आदिवासियों को लूटकर उन्हें अपराधी बनाने वाले ल बाहरी सम्मानित नागरिक बने ||
(आदिवासी दरिद्रता की दर्द भरी कहानी)
लुटेरे बने सम्मानित, आदिवासी बने अपराधी!"
"आदिवासियों की गरीबी का असली दोषी कौन?"
स्वर्णरेखा परियोजना के तहत् पूर्वी सिंहभूम जिले में चांडिल के 120 गांव को विस्थापित किया गया और आदिवासी-मूलवासी समुदाय के 45,500 एकड़ जमीन अधिग्रहित किया गया। 27 वर्ष पहले पुनर्वास का पैकेज घोषित किया गया। लेकिन अब तक लगभग पचास प्रतिशत गाँव में यह लागू नहीं किया गया। अभी डैम के के रेडियल गेट को बंद करने का प्रस्ताव है। है इससे जो डैम के के किनारे बसे हुए हैं सारे गाँव डूब जाएंगे। क्या ऐसा कार्य लोगों को जानबूझ कर दरिद्र बनाने वाला तरीका नहीं है ?
राँची के एच.ई.सी. जिसने 12,990 परिवारों को उजाड़ा और आदिवासी-मूलवासी समुदाय की 9,200 एकड़ अधिग्रहित जमीन गत 50 वर्षों से बेकार पड़ी हुई है। यह सर प्लस (जरूरत से अधिक) जमीन कानूनी रूप में मूल भू-स्वामी को लौटाना चाहिए। लेकिन सरकार इस जमीन को धनी लोगों को सहकारी आवास के लिए दे रही है। क्या यह लोगों के कानूनी अधिकार का जानबूझकर हनन नहीं है? सिमडेगा जिला के आदिवासियों की कई एकड़ उपजाऊ जमीन सरकार द्वारा जबरदस्ती डैम बांधने के लिए अधिग्रहित किया गया। प्रत्येक परिवार को मुआवजा की राशि के तौर पर सिर्फ प्रति एकड़ मात्र 550 रूपये दिया गया जबकि इसका न्यूनतम मूल्य एक लाख रूपया प्रति एकड़ होना था। क्या यह साजिश के द्वारा बनाया गया दरिद्रता नहीं है ?
पिछले पाँच दशकों में लगभग 17 लाख आदिवासी/मूलवासी विस्थापित हो चुके हैं और लगभग 24 लाख एकड़ उनकी जमीन विभिन्न परियोजनाओं के लिए उनसे अधिग्रहित की गयी है। विस्थापितों में से सिर्फ 25 प्रतिशत लोगों को दुबारा बसाया गया है और बाकी 75 प्रतिशत लोगों को बिलकुल भुला दिया गया। ये बेदखली की सारी प्रक्रियाएँ बिना पुनर्वास नीति के पूरी की गईं हैं। क्या लोगों को जानबूझकर उनकी जमीन से बेदखल नहीं किया गया ?
अभी एक बड़े दानव के रूप में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनियाँ झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िशा में भूखे शेर की तरह बहुत बड़े खनिजों से भरे जमीन को निगलने (अपने कब्जा में करने) के लिए आ रही है। ये धनी लोग खनिज लूटने के लिए यहाँ आ रहे हैं। सरकार और विभिन्न कम्पनियों के बीच 107 से भी अधिक समझौते (एम.ओ.यू.) पर हस्ताक्षर किया जा चुका है। 1,04,000 एकड़ जमीन लेने के लिए धमकियां दी जा रही है। सैकड़ों गाँव, हजारों परिवार और लाखों लोग विस्थापित होंगे। विस्थापन इतना भयंकर होगा कि विस्थापितों की कोई गिनती नहीं हो सकती। पेसा कानून के अनुसार किसी भी परियोजना को सम्बन्धित जगह पर स्थापित करने के लिए वहाँ की ग्राम सभा की सहमति जरूरी है लेकिन यह सब ग्राम सभा की सहमति के (विचार-विवर्श) बिना ही किया गया है। क्या यह आदिवासी/मूलवासी के खिलाफ किया जा रहा एक बड़ा अन्याय नहीं है ?
