भारत में कौन देशज, कौन आदिवासी ?
बी.के. रॉय बर्मन
राष्ट्र संघ की आम सभा ने वर्ष 1993 को देशज लोगों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है।
राष्ट्र संघ की इस पहल का महत्व एक ऐतिहासिक तथ्य के परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। वर्ष 1982 में न्यूयार्क में हुई राष्ट्र संघ की आम सभा के दौरान, स्पेन सहित कुछ यूरोपीय देशों और सभी अमरीकी देशों ने प्रस्ताव रखा कि राष्ट्र संघ 1992 को क्रिस्टोफर कोलंबस के अमरीका आगमन के 500 वें वर्ष को सरकारी तौर पर घोषित करे। अफ्रीकी देशों ने खासतौर पर इस प्रस्ताव का यह कहते हुए विरोध किया कि उपनिवेशीकरण का उत्सव राष्ट्र संघ में नहीं होना चाहिए। जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय मानवीय मुद्दों पर स्वतंत्र आयोग ने साफ टिप्पणी दी इस पूरे प्रश्न का न केवल बुरा, बल्कि ज्यादातर अविचारित पहलू भी है कि अमरीका में बड़े पैमाने पर किए गए नरसंहार का बमुश्किल ही कोई उल्लेख मिलता है। अमरीका की खोज के कुछ दशकों के भीतर, सदियों से वहाँ फल-फूल रहे राष्ट्रों का मानो अस्तित्व ही खत्म हो गया। लाखों पुरुषों, महिलाओं व बच्चों का कत्ल कर दिया गया। शेष बचे लोग, बयान न की जा सकने वाली बदहाली और गरीबी के शिकार हुए। विजेताओं ने देशज लोगों के सफाए के साथ-साथ, उपमहाद्वीप में गुलामी की प्रथा भी शुरू की।
हाल ही में मिन्नसोटा विश्वविद्यालय की एक नकली अदालत ने कोलंबस को मानवता के विरुद्ध हत्या, चोरी, गुलामी, बंधुआ मजदूरी, बलात्कार, जातिहत्या, यातना, हिंसा और दूसरे अपराधों के लिए दोषी ठहराया।
पर इतिहास के ये काले पन्ने भी, मोहमुक्ति के इन भक्तों को-विजय को तर्कसंगत ठहराने वालों को-1992 को कोलंबस वर्ष के रूप में मनाने से नहीं रोक सके।
इतिहास, जो बदलते समय के साथ-साथ मात्र मानवीय जीवनी शक्ति का इतिहास बन रहा है, ऐतिहासिक षड्यंत्र रचने वालों के मानवीय दुष्कार्यों की बार-बार याद दिलाता है।
12 अक्तूबर 1990 को गुआमियों, कुनों और एम्बेराओं सहित सैकड़ों अमेरिडियनों ने पनामा की राजधानी स्थित स्पेनी दूतावास पर प्रदर्शन किया। स्पेनी सरकार द्वारा, अमरीकी विजय के आधिकारिक समारोह मानने का विरोध करते हुए वे देशज लोगों को सम्मान देने की मांग कर रहे थे। दो दुनियाओं/सभ्यताओं के बीच मिलन के इस उत्सव के विषय पर उन्हें आपत्ति थी; क्योंकि वे अमरीकी देशों पर, यूरोपीय अतिक्रमण के दौरान देशज लोगों पर दमन और इसका बखान करना सही नहीं मानते थे।
20 अक्तूबर 1990 को चिली की विद्यार्थी परिषद ने एक आयोग बनाया, ताकि 500 सालों के पराजितो के प्रदर्शन संचालित किए जा सकें।
1992 में अमरीका व स्पेन की सरकारों द्वारा मनाए जाने वाले समारोहों की तैयारी के विकल्प में, इक्वाडोर के अमेजॉन की देशज राष्ट्रीयताओं का महासंघ अमरीका के स्व-अन्वेषण के लिए पूरे उपमहाद्वीप में एक अभियान चलाने की तैयारी करता रहा है। प्रतिरोध के 500 वर्ष के नारे के साथ कई यात्राएं अभी तक आयोजित की जा चुकी हैं। सन् 1993 को राष्ट्र संघ द्वारा देशज वर्ष की घोषणा से, इस मानवीय उत्थान के नैतिक बल को मान्यता मिली है।
