिये सूचना पहुंचाने वालों की हत्या करना जारी रखा है। माओवादी न्याय को थोपने के लिये जन अदालत लगातार जारी है। माओवादियों ने सार्वजनिक सम्पतियों को नुकसान पहुंचाया है।
झारखंड की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण न्याय विलम्ब से मिल रहा है। एक जनवरी 2008, की स्थिति के मुताबिक झारखंड उच्च न्यायालय में 11 जजों के स्थान रिक्त थे जबकि कुल 20 जजों की व्यवस्था होनी चाहिये। 30 सितंबर 2007 की स्थिति के अनुसार जिलों एवं अधीनस्थ न्यायालयों में जजों की संख्या 503 होनी चाहिये जिसमें से कुल 66 सीटें खाली थीं। झारखंड उच्च न्यायालय में कुल 49,276 मुकदमें लम्बित हैं जबकि जिलों एवं अधीनस्थ न्यायालयों में कुल 2,63,907 केस लम्बित हैं।
झारखंड की न्याय प्रणाली में आदिवासी प्रतिनिधित्व का नितांत अभाव है। जीभि कि आदिवासी पूरे राज्य की जनसंख्या का एक तिहाई है। झारखंड के उच्च न्यायालय में और जिला के न्यायालय में भी एक भी आदिवासी नहीं है। झारखंड उच्च न्यायालय के वकीलों के संघ के अनुसार कुल 1,836 कार्यरत वकीलों में से 300 वकील आदिवासी, हरिजन अल्पसंख्यक और महिला हैं। राजकीय न्यायिक सेवा में लगभग 430 अफसर हैं लेकिन एक भी आदिवासी अफसर नहीं है। यहां गौरतलब है कि राज्य द्वारा नियुक्त न्यायिक पदाधिकारी भी कई न्यायालयों के साथ-साथ उच्च न्यायालय में बहस कर सकता है। अपराध रिकार्ड की राष्ट्रीय ब्यूरो के अनुसार 2006 में झारखंड राज्य में 332 केस आदिवासियों के विरूद्ध में लगाये गये।
इनमें से 13 हत्या 21 बलात्कार, 13 अपहरण, 91 केस हरिजन आदिवासी उत्पीडन एक्ट 1989 के तहत है। झारखंड सरकार की संवेदनहीनता के कारण आदिवासियों की स्थिति बहुत दयनीय है। सबर आदिवासी जो छोटानागपुर पठार के सबसे पुराने आदिवासी हैं अब समाप्त हो जाने के कगार में है। फरवरी 2007 में ली गयी जानकारी के अनुसार डारीसाई गांव में अब केवल 11 सबर परिवार हैं जिसमें 47 व्यक्ति हैं जबकि एक समय उसी गांव में 200 परिवार रहते थे।
भूमि हस्तांतरण और विस्थापन परगना काश्तकारी अधिनियम हैं जो आदिवासी भूमि को गैर आदिवासियों के लिये बेचने से रोकते हैं - झारखंड में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संताल लेकिन इसके बावजूद झारखंड में भूमि हस्तांतरण का मामला बहुत बढ़ गया है। वर्ष 2003-2004 में Special Area Regulation Court (एस.ए.आर. कोर्ट) के तहत आदिवासियों ने कुल 2,608 मुकदमें दर्ज किये जो 2004-2005 में बढ़कर 2657 हो गया और इससे भी कहीं अधिक 3230 मामले 2005-2006 में हो गये। जनवरी 2007 में कुल 3789 मामले एस.ए.आर. कोर्ट में दायर किये गये।
आदिवासियों की भूसंबंधी मुकदमों को लड़ने के लिये जानकार वकीलों की भारी कमी है जिसके कारण मुकदमा का निपटारा जल्दी नहीं हो पाता है। मार्च 2007 के रिकार्ड के अनुसार झारखंड के जिला कोर्ट में ही कुल 5,500 भूसंबंधी मुकदमें लंबित थे। झारखंड सरकार के वार्षिक बजट में गरीब आदिवासियों के लिये कानूनी सहायता उपलब्ध करने के लिये 50 लाख देने का प्रावधान है। फिर भी पिछले छह वर्षों में बजट में पास किये गये कानूनी अनुदान का 10 प्रतिशत से कम खर्च किया गया। सरकारी सहायता से मुकदमा लड़ने वाले आदिवासियों का केस लेने से वकील पीछे हट जाते थे। भूसंबंधी मुकदमों के कोर्ट में लंबित रहने का कारण प्रतिकेस 5000 रुपया मात्र देने का सरकारी प्रावधान भी एक कारण है।