पिछले सारे दशकों के दौरान आदिवासी- मूलवासी के सारे सुरक्षा के दीवार गिराये गये। अब ये ऐसी परिस्थिति में पहुँच गये हैं कि उन्हें और आगे नहीं धकेला जा सकता। वे अपने जीवन को अब अपने हाथों में में लेने का निर्णय कर लिये हैं। इसलिए अभी विस्थापन के खिलाफ प्रतिरोध में जनआंदोलन उभर रहा है वे अपनी जमीन को किसी भी कम्पनी को नहीं देने का संकल्प लिये हैं। फलस्वरूप कोई भी बड़ी कम्पनी झारखण्ड में स्थापित नहीं हो पायी है। यह आम लोगों के ताकत का ही परिणाम है। पूँजीवादी शासक वर्ग, भारतीय सरकार, औद्योगिक घराने, शहरी मध्यम वर्ग तथा प्रशासक वर्ग
इसे सहन नहीं कर सकते। वे यह समझ नहीं सकते कि कैसे और क्यों आदिवासी तथा मूलवासी किसान राज्य की सर्वोच्च शक्ति और शक्ति सम्पन्न औद्योगिक घराने का विरोध करते हैं। इसलिए उन्होंने केन्द्रीय सरकार को आदिवासी तथा मूलवासियों के खिलाफ ऑपरेशन ग्रीन हंट की घोषणा करने के लिए बाध्य किया। यह वास्तव में मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में हरे भरे खेतों और जंगलों का शिकार है. क्योंकि इस हरे भरे खेतों और जंगलों के नीचे सभी प्रकार के खनिजों का खजाना/भंडार है और औद्योगिक घराने इसके माध्यम से झारखंड को लूटना चाहते हैं। यह ऊँट के पीठ का एक अन्तिम पुआल है. इसके बाद मध्य भारत के आदिवासियों के प्रतिरोध आंदोलनों को दबा दिया जायेगा। क्या यह भारत के आदिवासियों के खिलाफ विद्वेषपूर्ण कार्रवाई नहीं है ?
अभी इस विध्वंसकारी कार्य को शासक वर्ग कैसे आगे ले जाएगा? सार्वजनिक तौर पर अक्सर बिना सोचे-समझे बहजनसंख्या भी उनके पीछे चले जाते हैं। तब इस तरह की कार्रवाई का कार्यान्वयन न्याय संगत मालूम पड़ता है। इसलिए आतंकवाद, चरमपंथ, माओवाद, नक्सलवाद को मारने आदि जैसे खबरों को इलेक्टोनिक और प्रिंट मीडिया में मोटे अक्षरों में छपवाना उन्हें अति आवश्यक लगता है और फिर सार्वजनिक रूप में बिना सोचे समझे आम जनता राज्य के विध्वंसकारी कार्य को उचित मान स्वीकार कर लेती है। इस समय इन चरम पंथियों को खत्म करने का एक नाटक राज्य द्वारा किया जा रहा है और हजारों अर्द्धसैनिक बल को कुतार्किक रूप में हथियारों से लैश करके विशेषकर उन क्षेत्रों में भर दिया गया है जहाँ खनिजों का अकूत भंडार है।
जंगल के गाँवों या जंगल से सटे हुए गाँवों को सिपाहियों के द्वारा कब्जा कर लिया गया है। स्कूल मकानों में सुरक्षा बलों को रखकर ग्रामीण बच्चों की शिक्षा को बंद कर दी गयी है। इसी कार्य के सिलसिले में ही बच्चों के मध्याहन भोजन भी रोक दिया गया है, जिससे गाँव के अधिकतर बच्चों को भरपेट भोजन नहीं मिल रहा है। गाँव के सभी जवान लड़के संदिग्ध व्यक्ति बन जाते हैं। वे अर्द्ध सैनिक बलों द्वारा उठा लिये जाते हैं। उन्हें मारा पीटा जाता है और नक्सली मददगार के रूप में चिन्हित कर गिरफ्तार किया जाता है। जवान लड़कियाँ जो सलवार कमीज पहनती हैं, उन्हें नक्सली समर्थक समझा जाता है और उन्हें साड़ी या स्कूल