भारत के लोगों के लिए, जिनके उपनिवेश विरोधी संघर्ष का एक लंबा इतिहास है, अंतर्राष्ट्रीय देशज वर्ष सभी स्वरूपों में प्रदर्शित उपनिवेशवाद व नवउपनिवेशवाद की ताकतों से लड़ने के उनके निश्चय पर जोर देने का एक मौका उपलब्ध कराता है।
पर 1993 को अंतर्राष्ट्रीय देशज वर्ष के रूप में मनाने की राष्ट्र संघ की घोषणा केवल दिखावे के लिए किया जाने वाला काम नहीं है। इसका एक व्यावहारिक पक्ष भी है। देशजों के अधिकारों के एक प्रारूप पर, जिसे संबंधित पक्षों में बांटा गया है, 1993 में राष्ट्र संघ आम सभा के एक विशेष सत्र में विचार किया जाएगा और सभा द्वारा तय किए गए संशोधनों के बाद इसका ग्रहण किया जाएगा।
देशज लोगों से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के दो अनुबंध (1957 का अनुबंध 107 और 1989 का अनुबंध 169) भी हैं। इन दो अनुबंधों की पृष्ठभूमि में ही राष्ट्र संघ की प्रस्तावित घोषणा को देखा जाना चाहिए।
यहां इस बात पर ध्यान देना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और राष्ट्र संघ स्रोतों में देशज शब्द अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया गया है। परिभाषा में इन विभिन्नताओं ने कुछ विवादों को जन्म दिया है। आज जो स्थिति है उसके अनुसार, भारत समेत दुनिया के कई देशों ने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुबंध क्रमांक 107 को अनुमोदित किया, पर दुनिया के किसी भी देश ने अभी तक अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुबंध क्रमांक 169 को अनुमोदित नहीं किया है। यह पता नहीं है कि राष्ट्र संघ प्रारूप में देशज की अपरिभाषित व्याख्या को कितने देशों ने अपनी-अपनी सरकारों के प्रतिनिधित्व द्वारा सहमति दी है, पर यह पता है कि भारत सरकार के प्रतिनिधिमंडल ने इसे नामंजूर कर दिया है। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि परिभाषाओं के विभिन्न प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अंतरों को मामूली संशोधनों से हल किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के दो अनुबंधों और राष्ट्र संघ की प्रस्तावित घोषणा का क्रियान्वयन ही वास्तविक मुद्दा है। अतःपारिभाषित पहलू पर जाने से पहले, तीनों दस्तावेजों के कार्यात्मक भाग का जल्दी से परीक्षण किया जाए। यह परिभाषात्मक समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में रखेगा।
1957 में ग्रहण किए गए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुबंध 107 में नियम बनाया गया है कि सदस्य राज्य, देशज और अन्य आदिवासी व अर्द्ध-आदिवासी जनसंख्या को स्वतंत्रता व गरिमा के साथ-साथ उनकी भौतिक व आध्यात्मिक उन्नति को जारी रखने, आर्थिक सुरक्षा व सांस्कृतिक विशिष्टताओं (जिनमें से कुछ जनसंख्या के शेष तबकों द्वारा उपभोग किए जाने वाले फायदों व अधिकारों को उनके द्वारा उपभोग को रोकने वाली हो सकती है) और राष्ट्रीय समाज में ऐसी जनसंख्या के विलीनीकरण की प्रक्रिया में सहायता करेंगे। बाद में दुनिया के विभिन्न भागों के देशज व आदिवासी लोगों का विचार बना कि जिस तरीके से सरकारों ने विलीनीकरण की व्याख्या की है, उसके कई अवांछित