फरवरी 2007 में उच्चतम न्यायालय ने एक आदिवासी आवेदक को एक माइनिंग कंपनी से अपनी जमीन वापस लेने हेतु पुनः आवेदन देने के लिये अनुमति दिया। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि झारखंड उच्च न्यायालय ने सुरेन्द्र देहरी नामक आदिवासी के केस को खारिज करके गलत किया है। सुरेन्द्र देहरी ने आरोप लगाया है कि माइनिंग कंपनी ने सरकार के साथ मिली भगत करके 10,000 एकड़ आदिवासी जमीन को हड़प लिया है। इस केस को हाइकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वार्थ का मामला बताकर खारिज किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बी.एन. अग्रवाल और पी.पी. नावलेकर की बेंच ने कहा कि आदिवासियों को दिये गये संवैधानिक गारंटी का एक स्पष्ट उल्लंघन को निजी स्वार्थ के मामले से नहीं जोड़ा जा सकता है।
झारखंड के आदिवासी राष्ट्रीय पनबिजली निगम द्वारा प्रस्तावित कोईल-कारो पन बिजली परियोजना का विरोध कर रहे हैं। यदि यह परियोजना साकार होती है तो आदिवासियों के 256 गांव डूबेंगे जिसमें50,000 एकड़ जंगल एरिया, 40,000 एकड़ कृषि भूमि, 300 सरना स्थल, 175 तिरुजावर और 120 मंदिर हैं।
वन कानून के तहत दमन- लघु वनोपज जमा करने के लिये जंगल जाते आदिवासियों को डराया धमकाया जाता है। उन्हें गाली-गलौज और गिरफ्तार भी किया जाता है। 12 अगस्त 2007 की स्थिति के अनुसार आदिवासियों पर 12,000 मुकमा राज्य वन विभाग ने दायर किया है। आदिवासियों द्वारा राष्ट्रीय वन कानून के तहत भूसंपत्ति पर अपना मालिकाना दावा करने के कारण इस तरह के मुकदर्मी की वृद्धि हुई है|
12 अगस्त 2007 को झारखंड सरकार ने वन विभाग द्वारा मुकदमे में फेररावे गये सभी आदिवासियों को जेल से मुक्त करने और उन सभी किसानों को मुआवजा देने कहा जिनके खेत में वन विभाग ने जबरदस्ती वृक्षारोपण किया था।
महिलाओं पर भी हिंसा जारी रहा और बलात्कार एवं दहेज, हत्या जैसी घटनाओं में भी झारखंड आगे है। अपराध रिकार्ड के राष्ट्रीय ब्यूरो के अनुसार 2006 में कुल 2979 महिला हिंसा के मामले दर्ज हुए। इनमें से 799 बलात्कार, 410 अपहरण और अगवा, 281 दहेज हत्या, 668 दहेज के लिये प्रताड़ना, 414 छेड़छाड़ के मामले हैं। इसके अलावा 11 मामले अनैतिक मानव व्यापार से जुड़े हैं। सुरक्षा बल महिलाओं और बच्चों पर हिंसा के लिये ज्यादा जिम्मेदार हैं। आदिवासी महिलाएं, अधिक बलात्कार की शिकार बनीं।
झारखंड में 2006 में बच्चों के विरुद्ध 42 अपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें से 9 हत्या, 28 बलात्कार और ।। मामला अपहरण और अगवा के हैं। बच्चों की सुरक्षा एवं हित का उल्लंघन होता रहा। बच्चों को घर एवं अनाथालय में प्रताड़ित होना पड़ा। सुरक्षा बलों द्वारा विद्यालय भवन का अतिक्रमण करके कब्जा किया गया जिसके कारण विद्यालय नक्सलियों के टारगेट में आ गये। अप्रैल 2007 की स्थिति में 25 विद्यालयों में सुरक्षा बलों का कैम्प था। पिछले पांच वर्षों में कई विद्यालय बंद हो गये और 12,000 विद्यार्थी बुरी तरह प्रभावित हुए। 1990 से छत्तरपुर मिडिल स्कूल बंद है। बहुत बार विद्यार्थी खुले आसमान में ही पठन-पाठन का कार्य करते हैं।
Jharkhand Government Will Face Consequences If Human Rights Are Not Protected
Failure to Protect Human Rights Could Cost the Jharkhand Government Dearly
Human Rights Protection in Jharkhand: Government May Face Action for Negligence
Jharkhand Government Under Pressure to Safeguard Human Rights
Ignoring Human Rights Violations Could Lead to Punishment for Jharkhand Government
Human Rights at Risk: Jharkhand Government Warned of Consequences
Will the Jharkhand Government Be Held Accountable for Human Rights Failures?
