साहित्य के क्षेत्र में झारखंड का नाम पूरी दुनिया में रोशन कर चुकी महुआ माजी झारखंड महिला आयोग की अध्यक्ष रह चुकी हैं। आपका पहला ही उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्ला' बेस्टसेलर रह चुका है और इस उपन्यास के लिए महुआ जी को देश-विदेश में अनेक पुरस्कार मिले हैं। आप इस वर्ष झारखंड से निर्विरोध राज्यसभा की सदस्य चुनी गई हैं।
महुआ माजी का जन्म 10 दिसंबर, 1932 को एक खतियानी बंगाली परिवार में झारखंड की राजधानी राँची में हुआ। श्री
परिमल घोष आपके पिता थे। आपका परिवार अविभाजित भारत के बंगाल से पिछली सदी के तीसरे दशक में राँची आकर यहाँ बसा। आपकी पढ़ाई-लिखाई राँची में ही हुई। आपने समाजशास्त्र में एमए और पीएचडी की है और यूजीसी की नेट परीक्षा भी पास की है। आपने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट से 'फिल्म अप्रिसिएशन कोर्स' तथा रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से फाइन आर्ट्स में 'अंकन विभाकर' की डिग्री हासिल की है।
आपको बचपन से ही कला, साहित्य और संस्कृति से गहरा लगाव था। बाद में चित्रकारिता में भी आपकी रुचि जागी। कॉलेज के दिनों में कविताएँ लिखने के शौक ने आपको लेखन की ओर प्रेरित किया। पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से आपकी कविताएँ छपती रहीं। एक कथाकार के रूप में आपको पहला ब्रेक तब मिला, जब सन् 2001 में आपकी पहली कहानी 'मोइली की मौत' कथादेश पत्रिका के नवलेखन अंक में छपी। फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा।
सन् 2006 में आपने अपना पहला उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्ला' लिखा, जिसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया। यह ऐतिहासिक उपन्यास दरअसल बांग्लादेश के अभ्युदय की महागाथा है। आपके इस उपन्यास की बहुत सराहना की गई और आप हिंदी जगत् में छा गईं। इसे एक ऐतिहासिक और महत्त्वपूर्ण उपन्यास करार देते हुए प्रसिद्ध लेखक और संपादक राजेंद्र यादव ने कहा कि सीधे युद्ध-क्षेत्र और मोर्चों से जुड़ी कहानी को लेकर शायद ही किसी महिला ने इतना साहस दिखाया हो। इस कहानी को कहने में महुआ माजी ने जितनी खोज और मेहनत की है, उसे देखकर आश्चर्य होता है। कृष्णा सोबती ने 'मैं बोरिशाइल्ला' उपन्यास को अखिल भारतीय स्तर पर एक उपलब्धि मानते हुए कहा कि इस उपन्यास ने तथ्य आधारित रचनाशीलता को नया स्वरूप और विस्तार दिया है। आज की राजनीति जिस आत्मघाती धार्मिक उन्माद में से सिर उठाती है-ठीक उससे विपरीत बांग्लादेश के अभ्युत्थान का यह संघर्ष मजहब को लेकर नहीं, भाषायी संस्कृति की निजता की सुरक्षा को लेकर शुरू हुआ था। महुआ माजी ने इस उपन्यास में बांग्लादेश को एक सार्वभौम राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के वृत्तांत को आश्चर्यजनक प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया है। यह उपन्यास सन् 2008 में रूपा एंड कंपनी (प्रकाशक) ने अंग्रेजी में 'मी बोरिशाइल्ला' के नाम से छापा, जिसे सन् 2010 में इटली के रोम शहर में स्थित यूरोप के सबसे बड़े विश्वविद्यालय 'सापिएंजा यूनिवर्सिटी ऑफ रोम' ने अपने मॉडर्न लिट्रेचर के स्नातक पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया।