परिणाम हुए। अक्सर उपनिवेशी समय की कानूनी प्रक्रिया के दायरे में बंधे प्रशासनिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक कुलीनों, यहां तक कि न्यायपालिका, ने भी सांस्कृतिक अलगाव को राजनीतिक एकीकरण, संसाधनों पर सदियों पुराने अधिकारों को नकारने और भौतिक व सामाजिक पर्यावरण से संबंध-विच्छेद की व्याख्या की। न केवल देशज व आदिवासी लोगों के, बल्कि चिंतित समाज शास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के, व्यापक असंतोष के जवाब में राष्ट्र संघ ने 1982 में एक कार्यदल की स्थापना की, जिसने आगे चलकर 1985 में यह निश्चय किया कि वह देशज लोगों के अधिकारों की घोषणा का प्रारूप तैयार करेगा, जिसे आम सभा द्वारा ग्रहण किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी, 1957 के अनुबंध में संशोधन के प्रश्न का निरीक्षण करने के लिए 18 विशेषज्ञों की एक समिति नियुक्त की। विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुबंध 169 को 1989 में ग्रहण किया गया। इस संधि में और देशजों के अधिकारों पर राष्ट्र संघ के प्रारूप के संबंधित लोगों के स्व-प्रबंध के अधिकार पर जोर दिया गया है। दरअसल, राष्ट्र संघ कार्यदल ने 24 से 28 सितंबर 1991 को नूक (ग्रीनलैंड) में हुई अपनी बैठक में सलाह दी, 'अंतर्राष्ट्रीय समुदायों और देशों की सीमाओं, दोनों ही में आत्मनिर्णय का अधिकार स्वतंत्रता, न्याय व शांति की पहली शर्त है।'
कइयों के दिमाग में आत्मनिर्णय का अधिकार बंटवारे के अधिकार के साथ जुड़ गया। अतः राष्ट्र संघ के कार्यदल का बयान कुछ क्षेत्रों में गलत धारणा को जन्म दे सकता हैं।
उनकी सामूहिक पहचान बरकरार रखने और भौतिक पर्यावरण के संरक्षण व वृद्धि के लिए देशज लोगों को अपने सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक विकास का ढांचा निर्धारित करने के अधिकार का भी सम्मान प्राप्त होना चाहिए।
खासकर उन कई देशों में, जहां अंतर्राष्ट्रीय प्रभुत्व का प्रतिरोध किया गया है, जिनकी संप्रभुता तनावों में है। हालांकि, कार्यदल के अध्यक्ष ने पहले ही स्पष्टीकरण दे दिया था कि आत्मनिर्णय के अधिकार के कई अर्थ होने के बावजूद, बंटवारे/राष्ट्र-विभाजन का अधिकार खास तौर पर इससे बाहर रखा गया है।
देशज अधिकारों के घोषणा प्रारूप में आत्मनिर्णय शब्द नहीं रखा गया है, पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुबंध 169 में इस बात पर जोर दिया गया है कि समानता और सुरक्षा के अधिकार के अलावा उनकी सामूहिक पहचान बरकरार रखने और भौतिक पर्यावरण के संरक्षण व वृद्धि के लिए देशज लोगों को अपने सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक विकास का ढांचा निर्धारित करने के अधिकार का भी सम्मान प्राप्त होना चाहिए। इन दोनों दस्तावेजों में, देशज लोगों की अपनी ज़मीनों, (जिससे वे ऐतिहासिक रूप से जुड़े है) पर सामुदायिक संपत्ति अधिकारों का भी उल्लेख किया गया है।
अतः यह वांछनीय है कि अगर देशज अधिकारों की घोषणा में स्वयं निर्णय शब्द शामिल किया जाता है-जिसकी राष्ट्र संघ कार्यदल ने नूक में सिफारिश की है-तो कार्यदल के अध्यक्ष द्वारा पहले दिए गए स्पष्टीकरण, कि इसमें राष्ट्र-विभाजन का अधिकार शामिल नहीं है, को भी दस्तावेज का हिस्सा होना चाहिए।