Protect Human Rights or Face Punishment: A Warning to the Jharkhand Government
Jharkhand Government's Responsibility to Protect Human Rights Under Scrutiny
Human Rights Violations in Jharkhand: Government Accountability in Focus
मानव अधिकार की रक्षा में असफल धोनेशक अगर झारखंड सरकार
Protect Human Rights or Face Punishment: Jharkhand Government Under Scrutiny"
एशिया में मानव अधिकार की सुरक्षा एवं प्रोमोशन के लिये समर्पित The Asian Centre for Human Rights के अनुसार झारखंड राज्य लोगों के मानव अधिकार की रक्षा में बुरी तरह असफल रहा है। इस संस्था द्वारा प्रकाशित 2008 की रिपोर्ट के कुछ अंश इस प्रकार हैं। नक्सलवादी और सुरक्षा बल दोनों ही मानव अधिकारों के हनन के लिये उत्तरदायी हैं साथ ही वे गैर न्यायिक हत्याओं और प्रताड़ना के लिये भी जिम्मेदार हैं। माओवादियों ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को लक्ष्य किया है। जुलाई 2007 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने खुलासा किया कि लगभग 84,000 मानव अधिकार उल्लंघन की घटनायें घटीं जिसमें से 3000 घटनायें केवल झारखंड में घर्टी। फिर भी झारखंड सरकार ने. राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन नहीं किया। इधर आदिवासी मानव अधिकार उल्लंघन की घटनाओं से दिन-ब-दिन प्रताड़ित होते रहे। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के रिकार्ड के अनुसार 2006 में केवल झारखंड में आदिवासियों के विरूद्ध कुल 332 अपराधिक घटनायें हुई। फर्जी मुकदमों के तहत (आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया। उनका गुनाह सिर्फ यह था कि वे झारखंड में लघु वनोपज जमा करने के लिये जंगल गये थे। आदिवासियों ने राष्ट्रीय वन कानून के तहत जमीन पर अधिकार जताया तो उनके खिलाफ 12 अगस्त 2007 तक में राज्य के वन विभाग ने कुल 12,000 मुकदमा ठोंक दिया। गाणा सुरक्षाबलों द्वारा मानव अधिकार के उल्लंघनों की फेहरिस्त लंबी है। उन्होंने जीवन के अधिकार का ही उल्लंघन किया। 01 अप्रैल 2006 से 31 मार्च 2007 के बीच राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने केवल झारखंड के पुलिस हिरासत में मृत्यु के तीन केस पाये हैं। इसी दरिम्यान पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की दो घटनाओं का भी वर्णन है। मनमाना गिरफ्तारी, अवैध हिरासत एवं प्रताड़ना की घटनाओं में भी वृद्धि हुई। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने 01 अप्रैल 2006 से 31 मार्च 2007 के बीच अवैध गिरफ्तारी की दो घटनायें, दो गैर कानूनी नजरबंदी, एक गुम हो जाने का केस और 128 पुलिस ज्यादतियों के केस केवल झारखंड में पाये हैं। कुल 144 केसों में पुलिस ने ध्यान ही नहीं दिया। कई बार पुलिस ने आरोपी व्यक्तियों को सवाल-जवाब करते समय सताया है। जिन प्रकाELE
अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन भी माओवादियों ने खूब किया है। झारखंड पुलिस द्वारा तैयार रिपोर्ट के अनुसार माओवादियों द्वारा मारे गये 70 प्रतिशत लोग आदिवासी एवं दलित समुदाय से आते हैं। जनवरी और सितंबर 2007 के बीच माओवादियों ने 28 नागरिकों की हत्या की है। राजनीतिज्ञ और पुलिस के लिये मुखबिरी करने वाले विशेष रूप से निशाने पर रहे हैं। माओवादियों ने पुलिस के लिये सूचना पहुंचाने वालों की हत्या करना जारी रखा है। माओवादी न्याय को थोपने के लिये जन अदालत लगातार जारी है। माओवादियों ने सार्वजनिक सम्पतियों को नुकसान पहुंचाया है।