आपका अगला उपन्यास 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ' सन् 2012 में प्रकाशित हुआ और वह भी काफी चर्चित हुआ। इसका कथानक विकिरण, प्रदूषण एवं विस्थापन से जूझते आदिवासियों के जीवन और संघर्ष पर आधारित है। जब हिंदी की मुख्य धारा के लेखक हाशिए के समाज को लेकर लगभग उदासीन हों, तब आदिवासियों की दशा, दुर्दशा और जीवन संघर्ष पर केंद्रित यह उपन्यास एक बड़ी कमी की भरपाई करता है। इस उपन्यास में महुआ माजी यूरेनियम की तलाश से जुड़ी जिस संपूर्ण प्रक्रिया को उजागर करती हैं, वह हिंदी उपन्यास का जोखिम के इलाके में प्रवेश है। आपने गहरे शोध, सर्वेक्षण और समाजशास्त्रीय दृष्टि का सहारा लेकर इस उपन्यास के माध्यम से एक जरूरी हस्तक्षेप किया है। इस उपन्यास में ग्रामीणों के प्रतिरोध को मानवीय संबंधों की उष्मा और अंतद्वंद्व में घुला-मिला कर प्रस्तुत कर लेने के कमाल से आपकी लेखनी की विशेषता झलकती है। इस उपन्यास पर महाश्वेता देवी, जो खुद आदिवासियों के विषय पर शोधपूर्ण लेखन के लिए मशहूर रहीं, ने कहा कि यह आदिवासियों पर लिखा गया सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यास है। आदिवासियों को लेकर शोध, संवेदना और प्रेम के साथ लिखी गई इस पुस्तक को हर स्कूल और कॉलेज तक जाना चाहिए। सुप्रसिद्ध समालोचक विजय मोहन सिंह ने कहा कि यह उपन्यास सिर्फ सिंहभूम के आदिवासियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका फैलाव जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा विभिन्न द्वीपों पर रहनेवाले आदिवासियों के जीवन तक है। इस अर्थ में यह अपने ढंग का पहला अंतरराष्ट्रीय उपन्यास है।
आपने अपनी कहानियों और उपन्यास के माध्यम से आदिवासी लोगों की परंपराओं, समृद्ध संस्कृति को सामने रखने की कोशिश की है। देश की हंस, कथादेश, वागर्थ, कथाक्रम, नया ज्ञानोदय जैसी अग्रणी हिंदी पत्रिकाओं में आपकी कहानियाँ प्रकाशित होती रही हैं। आपकी एक कहानी 'चंद्रबिंदू' का भारतीय ज्ञानपीठ की नया ज्ञानोदय पत्रिका के 'बेस्ट ऑफ नया ज्ञानोदय' विशेषांक सहित तीन अंकों में छपना किसी भी कथाकार के लिए किसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि से कम नहीं।
राजनीति में आपके आने की कहानी बहुत दिलचस्प है। 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ' उपन्यास लिखने के क्रम में आपका कई बार झारखंड के सुदूरवर्ती, दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में जाना हुआ। इस क्रम में जनजातीय समुदाय, विशेषकर उसकी महिलाओं से उनकी समस्याओं पर आपकी बातचीत हुई। आपने महसूस किया कि जब भी लोग बाहर से उनके पास आकर सहानुभूतिपूर्वक उनसे जुड़ी बातें करते हैं, तो ये उनसे अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद जोड़ लेते हैं। बहुधा उनकी उम्मीद पूरी नहीं हो पाती। आपने मन में ठान लिया कि मौका मिला तो इनकी समस्याओं के समाधान के लिए ईमानदारी से पूरी कोशिश करेंगी। फिर जब सन् 2013 में आपको झारखंड सरकार ने राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, तब आपने इसके लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी। महिला आयोग में आपके काम से प्रभावित होकर राज्य के एक प्रमुख दल झारखंड मुक्ति मोर्चा ने सन् 2015 में आपको राँची निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट दे दिया। पहले ही प्रयास में आपको अच्छे वोट मिले। इसके बाद सन् 2015 में ही पार्टी ने आपको अपनी महिला विंग का केंद्रीय अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। अपनी मेहनत और लगन के बूते इस पद पर वे तब से अब तक कार्यरत हैं। सन् 2019 में आपने राँची से विधानसभा का चुनाव दुबारा लड़ा।
