राजमहल पहाड़ियों और रामायणकार
Rajmahal Hills and Ramayana: Historical and Mythological Connection
उल्लेखनीय है कि भारत में एक समय लोग बौद्धमत की ओर तीव्र गति से आकर्षित हुए थे, जिस कारण कई देशों में बौद्धमत का प्रसार तेज़ी से हुआ। बौद्ध मतावलम्बियों के बढ़ते कदम इतने ठोस हो गये थे कि कई धर्म-स्थल उनसे अछूते नहीं रहे, उनमें अंग क्षेत्र की गंगा के किनारे स्थित तेलियागढ़ी नामक एक पहाड़ी स्थल तो बौद्धों का प्रमुख केन्द्र बन गया था। हालाँकि इस स्थल से बौद्धों को बाद में कोई लेना-देना नहीं रहा, मगर एक ऐतिहासिक अध्याय पर शोध के लिये बहुत कुछ छोड़ गया बौद्ध विचार ।
वाल्मीकीय रामायण से इस बात की जानकारी मिलती है कि अंग देश के निकट दुर्गम वन में तपस्या करता था ऋष्यश्रृंग नामक एक मुनि, मगर ऋष्यश्रृंग जहाँ तपस्या करता था उस दुर्गम वन के नाम का उल्लेख हाल के पुस्तकों में भी नहीं मिलता । वह वन ऐसा था कि आम मनुष्यों की आवाजाही उसमें नहीं होती थी। ऋष्यश्रृंग के लिये गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में सूंगी रिषि नाम का उल्लेख किया है। उस मुनि को अयोध्या के राजा दशरथ के लिये वसिष्ठ (वसिष्ठ के लिये वशिष्ठ भी लिखा जाता है, जिसके लिये गोस्वामी तुलसीदास ने बसिष्ठ शब्द का प्रयोग किया है) द्वारा बुलवाकर पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया गया था ।
सूंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा ।'
(रामचरितमानस-बालकाण्ड)
ऋष्यश्रृंग मुनि का उल्लेख वेदव्यास द्वारा रचित अध्यात्मरामायण में भी मिलता है। इसमें वर्णित श्लोकों के अनुसार वसिष्ठ ने शान्ता के पति ऋष्यश्रृंग को बुलाकर पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने की सलाह राजा दशरथ को दी और तब दशरथ ने वैसा ही किया ।
ततोऽब्रवीद्वसिष्ठस्तं भविष्यन्ति सुतास्तव ।
चत्वारः सत्त्वसम्पन्नाः लोकपाला इवापराः । ।
शान्ताभर्त्तारमानीय ऋष्यश्रृंगं तपोधनम् ।
अस्माभिः सहितः पुत्रकामेष्टिं शीघ्रमाचर ।।"
(अध्यात्मरामायण-बालकाण्ड 3/4-5)
जहाँ तक बात शान्ता की बात है वह अंग देश के राजा रोमपाद की कन्या थी। दुर्गम वन में तपस्यारत ऋष्यश्रृंग को रोमपाद ने आदरपूर्वक बुलवाया था और उससे हुआ था शान्ता का विवाह ।
वाल्मीकीय रामायण में बालकाण्ड के नवम और दशम सर्ग की कथा के अनुसार अंग देश में था रोमपाद नामक एक प्रतापी राजा। उसके समय में वहाँ घोर अनावृष्टि हुई, जिससे रोमपाद बड़ा ही दुःखी हुआ। रोमपाद ने ब्राह्मणों को बुलाकर समुचित सलाह माँगी, जिसपर ब्राह्मणों ने बताया कि अंग देश के निकभाण्डक और उनके पुत्र ऋष्यश्रृंग तपस्या करते हैं। ऋष्यश्रृंग का समय तपस्या तथा पिता की सेवा में व्यतीत होता है। वेदों के पारगामी ऋष्यश्रृंग को विभिन्न उपायों से लाकर भली-भाँति सत्कार करने की सलाह ब्राह्मणों ने रोमपाद को दी। कोई दूसरा उपाय न जानकर रोमपाद ने वेश्याओं की सहायता से ऋष्यश्रृंग को बुलवाया ।*