अब दोनों दस्तावेजों की संकल्पनत्मक धाराओं पर आए। उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो भारतीय संविधान की मूल भावना और पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रतिपादित आदिवासी नीति के पांच सिद्धान्तों से मेल न खाता हो। हकीकत में अधिकतर संचालनात्मक धाराएं, पहले ही भारत में किसी-न-किसी दस्तावेज में शामिल की जा चुकी हैं। इस संबंध में संविधान की छठवीं अनुसूची, सातवीं पंचवर्षीय योजना में आदिवासी विकास में स्व-प्रबंध को मजबूत करने पर जोर, आदिवासियों के भूमि अधिकारों पर भारत सरकार द्वारा नियुक्त समिति की रपट, आदिवासियों व वनों पर भारत सरकार द्वारा नियुक्त समिति की रपट, पंचायती राज के गठन पर संशोधन हेतु संसद में प्रस्तुत बिल, केंद-राज्य संबंधों पर आयोग की सिफारिशों में निहित धारणाएं, अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के आयुक्त की रपटों में समय-समय पर किए गए वर्णनों का उल्लेख किया जा सकता है। बोडोलैंड पर भारत सरकार की समिति की सिफारिशें संविधान की छठवीं अनुसूची में और चीजें जोड़ती है और भारत के आदिवासी लोगों के काफी बड़े हिस्से की स्व-प्रबंध की आकांक्षा को ठोस रूप देने में काफी आगे तक जाती हैं।
ये दो दस्तावेज और भारत में मानवीय व राजनीतिक वास्तविकताओं की दिशा व प्रवृत्ति के विपरीत अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुबंध बुजुर्गाना दृष्टिकोण वाले हैं। भारत में भी राजनीतिक, प्रशासनिक व सामाजिक कुलीनों का एक वर्ग बुजुर्गाना रुख वाला और साथ-ही-साथ आदिवासियों व समाज के पिछड़े वर्गों पर अधिकार जताने वाला है। कुलीनों का वह वर्ग नेहरू की 5-सूत्री आदिवासी नीति को लागू करने, भारतीय संविधान की छठवीं अनुसूची के स्व-प्रबंध पहलू और आदिवासी संस्कृति व सामाजिक समूहों के विकास की स्वतः होने वाली प्रक्रियाओं को मंद करने में सफल रहा है। इसके अलावा राष्ट्रीय हितों के नाम पर, जिनका मतलब अक्सर देश के सत्ता-दलालों के स्वार्थों से अधिक कुछ नहीं होता, वे आदिवासी-बहुल इलाकों से संसाधनों के दोहन के लिए कानूनी व प्रशासनिक प्रक्रियाओं की हेराफेरी में भी बहुत तेज रहे। कुलीनों का यही वर्ग अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन 1957 के अनुबंध के बारे में अपने आप को काफी सुविधाजनक महसूस करता है। अतः स्वाभाविक रूप से उसे इसमें किसी संशोधन पर एतराज ही होगा।
देशज व आदिवासी लोगों की पहचान के प्रश्न पर, देश व दुनिया के स्तर पर चल रही इन विरोधी प्रति-धाराओं की पृष्ठभूमि में ही विचार होना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन, 1957 के अनुबंध क्रमांक 107 में देशज और अन्य आदिवासियों व अर्द्ध-आदिवासी आबादियों की पहचान के लिए दो-स्तरीय दृष्टिकोण है :