झारखंड की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण न्याय विलम्ब से मिल रहा है। एक जनवरी 2008, की स्थिति के मुताबिक झारखंड उच्च न्यायालय में 11 जजों के स्थान रिक्त थे जबकि कुल 20 जजों की व्यवस्था होनी चाहिये। 30 सितंबर 2007 की स्थिति के अनुसार जिलों एवं अधीनस्थ न्यायालयों में जजों की संख्या 503 होनी चाहिये जिसमें से कुल 66 सीटें खाली थीं। झारखंड उच्च न्यायालय में कुल 49,276 मुकदमें लम्बित हैं जबकि जिलों एवं अधीनस्थ न्यायालयों में कुल 2,63,907 केस लम्बित हैं।
झारखंड की न्याय प्रणाली में आदिवासी प्रतिनिधित्व का नितांत अभाव है। जीभि कि आदिवासी पूरे राज्य की जनसंख्या का एक तिहाई है। झारखंड के उच्च न्यायालय में और जिला के न्यायालय में भी एक भी आदिवासी नहीं है। झारखंड उच्च न्यायालय के वकीलों के संघ के अनुसार कुल 1,836 कार्यरत वकीलों में से 300 वकील आदिवासी, हरिजन अल्पसंख्यक और महिला हैं। राजकीय न्यायिक सेवा में लगभग 430 अफसर हैं लेकिन एक भी आदिवासी अफसर नहीं है। यहां गौरतलब है कि राज्य द्वारा नियुक्त न्यायिक पदाधिकारी भी कई न्यायालयों के साथ-साथ उच्च न्यायालय में बहस कर सकता है। अपराध रिकार्ड की राष्ट्रीय ब्यूरो के अनुसार 2006 में झारखंड राज्य में 332 केस आदिवासियों के विरूद्ध में लगाये गये।
इनमें से 13 हत्या 21 बलात्कार, 13 अपहरण, 91 केस हरिजन आदिवासी उत्पीडन एक्ट 1989 के तहत है। झारखंड सरकार की संवेदनहीनता के कारण आदिवासियों की स्थिति बहुत दयनीय है। सबर आदिवासी जो छोटानागपुर पठार के सबसे पुराने आदिवासी हैं अब समाप्त हो जाने के कगार में है। फरवरी 2007 में ली गयी जानकारी के अनुसार डारीसाई गांव में अब केवल 11 सबर परिवार हैं जिसमें 47 व्यक्ति हैं जबकि एक समय उसी गांव में 200 परिवार रहते थे।
भूमि हस्तांतरण और विस्थापन परगना काश्तकारी अधिनियम हैं जो आदिवासी भूमि को गैर आदिवासियों के लिये बेचने से रोकते हैं - झारखंड में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संताल लेकिन इसके बावजूद झारखंड में भूमि हस्तांतरण का मामला बहुत बढ़ गया है। वर्ष 2003-2004 में Special Area Regulation Court (एस.ए.आर. कोर्ट) के तहत आदिवासियों ने कुल 2,608 मुकदमें दर्ज किये जो 2004-2005 में बढ़कर 2657 हो गया और इससे भी कहीं अधिक 3230 मामले 2005-2006 में हो गये। जनवरी 2007 में कुल 3789 मामले एस.ए.आर. कोर्ट में दायर किये गये।
आदिवासियों की भूसंबंधी मुकदमों को लड़ने के लिये जानकार वकीलों की भारी कमी है जिसके कारण मुकदमा का निपटारा जल्दी नहीं हो पाता है। मार्च 2007 के रिकार्ड के अनुसार झारखंड के जिला कोर्ट में ही कुल 5,500 भूसंबंधी मुकदमें लंबित थे। झारखंड सरकार के वार्षिक बजट में गरीब आदिवासियों के लिये कानूनी सहायता उपलब्ध करने के लिये 50 लाख देने का प्रावधान है। फिर भी पिछले छह वर्षों में बजट में पास किये गये कानूनी अनुदान का 10 प्रतिशत से कम खर्च किया गया। सरकारी सहायता से मुकदमा लड़ने वाले आदिवासियों का केस लेने से वकील पीछे हट जाते थे। भूसंबंधी मुकदमों के कोर्ट में लंबित रहने का कारण प्रतिकेस 5000 रुपया मात्र देने का सरकारी प्रावधान भी एक कारण है।