यह भी उल्लेख मिलता है कि वन में ही लालन-पालन होने के कारण ऋष्यश्रृंग उन स्त्रियों को पहचानता तक नहीं था और विषयों के सुख से सर्वथा अनभिज्ञ था।
यही कारण है कि अमात्यों सहित पुरोहित की सलाह पर रोमपाद ने मनोहर रूपवाली
मुख्य-मुख्य वैश्याओं को भाँति-भाँति के उपायों से लुभाकर मुनि को लाने का आदेश दिया। वे स्त्रियाँ जब उस वन में जा पहुँचीं तो ऋष्यश्रृंग की दृष्टि उनपर पड़ी।
ऋष्यश्रृंग उन्हें देखकर चकित रह गया। अन्ततः अनुनय-विनय के द्वारा वे स्त्रियाँ ऋष्यश्रृंग को राजा रोमपाद के अन्तःपुर में ले जाने में भी सफल हुईं। मुनि के अंग देश में प्रवेश करते ही इन्द्र ने सहसा जल बरसाना शुरू कर दिया।"
उपर्युक्त दृष्टांत यह प्रमाणित करता है कि ऋष्यश्रृंग जिस वन में रहता था, वहाँ पिता-पुत्र के अलावा किसी भी दूसरे मनुष्य का वास नहीं था। हाँ, उनके द्वारा वहाँ तपस्या करने की जानकारी अंग देश के ब्राह्मणों को अवश्य थी और पता था वहाँ तक पहुँचने का मार्ग भी।
किसी भी घटनाक्रम में छिपी जानकारी के लिये भौगोलिक साक्ष्यों का बड़ा ही महत्त्व होता है। इतिहास में बहुत से ऐसे महत्त्वपूर्ण पात्र हैं जिनके नाम पर उनके कार्यस्थलों का नामकरण हो गया। मसलन, जाबालि ऋषि के नाम पर भारत का जबलपुर, मुद्गल ऋषि के नाम पर मुंगेर, नेपाल में राजा जनक के नाम पर जनकपुर जैसे नाम उल्लेखनीय हैं।
शब्दों के बदले हुए इतिहास के विवेचन से स्पष्ट है कि ऋष्यश्रृंग के लिये ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में सूंगी रिषि नाम का प्रयोग किया और सुंगी रिषि ने स्थान विशेष की भाषा के कारण लोगों की जबान पर सिंघरिषि और श्रृंगीरिख नाम भी धारण कर लिया तो आश्चर्य नहीं। उस ऋषि के तपस्या स्थल से सम्बन्धित मान्यता का उल्लेख 1960 ई० में पी० सी० राय चौधरी की प्रकाशित पुस्तक बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स मुंगेर की पृष्ठ संख्या 506 और 519 पर मिलता है। इस गजेटियर्स के अनुसार मुंगेर से थोड़ी दूरी पर सिंघरिषि और श्रृंगीरिख इन दोनों ही नामों से सम्बोधित एक पहाड़ी के पास 'ऋष्यश्रृंग का आश्रम' था।" यह पहाड़ी मुंगेर से बीस मील दूर खड़गपुर पहाड़ी समूह में है, जो कजरा नामक स्थल के निकट है।
उल्लेखनीय है कि भारत देश का ऐतिहासिक स्थल मुंगेर प्राचीन अंग देश का ही एक हिस्सा है। तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि अंग देश के निकट जिस घने वन में ऋष्यश्रृंग तपस्या करता था, उससे भी कहीं अधिक दुर्गम था राजमहल पहाड़ी इलाके का वन । राजमहल पहाड़ी इलाके का मार्ग अगर थोड़ा भी सुगम होता, तो किसी भी ऋषि का तपस्यास्थल बनने का गौरव इसे अवश्य प्राप्त होता । ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह भी जानकारी मिलती है कि ऋष्यश्रृंग ही नहीं, अपितु रामायणकाल के प्रसिद्ध अष्टावक्र नामक मुनि ने भी राजमहल पहाड़ी इलाके को अपना तपस्यास्थल नहीं बनाया था। प्रचलित मान्यता के अनुसार अष्टावक्र मुनि अंग देश की ही एक पहाड़ी के पास तपस्या करता था। अष्टावक्र मुनि द्वारा कुछ समय वक्रेश्वर (बकेश्वर) में भी बिताने की मान्यता लोगों के बीच है। निश्चित तौर पर यह भी कहा जा सकता है कि अष्टावक्र मुनि ने वक्रेश्वर तक पहुँचने का मार्ग राजमहल पहाड़ियों के मैदानी क्षेत्र होकर ही चुना होगा।