1. (अ) आदिवासी व अर्द्ध-आदिवासी आबादी वे हैं, जिनकी आर्थिक व सामाजिक स्थितियां राष्ट्रीय समुदाय के दूसरे वर्गों की तुलना में कम उन्नत चरण पर है और जिनकी हैसियत पूरी तरह या आंशिक रूप से उनकी खुद की मान्यताओं पर विशेष नियमों या नियंत्रणों द्वारा नियंत्रित होती है। (ब) स्वतंत्र देशों में रहने वाले आदिवासी व अर्द्ध-आदिवासी जनसंख्याओं के सदस्य जो उन आबादियों के वंशज होने के कारण देशज माने जाते हैं, जो उस देश में या उसकी किसी भौगोलिक सीमा में उपनिवेशी विजय के समय वहां रहती थीं और जो अपनी कानूनी हैसियत की परवाह किए बगैर (बजाय उस देश की संस्थाओं के, जिसमें वे रह रही हैं) उसी समय की सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक संस्थाओं से एकरूपता बनाते हुए अपना जीवन
चला रही हैं।
2. इस अनुबंध के उद्देश्य के लिए, अर्द्ध- आदिवासी शब्द में वे लोग व समूह शामिल हैं, जो हालांकि अपनी आदिवासी विशेषताओं को खोने की प्रक्रिया में हैं, पर जिनका अभी तक राष्ट्रीय समुदाय में एकीकरण नहीं हुआ है।
सन् 1989 के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुबंध क्रमांक 169 में भी दो-स्तरीय दृष्टिकोण अपनाया गया है-
अनुबंध 169 लागू होता है :
(अ) उन आदिवासी लोगों पर जिनकी सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक स्थितियां राष्ट्रीय समुदाय के दूसरे वर्गों से एकदम अलग हैं और जिनकी हैसियत पूरी तरह या आंशिक तौर पर अपने रीति-रिवाजों, परंपराओं या विशेष नियमों और नियंत्रणों द्वारा संचालित होती हैं।(ब) उन लोगों पर जिन्हें ऐसी जनसंख्याओं का वंशज होने के कारण देशज माना जाता है, जो देश पर विजय, उपनिवेशीकरण या मौजूदा सीमाओं के स्थापित होने के पहले देश या उसके भौगोलिक क्षेत्र में रह रही थीं और जिन्होंने अपनी कानूनी हैसियत की परवाह किए बगैर अपनी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक संस्थाएं पूरी तरह से या कुछ हद तक बचा रखी हैं।
अनुबंध में आगे कहा गया है :
1. इस अनुबंध के प्रावधान जिन समूहों पर लागू होंगे, उनके निर्धारण के लिए देशज व आदिवासी की तरह स्व-पहचान एक बुनियादी गुण माना जाएगा। 2. अनुबंंध
में 'लोगों' शब्द के उपयोग को, अंतर्राष्ट्रीय नियमों के तहत शब्द से जुड़े अधिकारों से संबंधित किसी प्रभाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
जब इन दोनों अनुबंधों में देशज व आदिवासी धारणाओं की तुलना करते हैं तो कुछ बुनियादी अंतर एकदमे साफ हो जाते हैं। कई मायनों में 1957 का अनुबंधआदिवासी संस्कृक्तियों की सोच को विकासवादी विचारधारा में एक पिछड़ी स्थिति की तरह प्रतिबिंबित करता है, जिसे एक बदलती हुई घटना की तरह देखना जरूरी नहीं है। वे एक विशेष सामाजिक स्थिति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनके अंदर स्थायित्व के तत्व हैं। पर वे सामाजिक जीवन के स्थिर तालाब की तरह नहीं है। प्राथमिक रूप से, अपने पारिस्थितिकीय-सांस्कृतिक संसाधनों से पोषित होकर और दूसरे, बाह्य उद्दीपकों के प्रति अपनी प्रतिक्रियास्वरूप, उनमें आंतरिक विकास की प्रक्रिया होती है।