फरवरी 2007 में उच्चतम न्यायालय ने एक आदिवासी आवेदक को एक माइनिंग कंपनी से अपनी जमीन वापस लेने हेतु पुनः आवेदन देने के लिये अनुमति दिया। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि झारखंड उच्च न्यायालय ने सुरेन्द्र देहरी नामक आदिवासी के केस को खारिज करके गलत किया है। सुरेन्द्र देहरी ने आरोप लगाया है कि माइनिंग कंपनी ने सरकार के साथ मिली भगत करके 10,000 एकड़ आदिवासी जमीन को हड़प लिया है। इस केस को हाइकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वार्थ का मामला बताकर खारिज किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बी.एन. अग्रवाल और पी.पी. नावलेकर की बेंच ने कहा कि आदिवासियों को दिये गये संवैधानिक गारंटी का एक स्पष्ट उल्लंघन को निजी स्वार्थ के मामले से नहीं जोड़ा जा सकता है।
झारखंड के आदिवासी राष्ट्रीय पनबिजली निगम द्वारा प्रस्तावित कोईल-कारो पन बिजली परियोजना का विरोध कर रहे हैं। यदि यह परियोजना साकार होती है तो आदिवासियों के 256 गांव डूबेंगे जिसमें50,000 एकड़ जंगल एरिया, 40,000 एकड़ कृषि भूमि, 300 सरना स्थल, 175 तिरुजावर और 120 मंदिर हैं।
वन कानून के तहत दमन- लघु वनोपज जमा करने के लिये जंगल जाते आदिवासियों को डराया धमकाया जाता है। उन्हें गाली-गलौज और गिरफ्तार भी किया जाता है। 12 अगस्त 2007 की स्थिति के अनुसार आदिवासियों पर 12,000 मुकमा राज्य वन विभाग ने दायर किया है। आदिवासियों द्वारा राष्ट्रीय वन कानून के तहत भूसंपत्ति पर अपना मालिकाना दावा करने के कारण इस तरह के मुकदर्मी की वृद्धि हुई है|
12 अगस्त 2007 को झारखंड सरकार ने वन विभाग द्वारा मुकदमे में फेररावे गये सभी आदिवासियों को जेल से मुक्त करने और उन सभी किसानों को मुआवजा देने कहा जिनके खेत में वन विभाग ने जबरदस्ती वृक्षारोपण किया था।
महिलाओं पर भी हिंसा जारी रहा और बलात्कार एवं दहेज, हत्या जैसी घटनाओं में भी झारखंड आगे है। अपराध रिकार्ड के राष्ट्रीय ब्यूरो के अनुसार 2006 में कुल 2979 महिला हिंसा के मामले दर्ज हुए। इनमें से 799 बलात्कार, 410 अपहरण और अगवा, 281 दहेज हत्या, 668 दहेज के लिये प्रताड़ना, 414 छेड़छाड़ के मामले हैं। इसके अलावा 11 मामले अनैतिक मानव व्यापार से जुड़े हैं। सुरक्षा बल महिलाओं और बच्चों पर हिंसा के लिये ज्यादा जिम्मेदार हैं। आदिवासी महिलाएं, अधिक बलात्कार की शिकार बनीं।
झारखंड में 2006 में बच्चों के विरुद्ध 42 अपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें से 9 हत्या, 28 बलात्कार और ।। मामला अपहरण और अगवा के हैं। बच्चों की सुरक्षा एवं हित का उल्लंघन होता रहा। बच्चों को घर एवं अनाथालय में प्रताड़ित होना पड़ा। सुरक्षा बलों द्वारा विद्यालय भवन का अतिक्रमण करके कब्जा किया गया जिसके कारण विद्यालय नक्सलियों के टारगेट में आ गये। अप्रैल 2007 की स्थिति में 25 विद्यालयों में सुरक्षा बलों का कैम्प था। पिछले पांच वर्षों में कई विद्यालय बंद हो गये और 12,000 विद्यार्थी बुरी तरह प्रभावित हुए। 1990 से छत्तरपुर मिडिल स्कूल बंद है। बहुत बार विद्यार्थी खुले आसमान में ही पठन-पाठन का कार्य करते हैं।
Jharkhand Government Will Face Consequences If Human Rights Are Not Protected
Failure to Protect Human Rights Could Cost the Jharkhand Government Dearly
Human Rights Protection in Jharkhand: Government May Face Action for Negligence
Jharkhand Government Under Pressure to Safeguard Human Rights
Ignoring Human Rights Violations Could Lead to Punishment for Jharkhand Government
Human Rights at Risk: Jharkhand Government Warned of Consequences
Will the Jharkhand Government Be Held Accountable for Human Rights Failures?