अष्टावक्र मुनि के नाम पर आज भी प्राचीन अंग देश में खड़ी है अष्टावक्र नामक एक पहाड़ी, जिसका एक भाग 'झरना पहाड़' कहलाता है। सुप्रसिद्ध मंदराचल नामक पर्वत से बाँका की दूरी लगभग पन्द्रह किलोमीटर है। बाँका से झरना पहाड़ जाने के लिये तकरीबन बारह किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है। बाँका और आसपास क्षेत्र के लोगों की मान्यता है कि अष्टावक्र मुनि का यह तपस्या स्थल था, जिस कारण पूरी पहाड़ी के साथ ही जुड़ गया उसका नाम ।
प्रकृति की हसीन वादियों में स्थित अष्टावक्र पहाड़ी के छोटे से भाग झरना पहाड़ तक जाने वाली राह के दोनों ओर हैं वन। यहाँ पहुँचते ही मिलता है एक कुण्ड, जिसका जल पहले हमेशा गर्म रहता था। हाल के समय में इस कुण्ड का सौंदर्याकरण किया गया है और 2014 ई0 से इसका जल रहने लगा है ठंढा। प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ति के अवसर पर काफी संख्या में लोग यहाँ पहुँचते हैं और इस कुण्ड में स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं। इस कुण्ड के एक ओर पहाड़ी पर हैं दो मंदिर, जिनमें एक शिव मंदिर है। लोगों का मानना है कि कुण्ड के ठीक ऊपर ऊँचाई पर झरना नामक एक देवी का निवास है। घने वन के कारण मकर संक्रान्ति के दिन कुछ लोग ही ऊपर जाकर उस देवी की पूजा कर पाते हैं। झरना देवी के कारण ही अष्टावक्र पहाड़ी का यह भाग झरना पहाड़ नाम से जाना जाता है।
धर्मग्रंथों के आधार पर यदि अष्टावक्र मुनि के समय की भौगोलिक सीमा पर विचार करें तो इस मान्यता से पीछे नहीं हटा जा सकता कि अष्टावक्र पहाड़ी के पास ही था उस मुनि का तपस्या स्थल, जिस कारण आज भी इस पूरी पहाड़ी को लोग अष्टावक्र पहाड़ी के नाम से जानते हैं।
जहाँ तक वक्रेश्वर की बात है, यहाँ दो गर्म जलकुण्ड हैं। जाड़े में काफी संख्या में लोग वक्रेश्वर पहुँचते हैं और गर्म जल में स्नान कर यहाँ के प्राचीन शिव मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि अष्टावक्र मुनि का आगमन यहाँ एक स्वयंवर में हुआ था ।' प्रचलित इस मान्यता का उल्लेख 1910 ई0 में एल एस एस ओमेल्ले की प्रकाशित पुस्तक बेंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स बीरभूम की पृष्ठ संख्या 117 पर मिलता है, जिससे इस बात को बल मिलता है कि वक्रेश्वर के ही नज़दीकी क्षेत्र में अष्टावक्र मुनि का तपस्या-स्थल था, जिस कारण उस स्थल की पहाड़ी ने अपना नाम अष्टावक्र धारण कर लिया । वक्रेश्वर पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिला में अवस्थित है। झारखण्ड राज्य के संताल परगना प्रमंडलीय मुख्यालय दुमका से वक्रेश्वर की दूरी तकरीबन बयासी किलोमीटर है।
वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस सहित अन्य धर्मग्रंथों के अनुसार वन-गमन के दौरान राम, लक्ष्मण और सीता तीनों गंगा नदी पार उतरने के बाद चित्रकूट पहुँचे तथा इसके बाद पंचवटी गये, परन्तु इन ग्रंथों में इस बात की जानकारी नहीं दी गयी है कि चित्रकूट से किस रास्ते होकर राम, लक्ष्मण और सीता पंचवटी तक गये थे। भारत के महाराष्ट्र राज्य में है पंचवटी नामक एक स्थल। लोगों के बीच यह मान्यता चली आ रही है कि यही वह पंचवटी है, जहाँ राम, लक्ष्मण और सीता ने अपना पड़ाव डाला था। अगर यह मान भी लिया जाय कि उन्होंने पंचवटी तक का रास्ता राजमहल पहाड़ी इलाक़े का मार्ग होकर नहीं चुना, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है कि क्या घने वन और दुर्गम पहाड़ियों के कारण उन्होंने इस रास्ते को पसंद नहीं किया? हाँ, रावण द्वारा वैद्यनाथधाम यानी देवधर होकर लंका जाने का ऐतिहासिक दृष्टांत विभिन्न पुस्तकों में अवश्य मिलता है। यह देवघर राजमहल पहाड़ी क्षेत्र के निकट का मैदानी भाग है, जो संताल परगना प्रमंडल में अवस्थित है। देवघर, दुमका, जामताड़ा, पाकुड़, गोड्डा और साहेबगंज सहित कुल छः ज़िले हैं इस प्रमंडल में ।
देवघर को लोग वैद्यनाथ देवघर के नाम से भी जानते हैं, जहाँ है सुप्रसिद्ध वैद्यनाथ मंदिर। यहाँ मंदिर में स्थित शिवलिंग को वैद्यनाथ के अलावा 'रावणेश्वर' नाम से भी जाना जाता है। देवघर एक सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल है, जहाँ सालोभर भारी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं। देवघर से सैंतालीस किलोमीटर दूर वासुकिनाथ नाम से विख्यात दुमका जिला में भी एक शिवलिंग है। वासुकिनाथ में भी बारहो मास श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता है। विशेषकर सावन माह में तो इन दोनों ही तीर्थस्थलों में जनसैलाब उमड़ पड़ता है। बिहार राज्य स्थित सुलतानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से भक्त पात्रों में जल भरते हैं और फिर काँवर पर रखकर चल पड़ते हैं वैद्यनाथधाम की ओर । 'बोल-बम' उद्घोष के साथ उबड़-खाबड़ कंकड़ीले पहाड़ी रास्ते एवं नदियों को पार करते हुए एक सौ पाँच किलोमीटर दूरी तय कर वैद्यनाथ मंदिर पहुँचते हैं और शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं। वैद्यनाथधाम के बाद भक्त जलार्पण करने वासुकिनाथ मंदिर आते हैं। बहुत से भक्त सुलतानगंज (सुल्तानगंज) से भगवान् शिव को दंडवत् प्रणाम करते हुए चलकर भी वैद्यनाथ और वासुकिनाथ मंदिर पहुँचते हैं।
उनके हाथ में एक लकड़ी रहती है। भक्त लकड़ी लेकर इसलिये चलते हैं कि दंडवत् प्रणाम करते हुए चलने की प्रक्रिया में इसकी उपयोगिता है। दंडवत् प्रणाम करते हुए चलने की प्रक्रिया में भक्त रास्ते पर दंडवत् लेटकर भगवान् शिव को प्रणाम करता है और लकड़ी से रास्ते पर एक चिह्न लगाता है। इसके बाद खड़ा होकर चलता है और उस चिह्न पर पहुँचकर फिर दंडवत् हो भगवान् शिव को प्रणाम करता है। लेटे रहकर ही लकड़ी से फिर आगे एक चिह्न लगाता है तथा खड़ा होकर उस चिह्न पर भगवान् शिव को फिर दंडवत् प्रणाम करता है। इसी प्रक्रिया से चलते हुए बहुत दिनों में वह वैद्यनाथ मंदिर तक पहुँच जाता है। दंडवत् प्रणाम भारत की एक अति प्राचीन परम्परा है तथा दंडवत् प्रणाम करते हुए लम्बी दूरी तय करना है एक कठिन कार्य । दंडवत् प्रणाम करते हुए चलने की इस कठिन प्रक्रिया को लोग 'दंड देते हुए चलना' भी कहते हैं।