दूसरा परिप्रेक्ष्य मानवीय जीवन के सभी संगठित स्वरूपों में भारतीय ज्ञानी पुरुषों द्वारा की गई सत्य की खोज के ज्यादा समानांतर है, जो संबंधित समुदायों के साथ शांति बनाए हुए और संबंधित लोगों की अंतरात्मा में खलबली मचाए बिना पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है। मानवीय क्षमताओं के मुख्यतः आंतरिक प्रस्फुटीकरण के इस परिप्रेक्ष्य में, आदिवासी समुदायों सहित कई समुदाय, (जरूरी नहीं कि शुद्ध तारीखवार अर्थों में), ऐतिहासिक मूल्यांकन-परक अर्थो में देशज हैं। इसे स्वीकार करने में भारत और एशिया व अफ्रीका के तकरीबन सभी देशों को कोई समस्या नहीं हो सकती है। साफ है कि बाहरी लोगों द्वारा उनकी जमीनें जीतने और नरसंहार व जातिहत्या द्वारा उनके कमोबेश सफाए से संबंधित दूसरा कारक, पूरी तरह से आस्ट्रेलिया और उत्तरी व दक्षिणी अमरीकी देशों पर ज्यादा सही बैठता है। देशज व आदिवासियों की पहचान के इन दो कारकों को एक दूसरे से मिलाया नहीं जाना चाहिए। भ्रम दूर करने के लिए ज्यादा बेहतर यह होता कि अनुबंध में उल्लेखित दोनों कारकों के बीच में यह शब्द डाल दिया जाता।
अनुबंध 107 व 169 में दूसरा अंतर यह है कि अनुबंध 107 में जहां जनसंख्या कहा गया है वहीं अनुबंध 169 में लोग कहा गया है। हालांकि इसमें निरंतरता नहीं है। जनसंख्या व्यक्तियों का मिश्रण है, जिनके बीच में किसी सतत रचनात्मक जुड़ाव का होना जरूरी नहीं है। दूसरी ओर लोगों का अर्थ है रचनात्मक प्रबंधों द्वारा जुड़ी सामूहिकता, जिसमें अपने को बरकरार रखने और सामूहिकता की पहचान को पैदा करने का अंतर्निहित गुण होता है। आदिवासी और दूसरे देशज सामाजिक समुदाय निश्चित ही मात्र व्यक्तियों का झुंड नहीं हैं, वे रचनात्मक प्रबंधों के जरिए अपनी पहचान की सीमाएं पैदा करते हैं। अतः अनुबंध 169 में जनसंख्या शब्द को हटाकर लोग करना एकदम सटीक है। पर तब उपनिवेशी विजय के रूप में मरने वाले लाखों लोगों के संदर्भ में भी लोग शब्द का ही उपयोग होना चाहिए। यह आश्चर्य की बात है कि उनके संदर्भ में जनसंख्या शब्द क्यों बनाए रखा गया है। उम्मीद की जाती है कि अनुबंध 169 में इस गंभीर त्रुटि को हटाने की शुरुआत की जाएगी।देशज अधिकारों पर राष्ट्र संघ प्रारूप में देशज की पहचान के लिए कोई कारक उपलब्ध नहीं है। पर जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय मानवीय मुद्दों पर स्वतंत्र पहल द्वारा बताया गया कि राष्ट्र संघ देशज जनसंख्याओं के विरुद्ध भेदभाव की समस्या के विशेष रपटकर्त्ता और 1972 में विकसित की गई एक कामचलाऊ परिभाषा का उपयोग करता है। “एक देश की वर्तमान सीमाओं में पूरी तरह या आंशिक रूप से उस समय रहने वाले लोगों के वंशजों से देशज लोग बने हैं, जब दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग दुनिया के दूसरे भागों से वहां आए, उन्हें जीतकर या वहां बसकर या किसी और तरीके से उन पर हावी हो गए, उन्हें गैर-प्रभावी या उपनिवेशी स्थिति तक सीमित कर दिया, जो आज अपनी विशेष सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक परंपराओं व मान्यताओं से एकरूपता बनाकर अपना जीवन चला रहे है, बजाय उस देश की संस्थाओं के, जिसके वे राज्य संरचना के तहत एक हिस्सा हैं, जो मुख्यतः जनसंख्या के दूसरे प्रभावशाली तबकों के राष्ट्रीय, सामाजिक व सांस्कृतिक गुणों को अपने में शामिल करता है" (राष्ट्र संघ दस्तावेज क्र०ई०/सी०एन० 4/सब/2/एल 566, दिनांक जून)।