Protect Human Rights or Face Punishment: A Warning to the Jharkhand Government
Jharkhand Government's Responsibility to Protect Human Rights Under Scrutiny
Human Rights Violations in Jharkhand: Government Accountability in Focus
मानव अधिकार की रक्षा में असफल धोनेशक अगर झारखंड सरकार
Protect Human Rights or Face Punishment: Jharkhand Government Under Scrutiny"
एशिया में मानव अधिकार की सुरक्षा एवं प्रोमोशन के लिये समर्पित The Asian Centre for Human Rights के अनुसार झारखंड राज्य लोगों के मानव अधिकार की रक्षा में बुरी तरह असफल रहा है। इस संस्था द्वारा प्रकाशित 2008 की रिपोर्ट के कुछ अंश इस प्रकार हैं। नक्सलवादी और सुरक्षा बल दोनों ही मानव अधिकारों के हनन के लिये उत्तरदायी हैं साथ ही वे गैर न्यायिक हत्याओं और प्रताड़ना के लिये भी जिम्मेदार हैं। माओवादियों ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को लक्ष्य किया है। जुलाई 2007 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने खुलासा किया कि लगभग 84,000 मानव अधिकार उल्लंघन की घटनायें घटीं जिसमें से 3000 घटनायें केवल झारखंड में घर्टी। फिर भी झारखंड सरकार ने. राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन नहीं किया। इधर आदिवासी मानव अधिकार उल्लंघन की घटनाओं से दिन-ब-दिन प्रताड़ित होते रहे। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के रिकार्ड के अनुसार 2006 में केवल झारखंड में आदिवासियों के विरूद्ध कुल 332 अपराधिक घटनायें हुई। फर्जी मुकदमों के तहत (आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया। उनका गुनाह सिर्फ यह था कि वे झारखंड में लघु वनोपज जमा करने के लिये जंगल गये थे। आदिवासियों ने राष्ट्रीय वन कानून के तहत जमीन पर अधिकार जताया तो उनके खिलाफ 12 अगस्त 2007 तक में राज्य के वन विभाग ने कुल 12,000 मुकदमा ठोंक दिया। गाणा सुरक्षाबलों द्वारा मानव अधिकार के उल्लंघनों की फेहरिस्त लंबी है। उन्होंने जीवन के अधिकार का ही उल्लंघन किया। 01 अप्रैल 2006 से 31 मार्च 2007 के बीच राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने केवल झारखंड के पुलिस हिरासत में मृत्यु के तीन केस पाये हैं। इसी दरिम्यान पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की दो घटनाओं का भी वर्णन है। मनमाना गिरफ्तारी, अवैध हिरासत एवं प्रताड़ना की घटनाओं में भी वृद्धि हुई। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने 01 अप्रैल 2006 से 31 मार्च 2007 के बीच अवैध गिरफ्तारी की दो घटनायें, दो गैर कानूनी नजरबंदी, एक गुम हो जाने का केस और 128 पुलिस ज्यादतियों के केस केवल झारखंड में पाये हैं। कुल 144 केसों में पुलिस ने ध्यान ही नहीं दिया। कई बार पुलिस ने आरोपी व्यक्तियों को सवाल-जवाब करते समय सताया है। जिन प्रकाELE
अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन भी माओवादियों ने खूब किया है। झारखंड पुलिस द्वारा तैयार रिपोर्ट के अनुसार माओवादियों द्वारा मारे गये 70 प्रतिशत लोग आदिवासी एवं दलित समुदाय से आते हैं। जनवरी और सितंबर 2007 के बीच माओवादियों ने 28 नागरिकों की हत्या की है। राजनीतिज्ञ और पुलिस के लिये मुखबिरी करने वाले विशेष रूप से निशाने पर रहे हैं। माओवादियों ने पुलिस के लिये सूचना पहुंचाने वालों की हत्या करना जारी रखा है। माओवादी न्याय को थोपने के लिये जन अदालत लगातार जारी है। माओवादियों ने सार्वजनिक सम्पतियों को नुकसान पहुंचाया है।