ड्रेस पहनने का आदेश दिया जाता है। अर्द्ध सैनिकों के उम्मीद अनुसार जवाब नहीं दे सकने पर गाँव के बुजूर्गों को भी मारा पीटा जाता है। लोगों को गाँवों में किसी भी तरह की छोटी-मोटी बैठक करने नहीं दिया जाता है और इतना ही नहीं उनका आदेश यह भी है कि अपने गाँव से बाहर कहीं नहीं निकल सकते। महिलाओं एवं बच्चों को जंगल से किसी भी तरह के चीज या वनोपज लाने जाने की बिलकुल मनाही है। उनपर जंगल जाने से प्रतिबंध लगा दिया गया है।
यह आदिवासियों के इतिहास में पहली बार देखने को मिल रहा है कि गाँव के बाजार बंद हो रहे हैं क्योंकि लोगों को जंगल से वनोत्पाद लाने के लिए मना कर दिया गया है जो उनके जीविकोपार्जन का एक सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इन जीवनदायी चीजों को वे न खरीद सक रहे हैं और न ही बेच पा रहे हैं। इससे उनकी आर्थिक व्यवस्था चरमरा गयी है। पूरे के पूरे गाँव में अशांति और डर समा गया है। इस तरह के महौल में लोग कितने दिनों तक जीवित रह पाएंगे।
यह दर्दपूर्ण सच्चाई है कि ग्रामीण आदिवासियों में गरीबी और गहराती जा रही है साथ ही साथ मानसून भी साथ नहीं देता है। यहाँ के लोग सिर्फ और सिर्फ मानसून पर ही अपने खेती के लिए निर्भर हैं। अभी उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। भूखमरी और कुपोषण झारखंड के गाँवों की वास्तविक सच्चाई है।
अन्ततः पुलिस एवं अर्द्ध सैनिक बल यू.ए.पी.ए. (Unlawful activities prevention Act) कानून को अमल में लाते हुए आदिवासी/मूलवासी जवानों को घर के अन्दर, गाँव के बाजार या चलती बस कहीं से भी उठाकर ले जाते हैं। अधिकतर आदिवासियों को मालूम नहीं है कि पुलिस उन्हें कहाँ ले जाती है और वे सुरक्षित हैं भी या नहीं? कानूनी प्रक्रिया के अनुसार गिरफ्तार किये गये किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे के अन्दर मजिस्ट्रेट के सामने उपलब्ध कराना है। लेकिन इसका पालन नहीं किया जा रहा है। दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िशा का आदिवासी क्षेत्र एक पुलिस राज्य में तब्दील हो गया है। इससे भी और अधिक चिंता की बात है कि इलेक्ट्रोनिक चैनल एवं अखबार यानी कि प्रिंट मीडिया पुलिस के ताल में नाच रहे हैं। जो कानून आदिवासी हित में हैं जैसे पेसा अधिनियम एवं आदिवासियों का वन अधिकार अधिनियम उनको लागू नहीं किया जा रहा है। संक्षेप में कहा जाय तो पूँजीवादी शासक वर्ग का सिद्धांत यह है कि आदिवासी लोगों में भूखमरी पैदा करो, उन्हें गोली से मार डालो और इस प्रकार उन्हें पूरी तरह खत्म कर दो।
निष्कर्ष
: यह कहना मुश्किल है कि मध्य भारत के आदिवासी/मूलवासी समाज का अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन भविष्य क्या होगा? लेकिन यह निश्चित है कि कॉरपोरेट कम्पनियाँ, पूँजीवादी शासक वर्ग, भारतीय राज्य, शहरी मध्यम वर्ग, भारत की आदिवासी जनता का अन्त देखना चाहते हैं।
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