झारखंड महिला आयोग की अध्यक्ष के रूप में नवंबर सन् 2013 से नवंबर सन् 2016 तक के अपने तीन साल के कार्यकाल में झारखंड में महिलाओं के शोषण और उत्पीड़न को आपने करीब से देखा समझा है। आपकी नजर में झारखंड में महिलाओं की अनेक समस्याओं के बीच डायन प्रथा और लड़कियों की तस्करी
सबसे प्रमुख समस्याएँ हैं, जिनके निदान के लिए आप लगातार प्रयासरत रही हैं। आप मानती हैं कि जमीन विवाद और अंधविश्वास, ये दो बातें हैं, जो डायन प्रथा को बढ़ावा दे रही हैं। अंधविश्वास को दूर करने के लिए शिक्षा और जागरुकता की जरूरत है। शिक्षा के माध्यम से ही महिलाओं में कानून की समझ बनेगी। वैसे तो विभिन्न तरह की समस्याएँ लेकर समाधान की आशा से आपके पास आए लोगों का दिनभर सिलसिला चलता रहता है और आप भी सबकी हर संभव मदद करती हैं, पर कला, संस्कृति, साहित्य से जुड़े लोगों की समस्याओं की आपने सदैव बहुत तत्परता से समाधान करने की कोशिश की है। आपका विश्वास है कि आदिवासी संस्कृति से ही आज पूरी दुनिया को बचाया जा सकता है, क्योंकि वे ही प्रकृति के साथ मिल-जुलकर रहना जानते हैं। आपका मानना है कि आदिवासियों के बारे में कई तरह की गलत धारणाएँ प्रचारित की जाती रही हैं, जिन्हें तोड़कर उनकी सच्ची तस्वीर सामने लाने की जरूरत है।
लेखन और राजनीति के अलावा आपकी संगीत, नृत्य, नाटक में गहरी रुचि है। आपको प्रकृति से बहुत प्रेम है। जब समय और मौका मिलता है, आप प्रकृति के बीच समय बिताना पसंद करती हैं। साथ ही बागवानी में आपका बहुत मन लगता है। झारखंड के विकास के सपने को साकार करने के लिए आप संकल्पित और समर्पित भाव से निरंतर क्रियाशील रहती हैं।
अपने लेखन के लिए आपको कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। उन्हें 'मैं बोरिशाइल्ला' के लिए सन् 2007 में लंदन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में ब्रिटेन के आंतरिक सुरक्षा मंत्री के हाथों 'अंतराष्ट्रीय कथा यू.के. सम्मान' प्रदान किया गया। आपको मिले अन्य पुरस्कारों में प्रमुख हैं- सन् 2010 में मिला मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी तथा संस्कृति परिषद् का 'अखिल भारतीय वीर सिंह देव सम्मान', सन् 2010 में ही मिला उज्जैन की कालिदास अकादमी में 'विश्व हिंदी सेवा सम्मान', झारखंड सरकार का 'राजभाषा सम्मान', सन् 2012 में मिला 'राजकमल प्रकाशन कृति सम्मान : 'मैला आँचल' फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार', लोक सेवा समिति, झारखंड द्वारा प्रदत्त 'झारखंड रत्न सम्मान', सन् 2019 में मिला 'बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन शताब्दी सम्मान'।
आप बातचीत में इस बात पर गर्व महसूस करती हैं कि डायन समस्या के उन्मूलन पर काम कर रही छुटनी देवी, जिन्हें सन् 2021 में भारत सरकार ने 'पद्मश्री' देकर सम्मानित किया, के संघर्ष के शुरुआती दौर में उनको महिला आयोग की अध्यक्ष के रूप में आपने लगातार प्रोत्साहन और सहयोग दिया। संप्रति वे अपनी राजनीतिक व्यस्तता के बीच अपने तीसरे उपन्यास और महिला आयोग के अपने अनुभवों के आधार पर महिलाओं की समस्या पर एक पुस्तक पर काम कर रही हैं।
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