झारखंड की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण न्याय विलम्ब से मिल रहा है। एक जनवरी 2008, की स्थिति के मुताबिक झारखंड उच्च न्यायालय में 11 जजों के स्थान रिक्त थे जबकि कुल 20 जजों की व्यवस्था होनी चाहिये। 30 सितंबर 2007 की स्थिति के अनुसार जिलों एवं अधीनस्थ न्यायालयों में जजों की संख्या 503 होनी चाहिये जिसमें से कुल 66 सीटें खाली थीं। झारखंड उच्च न्यायालय में कुल 49,276 मुकदमें लम्बित हैं जबकि जिलों एवं अधीनस्थ न्यायालयों में कुल 2,63,907 केस लम्बित हैं।
झारखंड की न्याय प्रणाली में आदिवासी प्रतिनिधित्व का नितांत अभाव है। जीभि कि आदिवासी पूरे राज्य की जनसंख्या का एक तिहाई है। झारखंड के उच्च न्यायालय में और जिला के न्यायालय में भी एक भी आदिवासी नहीं है। झारखंड उच्च न्यायालय के वकीलों के संघ के अनुसार कुल 1,836 कार्यरत वकीलों में से 300 वकील आदिवासी, हरिजन अल्पसंख्यक और महिला हैं। राजकीय न्यायिक सेवा में लगभग 430 अफसर हैं लेकिन एक भी आदिवासी अफसर नहीं है। यहां गौरतलब है कि राज्य द्वारा नियुक्त न्यायिक पदाधिकारी भी कई न्यायालयों के साथ-साथ उच्च न्यायालय में बहस कर सकता है। अपराध रिकार्ड की राष्ट्रीय ब्यूरो के अनुसार 2006 में झारखंड राज्य में 332 केस आदिवासियों के विरूद्ध में लगाये गये।
इनमें से 13 हत्या 21 बलात्कार, 13 अपहरण, 91 केस हरिजन आदिवासी उत्पीडन एक्ट 1989 के तहत है। झारखंड सरकार की संवेदनहीनता के कारण आदिवासियों की स्थिति बहुत दयनीय है। सबर आदिवासी जो छोटानागपुर पठार के सबसे पुराने आदिवासी हैं अब समाप्त हो जाने के कगार में है। फरवरी 2007 में ली गयी जानकारी के अनुसार डारीसाई गांव में अब केवल 11 सबर परिवार हैं जिसमें 47 व्यक्ति हैं जबकि एक समय उसी गांव में 200 परिवार रहते थे।
भूमि हस्तांतरण और विस्थापन परगना काश्तकारी अधिनियम हैं जो आदिवासी भूमि को गैर आदिवासियों के लिये बेचने से रोकते हैं - झारखंड में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम और संताल लेकिन इसके बावजूद झारखंड में भूमि हस्तांतरण का मामला बहुत बढ़ गया है। वर्ष 2003-2004 में Special Area Regulation Court (एस.ए.आर. कोर्ट) के तहत आदिवासियों ने कुल 2,608 मुकदमें दर्ज किये जो 2004-2005 में बढ़कर 2657 हो गया और इससे भी कहीं अधिक 3230 मामले 2005-2006 में हो गये। जनवरी 2007 में कुल 3789 मामले एस.ए.आर. कोर्ट में दायर किये गये।
आदिवासियों की भूसंबंधी मुकदमों को लड़ने के लिये जानकार वकीलों की भारी कमी है जिसके कारण मुकदमा का निपटारा जल्दी नहीं हो पाता है। मार्च 2007 के रिकार्ड के अनुसार झारखंड के जिला कोर्ट में ही कुल 5,500 भूसंबंधी मुकदमें लंबित थे। झारखंड सरकार के वार्षिक बजट में गरीब आदिवासियों के लिये कानूनी सहायता उपलब्ध करने के लिये 50 लाख देने का प्रावधान है। फिर भी पिछले छह वर्षों में बजट में पास किये गये कानूनी अनुदान का 10 प्रतिशत से कम खर्च किया गया। सरकारी सहायता से मुकदमा लड़ने वाले आदिवासियों का केस लेने से वकील पीछे हट जाते थे। भूसंबंधी मुकदमों के कोर्ट में लंबित रहने का कारण प्रतिकेस 5000 रुपया मात्र देने का सरकारी प्रावधान भी एक कारण है।
फरवरी 2007 में उच्चतम न्यायालय ने एक आदिवासी आवेदक को एक माइनिंग कंपनी से अपनी जमीन वापस लेने हेतु पुनः आवेदन देने के लिये अनुमति दिया। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि झारखंड उच्च न्यायालय ने सुरेन्द्र देहरी नामक आदिवासी के केस को खारिज करके गलत किया है। सुरेन्द्र देहरी ने आरोप लगाया है कि माइनिंग कंपनी ने सरकार के साथ मिली भगत करके 10,000 एकड़ आदिवासी जमीन को हड़प लिया है। इस केस को हाइकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वार्थ का मामला बताकर खारिज किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के बी.एन. अग्रवाल और पी.पी. नावलेकर की बेंच ने कहा कि आदिवासियों को दिये गये संवैधानिक गारंटी का एक स्पष्ट उल्लंघन को निजी स्वार्थ के मामले से नहीं जोड़ा जा सकता है।