सुलतानगंज से गंगाजल लेकर पैदल या फिर दंड देते हुए चलकर वैद्यनाथ और वासुकिनाथ मंदिर तक भक्तिभाव से पहुँचने की परम्परा प्राचीन है। घने जंगलों के कारण जब रास्ता बहुत ही कष्टदायक था, तब भी भक्त सुलतानगंज से जल लेकर इन दोनों मंदिरों तक आते थे, मगर 1980 ई0 के बाद से उनकी संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो गयी है। सावन माह में तो यह मार्ग दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला बन जाता है, जिसमें अपनी टोली से बिछुड़े भक्त राह में शायद ही मिल पाते हैं। हाँ, वैद्यनाथधाम में उनका मिलना तय माना जाता है।
बाल्यकाल में यह लेखक भी 4 अगस्त, 1975 ई0 को अपने पिता, फुआ, फुफेरे भाई शिवशंकर मिश्र और उनके एक मित्र उमेश सिंह के साथ सुलतानगंज से जल लेकर वैद्यनाथधाम के लिये पैदल चल पड़ा था। द्रुतचाल के कारण यह लेखक राह में अपनी टोली से बार-बार बिछुड़कर भी मिल जाता था, कारण उस समय उतनी भीड़ नहीं होती थी। याद है अपनी टोली से बिछुड़ जाने के कारण यह लेखक 'कटोरिया जंगल' में प्रवेश कर 'इनारा बरन' नामक एक कुआँ तक अकेला ही पहुँचा था, परन्तु वहाँ फिर सभी मिल गये थे। कटोरिया जंगल में उस समय पेड़ ही पेड़ दिखायी पड़ते थे। चौथे दिन सभी वैद्यनाथधाम पहुँचे थे। दंडवत् प्रणाम करते हुए चलने वाला केवल एक ही भक्त मिला था, सुलतानगंज से लगभग चार किलोमीटर चलने पर ।
पहले कभी-कभार ही कोई भक्त सुलतानगंज से दंडवत् प्रणाम करते हुए वैद्यनाथधाम होकर वासुकिनाथ तक की लम्बी दूरी तय करने का दुस्साहसिक संकल्प लेता था, परन्तु अब तो सालोभर वैसे भक्त मिल जाते हैं। विशेषकर सावन में विदेशों से भी भक्त आते हैं। रावणेश्वर की प्रसिद्धि वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में है तथा यहाँ के मंदिर के बारे में किंवदन्ती है कि इसका निर्माण त्रेता युग में शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा किया गया था। किंवदन्ती से हटकर देखने का प्रयास करें तो वैद्यनाथ मंदिर का अस्तित्व कम से कम वैक्रमीय संवत् (विक्रम से सम्बन्धित संवत्) चौदह अर्थात् ईसवी पूर्व 43 से अवश्य जान पड़ता है। इस रहस्य की जानकारी मिलती है वैद्यनाथ मंदिर के शीर्ष पर स्थापित एक "वरुण-कलश” से। इसपर एक ओर दो तथा ठीक उसकी दूसरी ओर भी दो पंक्तियाँ अंकित हैं। चारों पंक्तियाँ हैं संस्कृत भाषा में, जो हैं :-
वेदमाङ्क मृगाङ्क समित्तमे सद्वैक्रम्येहायने मासे श्रावणिके सीते स्मर तिथौ श्री चन्द्रमौलीश्वरः भूपो हेममायं सुचारुकलशं निर्माप्य भक्त्याऽर्य्यम् मद्वंराय रचितेऽत्र मन्दिर वरे श्रीवैद्यनाये शीतः। ।।
वेदमाङ्ङ्क = वेद सूचक अंक अर्थात् चार। मृगाङ्ङ्क चन्द्र सूचक अंक एक ।
सम्मिततमे=उससे युक्त। सदवैक्रमे = सत् + वैक्रम्ये। हयन = वर्ष।