इस परिभाषा के अनुसार अमरीका व आस्ट्रेलिया के बाहर किसी को देशज नहीं माना जा सकता। पर एक दशक से भी ज्यादा समय के बाद, विशेष रपटकर्ता ने देशज की परिभाषा में अलग-थलग और सीमांत जनसंख्याओं को भी शामिल कर लिया। देश में मौजूद अलग-थलग पड़े सीमांत समूहों, हालांकि वे विजय या उपनिवेशीकरण से प्रताड़ित नहीं हुए, को भी देशज जनसंख्याओं के तहत निम्न कारणों से लाया गया है:
(अ) वे. उन समूहों के वंशज हैं जो देश की सीमाओं में तब रह रहे थे, जब दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग वहां आए;
(ब) देश की जनसंख्या के दूसरे समुदायों से पूरी तरह अलगाव के कारण, उन्होंने अपने पूर्वजों की मान्यताएं व परंपराएं लगभग अक्षुण्ण बनाए रखी है, जोकि देशज लोगों के गुणों के समान हैं;
(स) वे, भले ही औपचारिक रूप से एक ऐसी राज्य संरचना के तहत रखे गए हैं, जिसके राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक गुण उनसे एकदम भिन्न हैं (यू० एन० दस्तावेज नं० ई०/सी०एन० 4/सब. 2/1983/21 ए8 पैरा. 379)।
शब्द के अर्थ के इस दूसरे विस्तार द्वारा, भारत सहित एशिया व अफ्रीका की कई जनजातियों और दूसरे समुदायों को देशज माना जा सकता है। पर देशज अधिकारों पर प्रारूप घोषणा में अवधारणा के बारे में चुप्पी ने इन देशों की सरकारों के सामने समस्या पैदा कर दी है। भारत सरकार ने यह साफ-साफ कहा है और अपने आप को इस घोषणा पर किसी भी सार्थक वार्तालाप से बाहर रखा है।
देशज लोगों पर राष्ट्र संघ कार्यदल की अध्यक्षा ने, राष्ट्र संघ द्वारा नियुक्त विशेष रपटकर्त्ता द्वारा सुझाई गई दूसरी कामचलाऊ परिभाषा का संदर्भ भी रखा है। इस परिभाषा के अनुसार देशज लोग, समुदाय या राष्ट्र वे हैं जिनकी, अपनी सीमाओं के अतिक्रमण व उपनिवेशीकरण के पहले, वहां विकसित समाजों से ऐतिहासिक निरंतरता रही है और वे इन सीमाओं में या इनके हिस्सों में अब पनप रहे समाजों के दूसरे तबकों से अपने-आप को अलग मानते है। वर्तमान में वे समाज का गैरप्रभावी तबका बनाते हैं और अपने खुद के सांस्कृतिक ढांचों, सामाजिक संस्थाओं और कानूनी तंत्रों के अनुरूप अपनी पैतृक सीमाओं और जातीय पहचान, जिसके आधार पर वे लोगों के रूप में अपना सतत अस्तित्व बनाए हुए हैं, को सुरक्षित करने, विकसित करने और भावी पीढ़ियों को सौंपने के लिए दृढ़संकल्प हैं। (आई०डब्ल्यू०जी०आई०एव०, वार्षिकी, 1986 पृष्ठ 105)। यदि पूर्ण रूप से सोचा जाए तो यह परिभाषा भारत सहित एशिया के कई भागों में रहने वाली आदिवासी जनसंख्या के संबंध में जमीनी हकीकत का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें यहां-वहां मामूली बदलाव व संशोधन हो सकते हैं, पर पूरक धारा के साथ यह परिभाषा (जिसका विवरण आगे दिया गया है) अगर घोषणा प्रारूप में शामिल की जाती है तो यह बातचीत के लिए आधार उपलब्ध करा सकती है।