झारखंड के आदिवासी राष्ट्रीय पनबिजली निगम द्वारा प्रस्तावित कोईल-कारो पन बिजली परियोजना का विरोध कर रहे हैं। यदि यह परियोजना साकार होती है तो आदिवासियों के 256 गांव डूबेंगे जिसमें50,000 एकड़ जंगल एरिया, 40,000 एकड़ कृषि भूमि, 300 सरना स्थल, 175 तिरुजावर और 120 मंदिर हैं।
वन कानून के तहत दमन- लघु वनोपज जमा करने के लिये जंगल जाते आदिवासियों को डराया धमकाया जाता है। उन्हें गाली-गलौज और गिरफ्तार भी किया जाता है। 12 अगस्त 2007 की स्थिति के अनुसार आदिवासियों पर 12,000 मुकमा राज्य वन विभाग ने दायर किया है। आदिवासियों द्वारा राष्ट्रीय वन कानून के तहत भूसंपत्ति पर अपना मालिकाना दावा करने के कारण इस तरह के मुकदर्मी की वृद्धि हुई है|
12 अगस्त 2007 को झारखंड सरकार ने वन विभाग द्वारा मुकदमे में फेररावे गये सभी आदिवासियों को जेल से मुक्त करने और उन सभी किसानों को मुआवजा देने कहा जिनके खेत में वन विभाग ने जबरदस्ती वृक्षारोपण किया था।
महिलाओं पर भी हिंसा जारी रहा और बलात्कार एवं दहेज, हत्या जैसी घटनाओं में भी झारखंड आगे है। अपराध रिकार्ड के राष्ट्रीय ब्यूरो के अनुसार 2006 में कुल 2979 महिला हिंसा के मामले दर्ज हुए। इनमें से 799 बलात्कार, 410 अपहरण और अगवा, 281 दहेज हत्या, 668 दहेज के लिये प्रताड़ना, 414 छेड़छाड़ के मामले हैं। इसके अलावा 11 मामले अनैतिक मानव व्यापार से जुड़े हैं। सुरक्षा बल महिलाओं और बच्चों पर हिंसा के लिये ज्यादा जिम्मेदार हैं। आदिवासी महिलाएं, अधिक बलात्कार की शिकार बनीं।
झारखंड में 2006 में बच्चों के विरुद्ध 42 अपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें से 9 हत्या, 28 बलात्कार और ।। मामला अपहरण और अगवा के हैं। बच्चों की सुरक्षा एवं हित का उल्लंघन होता रहा। बच्चों को घर एवं अनाथालय में प्रताड़ित होना पड़ा। सुरक्षा बलों द्वारा विद्यालय भवन का अतिक्रमण करके कब्जा किया गया जिसके कारण विद्यालय नक्सलियों के टारगेट में आ गये। अप्रैल 2007 की स्थिति में 25 विद्यालयों में सुरक्षा बलों का कैम्प था। पिछले पांच वर्षों में कई विद्यालय बंद हो गये और 12,000 विद्यार्थी बुरी तरह प्रभावित हुए। 1990 से छत्तरपुर मिडिल स्कूल बंद है। बहुत बार विद्यार्थी खुले आसमान में ही पठन-पाठन का कार्य करते हैं।
Jharkhand Government Will Face Consequences If Human Rights Are Not Protected
Failure to Protect Human Rights Could Cost the Jharkhand Government Dearly
Human Rights Protection in Jharkhand: Government May Face Action for Negligence
Jharkhand Government Under Pressure to Safeguard Human Rights
Ignoring Human Rights Violations Could Lead to Punishment for Jharkhand Government
Human Rights at Risk: Jharkhand Government Warned of Consequences
Will the Jharkhand Government Be Held Accountable for Human Rights Failures?
Protect Human Rights or Face Punishment: A Warning to the Jharkhand Government
Jharkhand Government's Responsibility to Protect Human Rights Under Scrutiny
Human Rights Violations in Jharkhand: Government Accountability in Focus



No comments
If you any doubts, please let me know.