श्रावणिके = श्रावण मास के, सिते श्वेत कण्ठ शुक्ल पक्ष में, स्मर = कामदेव
- कामदेव सूचक अंक पाँच (पंचमी तिथि को)।
मद्वंरयै = मत्+वम्+रयैः, मत् = मेरे लिये, वम् = वरुण, रयैः= उत्कंठा अंधकार
रचितेऽत्र = रचिते+अत्र - यहाँ निर्मित
शितृ शब्द के षष्टी एक वचन का रूप बनता है 'शितुः ।'
इसका अर्थ निकलकर आता है शितिकंठ के यानी 'नीलकंठ के।'
चारो पंक्तियों का मथितार्थ यों निकल आता है:-
वैक्रमीय संवत्तृ के श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को राजा श्री चंद्रमौलीश्वर ने उत्कंठापूर्वक मेरे लिये यहाँ निर्मित नीलकंठ वैद्यनाथ के श्रेष्ठ मंदिर में वरुण-देव स्वरूप अत्यन्त सुंदर स्वर्णिम कलश को बनवाकर भक्ति पूर्वक समर्पित किया।
निर्माप्य = बनवाकर
दृष्टव्य :- (राजा का धन इसके निर्माण में लगा, लेकिन कलश को बनाया कारीगरों ने। इस प्रकार राजा निर्माणक होकर भी अपने को करत्तापन से दूर रखकर त्यागशीलता को प्रदर्शित करता है।)
वरुण-कलश पर अंकित पंक्तियों में वैद्यनाथ के लिए ही नीलकंठ वैद्यनाथ से संबंधित सम्बोधन का प्रयोग किया गया है। हालाँकि इन पंक्तियों में वैद्यनाथ मंदिर निर्माण होने के काल की जानकारी नहीं दी गई है, इसके बावजूद इसकी ये पंक्तियाँ वैद्यनाथ मंदिर को भारत के उन प्राचीन मंदिरों की श्रेणी में लाकर अवश्य खड़ी कर देती हैं, जिनका निर्माण ईसा पूर्व हुआ था। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि वैद्यनाथ मंदिर के शीर्ष पर स्थापित वरुण-कलश पर अंकित पंक्तियों को अबतक मौजूद सभी धार्मिक अभिलेखों में 'वैक्रमीय संवत् के प्रथम अभिलेख' के रूप में अवश्य देखा जा सकता है।
वरुण-कलश के साथ दूसरी रोचक बात यह है कि इसके निचले एक भाग में हर ओर बहुत सी आकृतियाँ बनी हुई हैं जो फन काढ़े नाग सर्पों की हैं। सभी आकृतियाँ हैं एक दूसरे से सटी हुई। उल्लेखनीय है कि श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 'नाग पंचमी' नाम से जानी जाती है क्योंकि नाग पूजकों के लिये बहुत ही महत्त्वपूर्ण है यह तिथि । वरुण-कलश पर नाग पंचमी से सम्बन्धित तिथि का उल्लेख और आकृतियों से सिद्ध होता है कि अंग क्षेत्र में 'नाग की पूजा परम्परा' प्राचीन है ।
वास्तव में पूरे वैद्यनाथ परिसर पर लिखा जाय तो अलग से एक महत्त्वपूर्ण शोधग्रंथ बन सकता है, परन्तु उस काल पर भी चर्चा आवश्यक हो जाती है जिसे कहते हैं - 'बौद्धों के उत्कर्ष का काल ।'
उल्लेखनीय है कि भारत में एक समय लोग बौद्धमत की ओर तीव्र गति से आकर्षित हुए थे, जिस कारण कई देशों में बौद्धमत का प्रसार तेज़ी से हुआ। बौद्ध मतावलम्बियों के बढ़ते कदम इतने ठोस हो गये थे कि कई धर्म-स्थल उनसे अछूते नहीं रहे, उनमें अंग क्षेत्र की गंगा के किनारे स्थित तेलियागढ़ी नामक एक पहाड़ी स्थल तो बौद्धों का प्रमुख केन्द्र बन गया था। हालाँकि इस स्थल से बौद्धों को बाद में कोई लेना-देना नहीं रहा, मगर एक ऐतिहासिक अध्याय पर शोध के लिये बहुत कुछ छोड़ गया बौद्ध विचार ।
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