यह दुर्भाग्य ही होगा कि भारत, जिसने लंबे समय तक उपनिवेश विरोधी संघर्ष में एक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई है और एक नए अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक व आर्थिक क्रम की दृष्टि दी है, मात्र इसलिए कि देशज अधिकारों पर विश्वव्यापी घोषणा से बाहर यह सवाल बना रहे कि देशज कौन है, इस बारे में घोषणा में साफ निशानों की कमी है। घोषणा में निहित मूल्यों और रचनात्मक प्रबंधों को प्रोत्साहित करना और उसमें सक्रिय भागीदारी निभाना भारत के दीर्घकालीन हितों में ही है। दुनिया के सभी भागों के सभी लोगों को आजाद कराने वाली ताकतों को मजबूत किए बगैर, भारत बतौर देश के, उन प्रभुत्व जमाने वाली विश्वव्यापी ताकतों के विरुद्ध अपनी आजादी सुनिश्चित नहीं कर सकता, जो इस देश के विकास की प्रक्रिया के विनाश हेतु घूम रही हैं। यह महात्मा गांधी के अतुलनीय नेतृत्व में चलाए गए स्वतंत्रता आंदोलन की भावना के भी अनुरूप होगा। अतः देशज अधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा में देशज की पहचान के कारक निर्धारित करने और घोषणा से संबंधित हिस्सों में उपयुक्त संशोधन करने के लिए भारत के लोगों और सरकार को इस बारे में पहल करनी चाहिए।
यहां यह सलाह दी जा सकती है कि राष्ट्र संघ कार्यदल के अध्यक्ष द्वारा बताए गए ऐतिहासिक पहलू के अलावा, परिभाषा में निम्न मानकीय पहलू भी जोड़ा जा सकता है, 'देशज लोगों का सामाजिक व आर्थिक जीवन, सांस्कृतिक रूप से निर्धारित पुनर्वितरणशील कार्यविधियों द्वारा संचालित मुख्यतः समानता की विचारधारा व नैतिक बंधनों, पारस्परिकता और अपने आसपास में अपने विस्तार से नियंत्रित होता है।
देशज अधिकारों के विश्व्यापी घोषणापत्र को मात्र देशजों के मॉडल का ही प्रतिबिंब नहीं होना चाहिए, बल्कि मानवीय पुनर्निर्माण के मॉडल का प्रतिबिंब होना चाहिए जिसके केंद में देशजों के मानवीय तत्वसार हों। उपरोक्त विवरण इसी चिंता को परिलक्षित करता है।
Who is indigenous and who is tribal in India?
नेतृत्व में चलाए गए स्वतंत्रता आंदोलन की भावना के भी अनुरूप होगा। अतः देशज अधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा में देशज की पहचान के कारक निर्धारित करने और घोषणा से संबंधित हिस्सों में उपयुक्त संशोधन करने के लिए भारत के लोगों और सरकार को इस बारे में पहल करनी चाहिए।
यहां यह सलाह दी जा सकती है कि राष्ट्र संघ कार्यदल के अध्यक्ष द्वारा बताए गए ऐतिहासिक पहलू के अलावा, परिभाषा में निम्न मानकीय पहलू भी जोड़ा जा सकता है, 'देशज लोगों का सामाजिक व आर्थिक जीवन, सांस्कृतिक रूप से निर्धारित पुनर्वितरणशील कार्यविधियों द्वारा संचालित मुख्यतः समानता की विचारधारा व नैतिक बंधनों, पारस्परिकता और अपने आसपास में अपने विस्तार से नियंत्रित होता है।
देशज अधिकारों के विश्व्यापी घोषणापत्र को मात्र देशजों के मॉडल का ही प्रतिबिंब नहीं होना चाहिए, बल्कि मानवीय पुनर्निर्माण के मॉडल का प्रतिबिंब होना चाहिए जिसके केंद में देशजों के मानवीय तत्वसार हों। उपरोक्त विवरण इसी चिंता को परिलक्षित करता है।
जनसंख्या व्यक्तियों का मिश्रण है, जिनके बीच में किसी सतत रचनात्मक जुड़ाव का होना जरूरी नहीं है। दूसरी ओर लोगों का अर्थ है रचनात्मक प्रबंधों द्वारा जुड़ी सामूहिकता, जिसमें अपने को बरकरार रखने और सामूहिकता की पहचान को पैदा करने का अंतर्निहित गुण होता है।
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